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हादसे में पैर गंवाने के बाद भी नहीं टूटा हौसला, एवरेस्ट जीतकर अरुणिमा ने रचा था इतिहास

आर्टिफ‍िश‍ियल पैर के सहारे एवरेस्‍ट पर चढ़ाई करने वाली अरुण‍िमा स‍िन्‍हा की कहानी हर क‍िसी के ल‍िए प्रेरणादायक है। 
Updated:- 2026-08-14, 17:30 IST
story of arunima sinha

कुछ हादसे हमारी लाइफ को पूरी तरह से बदल देते हैं। इंसान के सामने ऐसा वक्‍त आ जाता है जब उसे लगता है क‍ि अब आगे कुछ नहीं हो सकता, लेक‍िन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मुश्‍क‍िल हालातों का सामना कर नई शुरुआत करते हैं। अरुण‍िमा स‍िन्‍हा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। साल 2011 में एक ट्रेन हादसे में उन्‍होंने अपना बायां पैर गंवा द‍िया था। उस समय उनकी उम्र 24 साल की थी।

क्‍या है अरुण‍िमा स‍िन्‍हा की कहानी?

उस दौरान वह नेशनल लेवल की वॉलीबॉल और फुटबॉल प्‍लेयर थीं, लेक‍िन इस हादसे के बाद उन्‍होंने खुद को कमजोर मानने के बजाय एक ऐसा लक्ष्‍य चुना, ज‍िसे सुनकर शायद कोई भी हैरान हाे सकता है। दरअसल, उन्‍होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का फैसला किया। करीब दो साल की मेहनत के बाद 21 मई 2013 को उन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर इतिहास रच दिया। आइए इसके बारे में जानते हैं सब कुछ-

यूपी के अंंबेडकरनगर की रहने वाली है अरुण‍िमा स‍िन्‍हा

अरुण‍िमा स‍िन्‍हा का जन्‍म यूपी के अंबेडकरनगर में हुआ है। उनके प‍िता इंडि‍यन आर्मी में थे और मां स्वास्थ्य विभाग में सुपरवाइजर थीं। उनकी एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई है। पिता के निधन के बाद, उनकी मां ने ही पूरे परिवार की देखभाल की। आपको बता दें क‍ि अरुण‍िमा स‍िन्‍हा को खेलों में बहुत इंटरेस्‍ट है। इसी दौरान कुछ लोगों ने उनसे सोने की चेन छीनने की कोश‍िश की। व‍िरोध करने पर उन्‍हें ट्रेन से बदमाशों ने ढकेल द‍िया।

story of arunima sinha

हादसे में गंवा द‍िया था बायां पैर

ट्रेन से गिरने के बाद वह दूसरी ट्रेन की चपेट में आ गईं। इस हादसे में उनका बायां पैर बुरी तरह घायल हो गया और बाद में उसे काटना पड़ा। यह उनके लिए जिंदगी का बहुत मुश्किल समय था। एक खिलाड़ी होने के नाते अचानक पैर खो देना किसी बड़े झटके से कम नहीं था।

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अस्पताल में ही लिया एवरेस्ट चढ़ने का फैसला

हादसे के बाद अरुणिमा का इलाज दिल्ली के AIIMS में हुआ। इसी दौरान उनके मन में एवरेस्ट पर चढ़ने का ख्याल आया। उन्होंने तय कर लिया कि इस हादसे से उनकी पूरी जिंदगी बर्बाद नहीं होगी। इस फैसले के पीछे उन्हें क्रिकेटर युवराज सिंह की कहानी से भी हिम्मत मिली। युवराज ने कैंसर से लड़कर क्रिकेट में वापसी की थी। अरुणिमा ने भी उनके संघर्ष से प्रेरणा ली और अपने लिए एक नया लक्ष्य रखा। इसके बाद उन्होंने आर्टिफ‍िश‍ियल पैर की मदद से आगे बढ़ने की तैयारी शुरू की।

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आसान नहीं था पहाड़ चढ़ने का रास्ता

एवरेस्ट पर चढ़ना किसी के लिए भी आसान काम नहीं है। अरुणिमा के सामने चुनौती और बड़ी थी। उन्हें आर्टिफ‍िश‍ियल पैर के साथ ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ने की तैयारी करनी थी। उन्होंने उत्तराखंड के नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग, उत्तरकाशी से बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स किया और इसमें अच्छा परफॉर्म किया। इसके बाद उन्होंने अनुभवी पर्वतारोही बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में भी ट्रेनिंग ली। 2012 में उन्होंने करीब 6,150 मीटर ऊंची आइलैंड पीक पर चढ़ाई की, जो एवरेस्ट की तैयारी का हिस्सा थी।

52 दिन की चढ़ाई के बाद म‍िली जीत

एक अप्रैल 2013 को अरुणिमा ने एवरेस्ट कैंपेन के लिए चढ़ाई शुरू की। उनके साथ ट्रेनिंग से जुड़े लोग भी थे। रास्ते में बर्फ, ठंड, तेज हवाओं और ऊंचाई जैसी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। करीब 52 दिनों की कड़ी चढ़ाई के बाद 21 मई 2013 को सुबह 10 बजकर 55 म‍िनट पर अरुणिमा एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं। इस उपलब्धि के साथ वह माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने वाली पहली महिला amputee यानी पैर गंवा चुकी महिला बनीं।

उनकी यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि कुछ साल पहले तक वह एक गंभीर ट्रेन हादसे के बाद अस्पताल में थीं और अब दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर खड़ी थीं। अरुणिमा की कहानी एवरेस्ट तक पहुंचने के बाद खत्म नहीं हुई। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों की ऊंची चोटियों पर चढ़ाई का लक्ष्य बनाया।

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कई चोट‍ियों पर फहराया ति‍रंगा

उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराया है, जैसे-

  • एशिया में एवरेस्ट
  • अफ्रीका में किलिमंजारो
  • यूरोप में एल्ब्रुस
  • ऑस्ट्रेलिया में कोस्जि‍युस्को
  • साउथ अमेरिका में अकोंकागुआ

इसके अलावा साल 2018 में अंटार्कटिका के माउंट विंसन जाने से पहले वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली थीं। उस समय तक वह दुनिया के 5 महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंच चुकी थीं।

कई अवार्ड पा चुकी हैं अरुण‍िमा

अरुणिमा को उनकी उपलब्धि के लिए कई सम्मान भी मिले हैं। जैसे-

  • साहसिक काम करने के लिए उन्हें 2014 में 'तेनज‍िंग नोर्गे अवॉर्ड' दिया गया।
  • साल 2015 में देश के बड़े सम्मान 'पद्म श्री' से भी उन्‍हें सम्मानित किया गया।
  • पद्म श्री पाने वालों की लिस्ट में उनका नाम 'खेल' कैटेगरी में दर्ज है।

बता दें क‍ि उन्होंने अपने जीवन और एवरेस्ट के सफर पर Born Again on the Mountain नाम से किताब भी लिखी, जो 2014 में प्रकाश‍ित हुई थी।

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नोट- यह जानकारी London Speaker Bureau से ली गई है। 

Image Credit- Wiki/Jagran

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