नवरात्रि में सीढ़ियों पर सजती है गुड़ियों की दुनिया, जानिए क्या है गोलू उत्सव की अनोखी परंपरा?

South Indian Golu Festival: भारत में त्योहार केवल पूजा-पाठ और रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये हमारी संस्कृति, कला और पारिवारिक रिश्तों को भी जीवित रखते हैं। गोलू पर्व इसमें से एक ऐसा ही अनोखा पर्व है, जिसमें सीढ़ियों पर छोटी-छोटी गुड़ियों और मूर्तियों की एक खूबसूरत दुनिया सजाई जाती है। दक्षिण भारत में नवरात्रि के दौरान मनाई जाने वाली इस परंपरा में देवी-देवताओं से लेकर गांव की जिंदगी, बाजार, शादी-ब्याह और पौराणिक कथाओं के दृश्य देखने को मिलते हैं। आइए नीचे लेख में जानते हैं गोलू पर्व से जुड़ी खास बातें।
क्या है गोलू उत्सव और कहां मनाया जाता है?
गोलू उत्सव को तमिल भाषा में 'बोम्मई गोलू' या कोलु कहा जाता है। कर्नाटक में इसे गोम्बे हब्बा और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में 'बोम्माला कोलुवु' के नाम से भी जाना जाता है। यह परंपरा मुख्य रूप से दक्षिण भारत में नवरात्रि के दौरान देखने को मिलती है। इस अवसर पर घरों और कुछ मंदिरों में गुड़ियों को सजाकर रखा जाता है। परिवार के सदस्य देवी की पूजा करते हैं और अपने रिश्तेदारों और परिवारवालों को इस सजावट को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं।
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सीढ़ियों पर क्यों सजाई जाती हैं गुड़ियां?
अब सवाल आता है कि सीढ़ियों पर गुड़ियां क्यों सजाई जाती हैं? बता दें कि गोलू उत्सव में गुड़ियों को लकड़ी या धातु से बनी सीढ़ी वाले फ्रेम पर सजाया जाता है। कई परिवार तीन, पांच, सात या नौ सीढ़ियों का इस्तेमाल करते हैं। नौ सीढ़ियों को नवरात्रि के नौ दिनों से जोड़कर देखा जाता है, हालांकि सीढ़ियों की संख्या हर परिवार में एक जैसी नहीं होती।
सीढ़ियों की सजावट में एक क्रम में की जाती है। ऊपर के हिस्से पर देवी-देवताओं की मूर्तियां और कलश रखा जाता है। इसके नीचे संतों, महापुरुषों और पौराणिक पात्रों की मूर्तियां सजाई जा सकती हैं। नीचे के हिस्से पर आम लोगों के जीवन, पशु-पक्षियों, दुकानों और गांव के दृश्यों को जगह दी जाती है।
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हर गुड़िया की अलग होती है कहानी
गोलू उत्सव में केवल देवी-देवता की मूर्तियां ही नहीं होतीं। यहां छोटे-छोटे घर, दुकानों के मॉडल, किसान, व्यापारी, संगीतकार, शादी के दृश्य और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े कई पात्र भी देखने को मिलते हैं।
उदाहरण के लिए, रामायण का कोई दृश्य उन्हें भगवान राम की कथा से परिचित करा सकता है, जबकि बाजार या गांव का दृश्य उन्हें पुराने समय की जीवनशैली के बारे में बता सकता है। इस तरह गोलू घर के भीतर ही सीखने और समझने का एक छोटा-सा माध्यम बन जाता है।
नवरात्रि में कैसे होती है गोलू की पूजा?
