कुमाऊं की चौखट से दुनिया तक छाया ऐपण, रोजगार से लेकर मार्केटिंग तक बढ़ी डिमांड

दिवाली यानी सजावट, सफाई, शॉपिंग और बहुत कुछ, लेकिन इन सबके साथ ही त्योहार में रौनक लाने का काम करती है 'रंगोली'। जब बात यहां रंगोली की हो तो नाम सामने आता है ' कुमाऊंनी ऐपण' (Kumaoni Aipan) यानी उत्तराखंड की पारंपरिक रंगोली का। ऐपण का महत्व यहां केवल दिवाली तक ही सीमित नहीं है बल्कि कोई शुभ दिन हो, विवाह या जनेऊ संस्कार। हर काम की शुरुआत इसके बिना लगभग अधूरी मानी जाती है।
इस बेहद खास कला में आखिर ऐसे क्या बात है कि उत्तराखंड गवर्नमेंट की ओर से ऐपण कला को 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत शामिल किया है? स्थानीय कलाकारों और विशेषकर महिलाओं को आजीविका से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। हस्तशिल्प बोर्ड के जरिए स्थानीय कलाकारों को पंजीकृत किया जाता है। इस पारंपरिक कला के प्रशिक्षण, मार्केटिंग एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं। जानते हैं ऐपण की कहां से हुई शुरुआत, कैसे सुदूर कुमाऊं की पहाड़ियों से लेकर मैदान ओर दुनिया तक इसकी साख पहुंची? आइए ये भी जानने का प्रयास करते हैं कि कैसे आप इस कला के जरिये रोजगार के मौके भी हासिल कर सकते हैं?
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क्या है ऐपण का इतिहास?
"ऐपण" शब्द "अर्पण" से बना है, जो आमतौर पर "लिखाई" या लिखने से जुड़ा है। ऐपण कला एक जानी-मानी पारंपरिक लोक कला है, जिसे खास मौकों, घरेलू रस्मों और रीति-रिवाजों में बनाया जाता है। माना जाता है कि इसके बारीक डिजाइन और पैटर्न शुभ्रता का प्रतीक हैं और कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा हैं। ऐपण कला में दीवारों, कपड़ों, कागजों आदि पर देवी-देवताओं के अलावा स्थानीय लोक कला, पशु, फूल आदि के सुंदर चित्र बनाए जाते हैं। इसमें खासतौर से दो तरह के कच्चे माल का इस्तेमाल होता है। पहला बिस्वर यानी गीले चावल से तैयार किया गया पेस्ट और दूसरा है लाल गेरू, जिसे लाल मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, आजकल इनके स्थान पर कई लोग लाल और सफेद पेंट या एक्रेलिक कलर का भी इस्तेमाल करने लगे हैं।
ऐपण आर्ट, जोकि अपने शुरुआती दौर में नैनीताल और अल्मोड़ा जैसी जगहों पर घरों की दीवारों और फर्श को सजाने तक ही सीमित था। आज फर्श से निकलकर अर्श तक पहुंच चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में इसकी लोकप्रियता में तेजी आई है। सितंबर 2021 में जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी (GI) टैग भी मिल चुका है। GI टैग ऐपण आर्ट बनाने में शामिल पारंपरिक कारीगरों और समुदायों को पहचान और आर्थिक फायदे भी दे रहा है।
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ऐपण महिलाओं और युवाओं को दिला रहा पहचान
ऐपण की कला अब उत्तराखंड की महिलाओं एवं युवाओं के लिए रोजगार का जरिया बनकर उभरी है। ऐपण अब हाथ से उकेरा गया डिजाइन न होकर स्टेशनरी, फाइल कवर, फोल्डर, पेन स्टैंड, दुपट्टा, बैग, पूजा की थाली, नेम प्लेट, चाबी का छल्ला समेत कई उत्पादों को ऐपण प्रिंट से नया रूप दिया जा रहा है। इन उत्पादों की खूबसूरती को देखते हुए ऐपण कला वाले इन Products की बाजार काफी डिमांड है। ऐसे में अगर आप भी अपने अंदर छिपे हुनर को सभी के सामने लाना चाहते हैं, तो आप भी इस योजना से जुड़ सकते हैं। इसके लिए आपको उत्तराखंड हस्तशिल्प एवं हथकरघा बोर्ड के लिंक पर जाना होगा। जहां आपको ऐपण कला पर काम करने के साथ कमाने का भी भरपूर मौका मिलेगा।
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इन स्टेप्स को फॉलो करके हस्तशिल्प बोर्ड के साथ जुड़ें
अगर आप भी उत्तराखंड सरकार की इस बेहद खास योजना का लाभ उठाना चाहते हैं, तो राज्य हस्तशिल्प बोर्ड के पोर्टल पर जाना होगा। इसके बाद सबसे पहले नियमों को जानना होगा।
- सबसे पहले उत्तराखंड सरकार के हस्तशिल्प बोर्ड के लिंक पर जाएं।
- इसके बाद पोर्टल पर सेल्फ रजिस्टर करवाएं।
- एक बार साइन इन करने के बाद अपना नाम, आधार नंबर आदि डिटेल डालें।
- इसके बाद अपने जिले का चुनाव करें।
- अपने काम का सैंपल यानी पीडीएफ बनाकर अपलोड करें।
- इसके बाद सबमिट बटन को दबाएं।
- इसके बाद विभाग की ओर से आपको संपर्क किया जाएगा।
- आगे की औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए अपने दस्तावेज तैयार रखें।
- अधिक जानकारी के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं https://uk.gov.in/
- https://www.behance.net/
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- क्या उत्तराखंड के बाहर के लोग भी पोर्टल पर रजिस्टर करवा सकते हैं?
- जी नहीं, ये मौका अभी केवल उत्तराखंड के मूल निवासियों के लिए ही है।
- क्या महिला और पुरुष दोनों इस कला की बारीकियां सीख सकते हैं?
- जी हां, महिला और पुरुष यहां तक की छोटे बच्चे भी इस कला को बड़ी ही आसानी के साथ सीख सकते हैं।
- ऐपण डिजाइन में 'बिंदु' (Dots) का क्या महत्व है?
- ऐपण कला में बिंदु या डॉट्स का अत्यधिक धार्मिक महत्व माना गया है। इसके केंद्र में एक बिंदु होता है जिसे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है।
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