Diwali 2026: देशभर में दिवाली-2026 की तैयारियों जोरों पर हैं। हर जगह देवी लक्ष्‍मी की प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। कहीं मिट्टी या धातु से लक्ष्‍मी जी की मूर्ति तैयार करने में कारीगर व्‍यस्‍त हैं, लेकिन उत्‍तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में न सोना, न चांदी न मिट्टी और न ही धातु यहां केवल गन्‍ने के तने का इस्‍तेमाल कर देवी लक्ष्‍मी जी की सुंदर प्रतिमा को तैयार किया जाता है। ये अनूठी परंपरा यहां करीब 17वीं सदी से लगातार चली आ रही है।

दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। इसके बाद रात के समय पूरे विधि- विधान से पूजा की जाती है। जानकारी के अनुसार, गन्ने की लक्ष्मी बनाने के पीछे की मान्यता यह है कि मानस खंड और पुराणों में गन्ने को शुभ और फलदायक माना जाता है। इसके साथ ही मां लक्ष्मी को भी गन्ना बेहद पसंद है। इसलिए पूरे कुमाऊं में मां लक्ष्मी जी की प्रतिमा गन्ने के तने से बनाई जाती है।

Diwali 2026: देवी लक्ष्‍मी को अत्‍यंत प्रिय है 'गन्‍ना'

मान्यता के अनुसार कुमाऊं में गन्ने के तनों से मां लक्ष्मी की प्रतिमा बनाने की शुरुआत करीब 17वीं सदी से हुई। बाद में इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यहां हर साल गांव के हर घर में इसी विधि से देवी लक्ष्‍मी जी प्रतिमा तैयार की जाने लगी। पंडित भुवन चंद पाठक के अनुसार मां लक्ष्‍मी को गन्‍ना अत्‍यंत प्रिय है। ऐसे में गन्‍ने को ही मां लक्ष्मी, श्री एवं धन का साक्षात स्‍वरूप माना जाता है। ये भी मान्‍यता है कि गन्ने से मां लक्ष्मी की मूर्ति बनाए जाने पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर भक्तों को धन-धान्‍य से परिपूर्ण होने का आशीर्वाद देतीं हैं। प्रतिमा की पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद किसी भी शुभ दिन और तिथि को ध्‍यान में रखते हुए प्रतिमा को शंख और घंटी की ध्वनि के बीच नदी अथवा किसी पवित्र पेड़ के पास विसर्जित किया जाता है।

Diwali 2026: इन चीजों से तैयार की जाती है प्रतिमा

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मां लक्ष्मी की प्रतिमा निर्माण में मुख्य रूप से गन्ने के तने का इस्‍तेमाल होता है। सबसे पहले उस स्‍थान पर जहां देवी लक्ष्‍मी को विराजमान किया जाता है वहां चौकी बनाई जाती है। इसके बाद गन्ने के छोटे-छोटे तनों को ढांचा तैयार कर प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। इसके बाद प्रतिमा को सजाया जाता है। उन्‍हें बिंदी, चूड़ी, झुमके, कुमाऊंनी पिछोड़ आदि से ढका जाता है। इसके बाद रात के समय पूजा एवं आरती की जाती है। कुमाऊं क्षेत्र में दिवाली के मौके पर गन्ने से लक्ष्मी प्रतिमा बनाने की परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का अटूट हिस्सा बन चुकी है। इस मौके पर हर व्यक्ति और परिवार अपने परिवार के लिए शुभकामनाएं और समृद्धि की कामना करता है।

Diwali 2026: ये भी जरूर जानें

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क्‍या आपको मालूम है कि देवी लक्ष्मी के पूजन में गन्‍ना चढ़ाने का भी विधान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण के लिए निकले, लेकिन किसी कारणवश भगवान विष्णु को दक्षिण दिशा की ओर जाना पड़ा। उन्होंने माता लक्ष्मी को वहीं ठहरने के लिए कहा। भगवान विष्णु के वहां से जाने के बाद माता लक्ष्मी अपनी भूख को शांत करने के लिए पास स्थित एक खेत में गन्ना खाने पहुंची।

भगवान विष्णु ने वापस आकर देवी लक्ष्‍मी से प्रश्‍न किया कि क्‍या उन्‍होंने गन्‍ना खाने से पहले किसान से अनुमति ली थी, जिसका यह खेत था? माता लक्ष्मी के मना करने पर भगवान विष्णु ने उन्हें उनकी गलती का पश्चाताप करने और उस किसान को हानि का मुआवजा देने के लिए माता लक्ष्मी को 12 वर्षों तक उस किसान के घर में निवास करने का आदेश दिया। ताकि किसान को उनकी उपस्थिति से समृद्धि प्राप्त हो सके।

जब 12 साल बाद, माता लक्ष्मी किसान के घर से जाने लगीं, तो किसान ने उन्हें कुछ दिन और रुकने के लिए कहा। माता लक्ष्मी ने कहा कि जब तक किसान और उसकी पीढ़ियां गन्ने का पूजन करती रहेंगी, वह गन्ने के रूप में सदैव उनके घर में वास करेंगी। लक्ष्मी जी के इसी वचन की वजह से लक्ष्मी पूजन के दौरान गन्ने की पूजा करने का विधान है।

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