Fri Sep 11, 2026 | Updated 10:13 PM IST

दो बच्चों की परवरिश में कैसे बनाए रखें संतुलन? सिबलिंग राइवलरी को हैंडल करने के आसान टिप्स

जब भी किसी परिवार में छोटे भाई या बहन का आगमन होता है, तो उसे देखकर बड़े बच्चे के मन में असुरक्षा की भावना पनपने लगती है। शिक्षिका तारा सुनार, शिलांग (मेघालय) ने एक ऐसी ही समस्या को कैसे सुलझाया, आइए जानते हैं उन्हीं की ज़ुबानी। साथ ही सिबलिंग राइवलरी को हैंडल करने के आसान टिप्स भी जानें।
Updated:- 2026-05-28, 18:33 IST
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Sakhi

बच्चे पालना वास्तव में आसान नहीं होता है। चाहे हम पहले से कितनी भी तैयारी क्यों न कर लें, लेकिन जन्मजात से ही हर बच्चे की आदत दूसरे से अलग होती हैं। अपनी जरूरत के अनुकूल आपको बच्चों की परवरिश के लिए अलग तरीका अपनाने की सलाह दी जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है शिक्षिका तारा सुनार की जिन्होंने अपने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद घर में सिबलिंग राइवलरी का सामना किया। उन्होंने कैसे अपनी सूझ-बूझ से दो बच्चों के बीच प्यार की भावना जगाई और उनकी देखरेख में कैसे समझदारी दिखाई, आइए यहां विस्तार से जानें।

सिबलिंग राइवलरी का कारण असुरक्षा की भावना

what is sibling rivalary

सिबलिंग राइवलरी को लेकर तारा सुनार बताती हैं कि 'मैं पेशे से स्कूल टीचर हूं और पति कॉलेज में प्राध्यापक हैं। स्कूल से जुड़े अनुभवों के कारण मुझे बाल मनोविज्ञान की अच्छी समझ है। मेरे दोनों बेटों की उम्र में चार वर्ष का अंतर है। जब छोटे बेटे का जन्म होने वाला था तो हम दोनों ने अपने बड़े बेटे को पहले से ही समझाना शुरू कर दिया था कि अब तुम्हारे साथ खेलने के लिए तुम्हारा कोई भाई/बहन आने वाला है, लेकिन बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। उनके लिए इस बदलाव को स्वीकारना मुश्किल होता है। मुझे आज भी याद है, जब मैं डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल जा रही थी तो वह रोते हुए लगातार यही कह रहा था कि मुझे कोई भाई-बहन नहीं चाहिए, मैं केवल आपके साथ रहना चाहता हूं, आप मुझे घर पर छोड़कर कहीं न जाएं। यह स्थिति हमारे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण थी। तब हमने बहुत प्यार से उसे यही समझाया कि तुम हमारे लिए सबसे खास हो और मैं जल्द ही वापस आ जाऊंगी।

जब मैं नवजात शिशु को लेकर घर वापस आई तो वह बार-बार मुझसे यही शिकायत करता था कि आप केवल छोटे भाई का ध्यान रखती हैं और मुझे ज़रा भी प्यार नहीं करती। तब मैं उसकी पुरानी तस्वीरें दिखाकर उसे यही समझाती थी कि पहले तुम भी इतने ही छोटेथे, तब तुम्हारी भी इसी तरह देखभाल होती थी और तुम हमेशा मेरी गोद में रहते थे। अब तुम बड़े और समझदार हो गए हो, लेकिन तुम्हारा भाई इतना छोटा है कि अभी इसे ज्य़ादा केयर की जरूरत है। उन दिनों समय निकालकर मैं बड़े बेटे को अपने हाथों से खाना खिलाती, ताकि वह खुद को उपेक्षित महसूस न करे। कभी-कभी जानबूझ कर मैं छोटे बेटे को उसकी गोद में रखती, ताकि अपनेे भाई के साथ उसका भावनात्मक बंधन मज़बूत हो।

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लॉकडाउन में बढ़ीं मुश्किलें

साल 2020 में कोरोना महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया। बच्चे घरों के भीतर कैद हो गए। हालांकि, उनकी ऑनलाइन क्लासेज़ होती थीं, लेकिन दो घंटे के बाद वे उनके पास ढेर सारा खाली समय होता था। फिर वे छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते रहते। मैंने महसूस किया कि घर पर खाली बैठकर उनके व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने लगा था। तब मैं उन्हें आर्ट एंड क्राफ्ट से जुड़े रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखने लगी, जहां तक संभव होता मामूली घरेलू कार्यों में बच्चों को भी शामिल करती, इससे मुझे उनकी आदतों में सकारात्मक बदलाव नजर आने लगा।

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दो बच्चों के बीच संतुलन बनाना है जरूरी

how to maintain sibling rivalary

लॉकडाउन खत्म होने के बाद अब मेरा छोटा बेटा भी स्कूल जाने लगा है। जब भी मैं किसी अच्छे कार्य के लिए उसे शाबाशी देती हूूं तो मेरा बड़ा बेटा उदास होकर शिकायत करता है कि आप केवल छोटे भाई की तारीफ करती हैं। इसलिए व्यवहार के मामले में अब मैं विशेष रूप से सचेत रहती हूं। जब भी कोई ऐसा मौका आता है तो अपने बड़े बेटे की भी तारीफ ज़रूर करती हूं। दोनों बच्चों के लिए एक साथ शॉपिंग करती हूं, ताकि बड़े बेटे को ऐसा न लगे कि मम्मी मुझे प्यार नहीं करतीं। दोनों बच्चों के लिए हमेशा एक जैसी चीजें लाती हूं। मुझे ऐसा लगता है कि सिबलिंग राइवलरी स्वाभाविक है। इसके ज़रिये बच्चे भाई-बहनों के बीच अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सीखते। साथ ही उनमें एडजस्मेंट और शेयरिंग की भावना विकसित होती है। ऐसे में पेरेंट्स की यह जि़म्मेदारी बनती है कि हम बिना किसी भेदभाव के अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दें, ताकि उनके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो।

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