Balaposh Quilt: सर्दियों का मौसम आते ही हर घर में रजाई और कंबल निकलने शुरू हो जाते हैं। सर्दी और रजाई का संबंध सदियों पुराना है, लेकिन क्‍या आपको मालूम है कि एक खास रजाई सर्दियों की शान है जिसका नाम है 'बालापोश'? इसका नाता खासतौर से भारत की पारंपरिक विरासत से भी जुड़ा है। बालापोश अपनी अनोखी पहचान और खास गुणों की वजह से भी मशहूर है। यह रजाई अपनी मुलायम और हवादार बनावट और खुशबू के लिए प्रसिद्ध है। ये कला करीब 100 साल से अधिक पुरानी है। हाल ही में हस्तशिल्प और टेक्सटाइल स्टोर इटोकरी (itokri) ने भी इसकी स्‍टोरी को सोशल मीडिया पर शेयर किया। आइए जानते हैं कि आखिर क्‍यों बालापोश वेस्‍ट बंगाल से निकलकर आज पूरी दुनिया में जानी जाती है?

Balaposh Quilt: नवाबों के शौक से बनी खास रजाई

बालापोश रजाई का चलन आज का नहीं बल्कि करीब 100 साल से ज्‍यादा पुराना है। ये ऐसा दौर था जब किसी चीज की खासियत उसकी कीमत से नहीं बल्कि उसे तैयार करने वाले कारीगरों के हुनर से तय होती थी। जानकारी के अनुसार, बालापोश का इतिहास बंगाल के मुर्शिदाबाद से जुड़ा है। 18वीं सदी में मुर्शिदाबाद
पूरे बंगाल की सत्ता और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र था। यहां नवाबों के शासन में आराम के साथ ही शाही इंतजाम भी बेहद खास होते थे।

https://getbengal.com की रिपोर्ट बताती है कि बालापोश के निर्माण को नवाब शुजाउद्दीन मुहम्मद खान के समय से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि उन्हें उस दौर में इस्तेमाल होने वाले ऊनी कंबल पसंद नहीं थे। उनकी मांग कुछ ऐसी चीज को ओढ़ने की थी, जो मां की गोद जैसा मुलायम हो, शरीर को गर्म रखे, हल्का होने के साथ फूलों की खुशबू से महकता हो। नवाब की पसंद को ध्‍यान में रखते हुए अतिर खान नाम के एक स्थानीय कारीगर ने इस चुनौती को स्वीकारा। कई प्रयोगों के बाद ऐसी रजाई तैयार की गई, जो सामान्य रजाइयों से बिल्कुल अलग थी। बस यहीं से जन्‍म हुआ 'बालापोश' रजाई का।

Balaposh Quilt: इन चीजों के खास मेल से तैयार की रजाई

बालापोश को बेहद खास बनाने वाली चीज है इसकी अनोखी बनावट। इसके निर्माण में महीन रेशम, साफ की गई रुई और बेहतरीन फूलों के इत्र का इस्तेमाल किया होता है। सबसे पहले रुई की खास तरीके से सफाई की जाती है, जिससे वह हल्की और मुलायम बनी रहे। इसके बाद रेशम और रुई की तहों की ध्‍यान से लेयरिंग की जाती है, ताकि रजाई का आकार बना रहे। इसके अंदर रुई एक जगह इकट्ठी होकर गांठें न बना ले।

सामान्य रजाइयों में रुई को अपनी जगह बनाए रखने के लिए जगह-जगह सिलाई की जाती है, लेकिन पारंपरिक बालापोश में इन खास लेयर्स को संभालने का तरीका अलग है। यूनेस्को ने भी अपने भारतीय शिल्प संबंधी दस्तावेज में भी इसकी खास तकनीक का जिक्र किया है। इसमें रुई की परतों को रेशम के बीच इस तरह सेट किया जाता है ताकि रजाई की मुलायम बनावट लंबे समय तक बनी रहे। इसी अलग तरीके ने बालापोश को साधारण रजाई से अलग पहचान दिलाई। इसे बनाने का पूरा तरीका लंबे समय तक परिवार के भीतर ही सिखाया जाता रहा।

Balaposh Quilt: रजाई के अंदर खुशबू कैसे रहती है बंद?

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अब बात करते हैं बालापोश के अंदर बरकरार रहने वाली खुशबू के बारे में। दरअसल इसमें इस्तेमाल होने वाला इत्र सिर्फ ऊपर से छिड़ककर काम पूरा नहीं कर देता। खुशबू को रजाई की परतों के भीतर सहेजने का खास तरीका भी इसी कारीगरी का हिस्‍सा है। इसे तैयार करते समय इत्र का इस्तेमाल किया जाता है। फूलों से मिलने वाली खुशबू के लिए फिदरूस नामक इत्र का प्रयोग होता है। कुछ खास मौकों पर गुलाब की खुशबू वाला इत्र भी इस्तेमाल किया जाता है। यहां सबसे बड़ा काम ये होता है कि खुशबू कपड़े और रुई की परतों के भीतर टिक सके। इस के लिए इत्र की सही परख के साथ ही तहों का सही संतुलन और खुशबू को सहेजने का अनुभव होना भी जरूरी है।

Balaposh Quilt: एक ही परिवार में आगे बढ़ती रही परंपरा

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बालापोश निर्माण में सबसे दिलचस्‍प पहलु इसका पारिवारिक रहस्य है। इसे बनाने की तकनीक पीढ़ियों तक एक ही परिवार में आगे बढ़ती रही। यूनेस्को के दस्तावेज के मुताबिक, इस शिल्प की जानकारी लंबे समय तक उसी परिवार तक सीमित रही। इसके बाद नाम आता है मुर्शिदाबाद के सखावत हुसैन खान का। उन्‍हें भी इस परंपरा का प्रमुख कारीगर माना जाता है। उनके बाद उनके बच्चों ने भी इस हुनर को बड़े ही शानदार तरीके से आगे बढ़ाया। बेशक आज रजाई निर्माण के तरीकों में काफी बदलाव देखने को मिला है। अब पारंपरिक तरीकों की बजाय मशीनों के जरिये काम होता है। बावजूद इसके आज भी बालापोश की खुशबू और गरमाहट का मुकाबला किसी सामान्‍य रजाई से नहीं हो सकता।

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