उत्तर प्रदेश अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, विश्व प्रसिद्ध ताजमहल, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। यह राज्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है। इतना ही नहीं बल्कि यहां के पारंपरिक खान-पान का इतिहास भी काफी पुराना है। जब भी बात यहां के व्यंजन की होती है, तो दाल के फरे, दाल की दुल्हन, सूरन की सब्जी जैसे तमाम पकवान का नाम सामने आता है। हालांकि, कुछ व्यंजन ऐसे हैं, जो बदलते समय के साथ गायब हो चुके हैं। आज के इस लेख में हम आपको एक ऐसे ही बेहद खास और दुर्लभ व्यंजन भुट्टे का दुलमा के बारे में बताने जा रहे हैं।

दुर्लभ व्यंजन भुट्टे का दुलमा क्या है?

भुट्टे का दुलमा कोई आम डिश नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के पुराने ग्रामीण और शाही दस्तरखान की एक ऐसी शान थी जो मानसून के मौसम में खासतौर पर बनाई जाती थी। ताजे और मीठे भुट्टे, दूध और मसालों के मेल से तैयार होने वाला यह व्यंजन अपनी अनोखी खुशबू और सौंधी मिठास के लिए जाना जाता था। 

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भुट्टे का दुलमा बनाने का पारंपरिक तरीका

भुट्टे का दुलमा दुर्लभ व्यंजन को बनाने के लिए सबसे पहले कच्चे और मीठे भुट्टों के दानों को निकालकर सिलबट्टे पर दरदरा पीस लिया जाता था। इसके बाद एक कड़ाही में शुद्ध देसी घी गरम करके जीरा, तेजपत्ता और हींग का छौंक लगाया जाता था।

इसके बाद प्याज, अदरक-लहसुन, हल्दी, धनिया, लाल मिर्च को अच्छी तरह भूना जाता था। मसाला पकने के बाद उसमें पिसा हुआ भुट्टा डाला जाता था और धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए पकाया जाता था।

इसके बाद दूध मिलाकर इसकी ग्रेवी तैयार की जाती थी। चूल्हे में धीमी आंच पर पकने के बाद इसमें सौंधी खुशबू आने लगती थी जो खाने वालों का दिल जीत लेती थी।

भुट्टे का दुलमा उत्तर प्रदेश में कहां-कहां बनाया जाता है?

भुट्टे का दुलमा उत्तर प्रदेश के पारंपरिक और ग्रामीण अंचलों में मुख्य रूप से अवध लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, बरेली, बदायूं के इलाकों में बनाया जाता रहा है। इसके अलावा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ पुराने ग्रामीण घरों में भी मानसून के दौरान जब ताजे भुट्टे आते हैं, तब इसे चाव से पकाया जाता था। यह मुख्य रूप से किसी खास कमर्शियल रेस्टोरेंट की डिश नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के पारंपरिक घरों और पुराने परिवारों की एक घरेलू रेसिपी है।

क्यों खो गया भुट्टे का दुलमा?

वक्त के साथ खान-पान की आदतें बदलने के कारण 'भुट्टे का दुलमा' जैसे पारंपरिक व्यंजन लगभग विलुप्त हो चुके हैं। इस डिश को बनाने में काफी मेहनत और समय लगता है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग नहीं करना चाहते। नई पीढ़ी फास्ट फूड की तरफ ज्यादा आकर्षित होती है, जिससे वे इन पारंपरिक स्वादों से अनजान रह जाते हैं।

पुरानी पीढ़ियों की कई बेहतरीन रेसिपीज सिर्फ बोल-चाल और यादों के सहारे आगे बढ़ती थीं, जिन्हें लिखा न जाने के कारण वे समय के साथ गुम हो गईं। 

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आज के समय में भुट्टे का दुलमा सिर्फ हमारे बुजुर्गों की यादों में या उत्तर प्रदेश के कुछ चुनिंदा ग्रामीण इलाकों की पुरानी रसोई में ही जीवित बचा है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Image Credit- Magnific, Ai