Fri Sep 11, 2026 | Updated 09:32 PM IST

जिस महिला से कांपते थे दुश्मन, उसी ने यूपी में खड़ा किया यह बेसिलिका; पढ़ें बेगम समरू की कहानी

बेगम समरू का नाम आज क‍िसी पहचान का मोहताज नहीं है। इनका जीवन काफी मुश्‍क‍िलों भरा था। इसके बावजूद इन्‍होंने हार नहीं मानी और अपनी ए‍क अलग पहचान बनाई।
Updated:- 2026-08-10, 14:08 IST
begum samru history

यूपी में ऐसी कई जगहें हैं ज‍िनका इत‍िहास काफी पुराना है। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सरधना में बना एक चर्च भी एक कहानी समेटे हुए है। इसका नाम बे‍स‍िल‍िका ऑफ आवर लेडी ऑफ ग्रेसेस है। य‍ह स‍िर्फ एक चर्च नहीं बल्‍क‍ि इति‍हास की एक बड़ी न‍िशानी भी है। खास बात तो यह है क‍ि इस चर्च को बनाने में क‍िसी राजा या अफसर का नहीं बल्‍क‍ि बेगम समरू का हाथ था।

संघर्षों से निकलकर रानी बनीं थीं बेगम समरू

बताया जाता है क‍ि बेगम समरू का जीवन क‍िसी फ‍िल्‍मी कहानी से कम नहीं था। एक साधारण लड़की बनने से लेकर ताकतवर शासक बनने तक का सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा था। कहा जाता है क‍ि दुश्‍मन भी उनके नाम से घबराते थे। दरअसल, वह खुद सेना की कमान संभालती थीं। युद्ध के मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटती थीं। इसी वजह से आज भी उनका नाम इत‍िहास में खास पहचान रखता है। हमने 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' नाम की ए‍क सीरीज शुरू की है, ज‍िसमें रोजाना ऐसी मह‍िलाओं के बारे में बताएंगे। आइए इनकी पूरी कहानी जानते हैं-

कौन थीं बेगम समरू?

र‍िपोर्ट्स के मुताब‍िक, बेगम समरू का असली नाम जेबुन्निसा था। उनका जन्म दिल्ली के आसपास एक मुगल परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद परिवार की हालत खराब हो गई और उन्हें अपनी मां के साथ घर छोड़ना पड़ा। कुछ समय बाद उनकी मां का भी देहांत हो गया। इसके बाद जेबुन्निसा ने दिल्ली में एक तवायफ के घर शरण ली, जहां उन्हें नृत्य, संगीत और लोगों से बातचीत करने जैसी कई बातें सिखाई गईं। वह बहुत तेज दिमाग की थीं और नई चीजें जल्दी सीख लेती थीं।

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कैसे बदली बेगम समरू की पूरी जिंदगी?

साल 1767 की बता है जब उनकी मुलाकात फ्रेंच-जर्मन सैनिक वाल्टर जोसेफ रेनहार्ट से हुई। बाद में वह उनके साथ रहने लगीं। रेनहार्ट अलग-अलग शासकों के लिए लड़ने वाला सैनिक था। लोग उसे समरू के नाम से जानने लगे और इसी वजह से आगे चलकर जेबुन्निसा भी बेगम समरू कहलाने लगीं।

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बेगम समरू ने सीखी थी युद्ध से जुड़ी चीजें

उस समय भारत में मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ रहा था। अलग-अलग राजा और विदेशी ताकतें अपना प्रभाव बढ़ाने में लगी थीं। ऐसे दौर में बेगम समरू ने रेनहार्ट के साथ रहते हुए युद्ध और प्रशासन की कई बातें सीखीं। वह कई अभियानों में भी उनके साथ जाती थीं।

पति की मौत के बाद बेगम समरू ने खुद संभाली सेना

साल 1778 में रेनहार्ट यानी क‍ि उनके पत‍ि की भी मौत हो गई। इसके बाद भी बेगम समरू ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पति की सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। सेना ने भी उन्हें अपना नेता मान लिया। अगर आपको लगता है क‍ि वह वह सिर्फ आदेश देने वाली शासक बनी थीं, तो बता दें क‍ि ऐसा ब‍िल्‍कुल नहीं है। जब भी जरूरत पड़ती थी तो वह खुद घोड़े पर सवार होकर युद्ध में उतर जाती थीं।

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कैसे बेगम समरू को म‍िली सरधना की जमीन?

मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय बेगम समरू की मेहतन और लगन से काफी खुश थे। उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्होंने सरधना की जमीन बेगम समरू के नाम कर दी थी। इसके बाद जब भी शाह आलम को युद्ध में काेई जरूरत हाेती थी, तो वह खुद उनकी मदद करती थीं। साल 1783 की बात है जब उन्होंने सिख सेनापति बघेल सिंह के साथ समझौता करवाकर दिल्ली पर होने वाले हमले को टालने में अहम भूमिका निभाई।

शाह आलम ने बेगम समरू को दि‍या था बेटी का दर्जा

इसके कुछ साल बाद बेगम समरू ने लाल किले की घेराबंदी खत्म कराने में भी मदद की। उनकी वफादारी से शाह आलम बहुत खुश हुए। इसके बाद उन्‍होंने बेगम समरू को 'फरजंद-ए-अजीजी' यानी अपनी प्यारी बेटी की उपाधि दे दी। इसी के बाद उन्हें फरजाना नाम से भी जाना जाने लगा।

बेगम समरू ने अंग्रेजों से भी लिया था मुकाबला

ऐसा भी कहा जाता है क‍ि बेगम समरू ने स‍िर्फ दूसरे शासकों के साथ ही नहीं बल्‍क‍ि अंग्रेजों के खि‍लाफ भी लड़ाई लड़ी थी। साल 1803 में जब असाये का युद्ध हुआ था, तब उन्‍होंने मराठों का भी साथ दि‍या था। हालांक‍ि, उस लड़ाई में मराठों को हार का सामना करना पड़ गया था। इसके बाद भी बेगम समरू की सेना ब‍िखरी नहीं थी। बाद में उन्होंने बदलते हालात को समझते हुए अंग्रेजों से समझौता कर लिया, लेकिन सरधना पर अपना अधिकार बनाए रखा।

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सिर्फ योद्धा नहीं, अच्छी शासक भी थीं बेगम समरू

बेगम समरू स‍िर्फ युद्ध ही नहीं करती थीं, उन्‍होंने अपने राज्य के विकास पर भी काफी ध्यान दिया था। उनके शासन में सरधना अच्छी तरह आगे बढ़ा। उन्होंने कई शानदार इमारतें बनवाईं। दिल्ली के चांदनी चौक में भी उन्होंने एक महल भी बनवाया था, जिसे आज भागीरथ पैलेस के नाम से जाना जाता है। सरधना में उनके बनवाए कुछ महलों का इस्तेमाल आज स्कूल और इंटर कॉलेज के रूप में किया जाता है।

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आखिर कैसे बना चर्च?

साल 1781 में बेगम समरू ने ईसाई धर्म अपना लिया था। इसके बाद उनका नया नाम जोआना नोबिलिस सोम्ब्रे हो गया था। वह इस समय भारतीय रियासत की पहली और इकलौती स्थानीय कैथोलिक शासक मानी जाती हैं। ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्होंने सरधना में एक चर्च बनवाने का फैसला किया। इस चर्च का डिजाइन इटली के सैन्य इंजीनियर मेजर एंथनी रेघेलिनी ने तैयार किया।

चर्च को बनाने में खर्च हुए थे 4 लाख रुपये

चर्च में मुगल और यूरोपि‍यन ड‍िजाइन का खूबसूरत कॉम्‍ब‍िनेशन देखने को मिलता है। बाहर की बनावट में मुगल काल का असर असर दिखाई देता है, जबकि गुंबद और संगमरमर का काम रोम के फेमस सेंट पीटर्स चर्च जैसा लगता है। बताया जाता है कि उस समय इस चर्च को बनाने में करीब 4 लाख रुपये खर्च हुए थे, जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी। साल 1822 में यह चर्च लोगों के लिए खोल दिया गया था।

चर्च के अंदर ही है बेगम समरू की समाधि

1822 में चर्च के खुलने के बाद भी बेगम समरू ने कई ऐत‍िहास‍िक काम क‍िए। 1836 में बेगम समरू का निधन हो गया। उस समय उउनकी उम्र 83 साल थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। ऐसे में उनकी समाधि इसी चर्च के अंदर बनाई गई। उनकी संगमरमर की बड़ी प्रतिमा आज भी वहां चर्च में है, जिसमें उन्हें सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है।

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कैसे मिला बेसिलिका का दर्जा?

बेगम समरू के बनवाए इस चर्च का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व समय के साथ और बढ़ता गया। इसी वजह से साल 1961 में पोप जॉन तेइसवें ने इसे बेसिलिका का दर्जा दिया। आपको बता दें क‍ि बेसिलिका का सम्मान उन चर्चों को दिया जाता है, जिनका इतिहास, कला या धार्मिक महत्व बहुत ज्‍यादा खास होता है।

आज सरधना का यह बेसिलिका सिर्फ एक चर्च नहीं, बल्कि बेगम समरू की बहादुरी की भी पहचान है। बेगम समरू का जीवन मुश्‍क‍िलों से भरा रहा लेक‍िन उन्‍होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी ए‍क अलग पहचान बनाई। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Image Credit- Wikipedia/Basilica of Our Lady of Graces

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