इंटरनेट पर एक गलत पोस्ट करा सकती है जेल, जानें साइबर अपराध से जुड़ी धाराएं

यह सच है कि आज के दौर में इंटरनेट लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, फिर भी कुछ लोग नफरत फैलाने वाले आपत्तिजनक पोस्ट लिखकर समाज का माहौल नकारात्मक बना रहे हैं। कई बार सीधे-सादे लोग भी जाने-अनजाने ऐसे कार्यों में शामिल हो जाते हैं, जिन्हें साइबर अपराध (Cyber Crime) की श्रेणी में रखा जाता है। हाल ही में व्हाट्सएप पर भेजे गए एक संदेश से किसी समुदाय विशेष के लोगों में फैले असंतोष के फलस्वरूप देश में दो अलग-अलग जगहों पर हत्या की घटनाएं होने लगीं, जो इंटरनेट मीडिया के दुरुपयोग का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस लेख में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाष कुमार झा ने इनपुट्स दिए हैं। जानते हैं, इसके बारे में...
कानून का नजरिया
साइबर अपराध की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए भारत में वर्ष 2000 में सूचना तकनीक अधिनियम (IT Act) पारित किया गया, जिसमें आवश्यकता अनुसार वर्ष 2008 एवं 2009 में संशोधन किए गए। इस कानून के अंतर्गत इंटरनेट की मदद से किए जाने वाले गैर-कानूनी कार्यों को शामिल किया गया है। साइबर अपराध को रोकने के लिए सूचना तकनीक कानून के तहत यहां बताए गए अपराधों के लिए कानून की विभिन्न धाराओं में सजा का प्रावधान है-

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- धारा 66: कंप्यूटर संसाधनों और आंकड़ों से छेड़छाड़ करने या उन्हें नष्ट करने पर सजा।
- धारा 66A: इंटरनेट पर प्रतिबंधित और भड़काऊ बयान या सूचनाएं भेजने पर कार्रवाई।
- धारा 66B: चोरी की गई सूचनाएं या कंप्यूटर उपकरण रखने पर सजा।
- धारा 66C: किसी की डिजिटल पहचान (Identity) चुराने पर सजा।
- धारा 66D: पहचान छिपाकर किसी के व्यक्तिगत आंकड़ों से छेड़छाड़ या धोखाधड़ी करने पर कार्रवाई।
- धारा 66E: किसी व्यक्ति की निजता (Privacy) भंग करने पर सजा।
- धारा 66F: इंटरनेट के माध्यम से साइबर आतंकवाद फैलाने पर कड़ी सजा।
- धारा 67: इंटरनेट पर आपत्तिजनक सूचनाएं प्रकाशित करने या भेजने पर मुकदमा और सजा।
क्या है आईटी अधिनियम की धारा 67?
आईटी अधिनियम की धारा 67 के अंतर्गत यदि कंप्यूटर या मोबाइल जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम द्वारा इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामुदायिक नफरत से भरे तथ्यों को भेजा जाता है, तो ऐसा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसके तहत यदि कोई पहली बार दोषी पाया जाता है, तो उसे 3 साल की सजा एवं 5 लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। यदि ऐसा अपराध दोबारा किया जाता है, तो दोषी को 5 वर्ष की सजा एवं 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इतना ही नहीं, अपराध की गंभीरता के अनुसार मामूली सजा से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।
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आईपीसी के तहत भी हो सकती है सजा
वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय में सूचना तकनीक कानून की धारा 66A को निरस्त कर दिया गया था, जिसके तहत पुलिस सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक बयान देने वालों को सीधे गिरफ्तार कर लेती थी। अदालत का तर्क था कि यह नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है और इस प्रकार के अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) में पहले से ही समानांतर प्रावधान मौजूद हैं।

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आईटी कानून की धारा 66A निरस्त होने के बावजूद भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268 के तहत ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा, आईपीसी की धारा 499 और 500 (मानहानि) के तहत यदि पीड़ित व्यक्ति मुकदमा दर्ज कराता है, तो आरोप साबित होने पर दोषी को 2 वर्ष की सजा हो सकती है।
इंटरनेट मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए सरकार द्वारा कई आवश्यक कदम उठाए गए हैं। फर्जी खबरें (Fake News) फैलाने वाले सोशल मीडिया अकाउंट को प्रतिबंधित किया जा रहा है। लेकिन जिस तेजी से देश में साइबर अपराध बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए आम जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा, तभी कानून के प्रयास सिद्ध हो सकते हैं।
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