गोलू की तैयारियां आमतौर पर नवरात्रि शुरू होने से पहले की जाती हैं। परिवार सीढ़ियों वाले मंच को तैयार करता है, उस पर कपड़ा बिछाता है और फिर अपनी गुड़ियों तथा मूर्तियों को सजाता है। सजावट के साथ फूल, दीपक और रंगोली भी घर की सुंदरता बढ़ाते हैं। कई परिवार कलश स्थापित करके देवी की पूजा करते हैं।
नवरात्रि के नौ दिनों में पूजा, आरती और भजन होता है। नौवें दिन सरस्वती पूजा के अवसर पर पुस्तकों और संगीत के वाद्ययंत्रों को भी सम्मानपूर्वक रखा जा सकता है। हालांकि, पूजा के तरीके और उनसे जुड़े रीति-रिवाज परिवार तथा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
विजयादशमी पर पूरी होती है यह परंपरा
नवरात्रि के नौ दिनों के बाद विजयादशमी के अवसर पर गोलू उत्सव का समापन होता है। इस दिन को कई परिवार नई शुरुआत और शुभ कार्यों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। गोलू की गुड़ियों को समेटने से पहले कुछ परिवार प्रतीकात्मक रूप से किसी एक गुड़िया को लिटाकर विश्राम की मुद्रा में रखते हैं। इसके बाद गुड़ियों को सावधानी से पैक करके सुरक्षित रख दिया जाता है, ताकि अगले साल उन्हें फिर से सजाया जा सके।
गोलू की पूजा के बाद प्रसाद बांटने की परंपरा
गोलू उत्सव के बाद परिवार अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोस्तों को गोलू देखने के लिए बुलाते हैं। मेहमान सजाई गई गुड़ियों को देखते हैं, पूजा में शामिल होते हैं और परिवार के साथ समय बिताते हैं। कई घरों में महिलाओं और बच्चों को विशेष रूप से बुलाती हैं। इस मौके पर प्रसाद बांटने और गिफ्ट देने की भी परंपरा है। दक्षिण भारत के कई परिवारों में चने या दूसरी दालों से बना एक खास व्यंजन सुंडल परोसा जाता है। इसके अलावा मिठाइयां, फल और अन्य प्रसाद भी दिया जा सकता है।
हर साल नई गुड़िया जोड़ने की खास परंपरा
गोलू उत्सव की एक खास परंपरा यह है कि इसमें हर साल अपनी सजावट में नई गुड़िया जोड़ी जाती है। कई परिवार वर्षों से अपनी पुरानी गुड़ियों को संभालकर रखते हैं और नवरात्रि आने पर उन्हें फिर से बाहर निकालते हैं। इसके साथ एक नई गुड़िया जोड़ते हैं।
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पुरानी गुड़ियां बीते साल या दिनों की यादों को संजोकर रखने का काम करती हैं। नई गुड़िया जोड़ने की परंपरा सभी परिवारों में अनिवार्य नहीं है, लेकिन जहां इसका पालन होता है।
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यकीनन गोलू पर्व कोई एक साधारण त्योहार नहीं बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी संभालकर रखी गई यादों से भी जुड़ा है। साथ ही सीढ़ियों पर सजी रंग-बिरंगी गुड़ियों की दुनिया गोलू उत्सव को खास बनाती है। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें। इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हर जिंदगी के साथ।
इस लेख में दी गई जानकारी भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल (Incredible India -Navratri), भारत सरकार का उत्सव पोर्टल- तमिलनाडु का नवरात्रि उत्सव (Utsav – Navarathiri Festival), गोलू की परंपरा और उसकी सांस्कृतिक महत्ता (The Art of Living- Navaratri Golu) से ली गई है।
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- गोलू उत्सव क्या है?
- गोलू उत्सव दक्षिण भारत में नवरात्रि के दौरान सीढ़ियों पर देवी-देवताओं और गुड़ियों को सजाकर मनाया जाने वाला उत्सव है।
- गोलू उत्सव मुख्य रूप से भारत के किन राज्यों में मनाया जाता है?
- गोलू उत्सव मुख्य रूप से तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में धूमधाम से मनाया जाता है।
- गोलू की सजावट में मरपाची बोम्मई क्या होती हैं?
- गोलू की सजावट में मरपाची बोम्मई चंदन या लाल सागौन की लकड़ी से बनी पारंपरिक दूल्हा-दुल्हन की जोड़ियां होती हैं, जो पीढ़ियों से उपहार में दी जाती हैं।
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