Sat Sep 12, 2026 | Updated 02:57 AM IST

'मैं पराया धन नहीं हूं', विवाह की सदियों पुरानी रस्म Kanyadaan पर नई पीढ़ी के बदलते विचार

क्या कन्यादान के बिना शादी अधूरी है? जानिए विवाह की सदियों पुरानी इस रस्म का इतिहास, धार्मिक मान्यताएं और नई पीढ़ी के बदलते विचार। 'मैं पराया धन नहीं हूं' जैसी सोच के साथ आज की युवा पीढ़ी कन्यादान पर सवाल उठा रही है। क्या यह परंपरा महिलाओं को वस्तु मानने वाली मानसिकता को बढ़ावा देती है? पढ़ें इस विषय पर विस्तृत चर्चा और अलग-अलग नजरिए।
Updated:- 2026-06-11, 19:07 IST
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बेटी की शादी हर माता-पिता के लिए बेहद खास होती है। अपनी बेटी की शादी में माता-पिता अपनी जीवनभर की जमा पूंजी को लगा देते हैं। हम किसी भी धर्म या जाति में शादी से जुड़ी रस्‍मों को देख लें, सभी में आपको लगभग एक सी ही रस्‍में मिलेंगी। आज हम हिंदू धर्म में निभाई जाने वाली 'कन्‍यादान' की रस्‍म पर चार्चा करेंगे।

हिंदु रीति-रिवाज से जब किसी लड़की की शादी होती हैं, तो उसके लिए पूरी शादी में सबसे भावुक समय तब आता है, जब उसा पिता कन्‍यादान के लिए बैठता है। यह एक ऐसा समय होता है, जब बचपन से लेकर जवानी तक के वो दिन सभी उस लड़की के जहन याद बनकर उभर आते हैं, जब उसके माता-पिता उसके लिए फिक्रमंद रहते थे, उस पर पूरा अधिकार जताने के अधिकारी होते थे। बस कुछ चंद मिनटों की इस रस्‍म के बाद बेटी मां-बाप के लिए पराई हो जाती है। शादी में पंडित चीख-चीख मंत्र पढ़ते वक्‍त बोलता है कि 'अब से तुम्‍हारा पति ही तुम्‍हरा परमेश्‍वर है और उसकी आज्ञा के बिना तुम अपने पिता के घर भी नहीं जा सकती हैं।'

दुर्भाग्‍य पूर्ण बात तो यह है कि माता-पिता भी बेटी की शादी करने के बाद खुद को उसकी जिम्‍मेदारियों से हल्‍का समझने लगते हैं।

कई जगह तो ऐसी कहावतें भी प्रचलित हैं, 'बेटी की शादी हो गई, अब तो हमने गंगा नहा ली।'। वहीं कुछ माता पिता बचपन से ही बेटी को यह जता देते हैं कि वो तो पराया धन है, एक दिन उसे शादी करके दूसरे के घर जाना है। हालांकि, इस मानसिकता और रस्‍म से आजकल की पीढ़ी बिल्‍कुल भी इत्‍तेफाक नहीं रखती है। उनका सबसे पहला सवाल यही है कि क्‍या कन्‍यादान के बिना शादी अधूरी है? तो चलिए जानते हैं आखिर क्‍या शादी में कन्‍यादान का महत्‍व और क्‍यों इस रस्‍म को हो जाना चाहिए अब बंद।

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कब से शुरू हुई कन्‍यादान की रस्‍म ?

कन्‍यादान को लेकर अलग-अलग धार्मिक मत मिल जाएंगे। सनातन धर्म में इसे महादान कहा गया है। ऐसे मान्‍याता है, जो कन्‍यादान कर सकता है, उससे बड़ा दानी और कोई नहीं होता है। पुरणों में बताया गया है कि राज दक्ष ने अपनी 27 कन्‍याओं को चंद्रमा को दान कर दिया था। यह दान इसलिए किया गया था ताकि सृष्‍टि के निर्माण में भगवान श्री ब्रह्मा जी को मदद मिल सके।

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इस तरह देखा जा तो पौराणिक काल से ही महिलाओं को केवल भोग का सामन समझा गया है। कभी सृष्टि के सृजन के लिए तो कभी अपनी विलासता की भूख को मिटाने के लिए महिलाओं का अदान प्रदान चलता रहा हैं। आज भी कन्‍यादान का अर्थ निकाला जाए, तो शायद यही निकलेगा। अपने घर की रोनक को माता-पिता दूसरे के घर का वंश आगे बढ़ाने के लिए दान कर देते हैं। अब जरा सोच कर देखें दान की वस्‍तुओं को किसी के भी जीवन में कितना ही महत्‍व होता है। यही संघर्ष हर महिला को शादी के बाद करना होता है अपने ससुरल में। ससुराल में अपना स्‍थान बनाने के लिए हर महिला को बहुत सोर इम्‍तहानों से गुजरना पड़ता, तब जाकर दान का टैग उस पर से हट पाता है और वो उस घर के लिए जरूरतें पूरा करने का जरिया बन पाती हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि जब माता-पिता अपनी बेटियों की तुलना किसी सामान या धन से करना बंद करेंगे और दान के सामान की जगह उन्‍हें अपना गर्व और सम्‍मान मानेंगे, तब ही कन्‍यादान जैसी रस्‍मों के मायने बदलेंगे और उन्‍हें बंद कराने के निर्णय लिए जा पाएंगे।

क्‍या कन्‍यादान के बिना अधूरी है शादी की रस्‍म?

इसका फौरी जवाब है- नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में यह बात साफ कर दी थी हिंदू शादी में 7 फेरों का महत्‍व है। उसके बिना यह शादी अधूरी मानी जा सकती हैं, मगर कन्‍यादान को शादी के पूरे होने का आधार नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कन्‍यादान जैसी रस्‍म को निभाने से कन्‍या का पिता ही मना कर दे, तो शायद इस सोच को और बढ़ावा नहीं मिलेगा कि लड़कियां पराया धन होती हैं और शादी के बाद उसके माता-पिता का उस पर कोई अधिकार नहीं होता है।

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देखा जाए तो शादी दोनों दिलों का संगम है। दो लोग जीवनभर साथ चलने का निर्णय लेते हैं और एक दूसरे की जिंदगी में खुद को खुशी-खुशी ढालने की कोशिश करते हैं। शादी का मतलब यह नहीं है हम लड़की से उसकी पिछली जिंदगी को जीने और याद करने का हक छीन लें।

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हिंदु धर्म ही नहीं अन्‍य धर्मों, जातियों और समूहों में भी शादी से जुड़ी बहुत सारी परंपराएं हैं, जिन्‍हें आज के वक्‍त के हिसाब से बनाना या फिर खत्‍म करना जरूरी है। यह रस्‍में केवल एक महिलाएं के कंधों पर बेवजह की जिम्‍मदारी को लादने और दबाने के लिए ही बनाई गई हैं। अगर आप भी ऐसी कोई रस्‍म के बारे में जानती हैं, तो हमें anuradha.gupta@jagrannewmedia.com पर लिख भेजें। यह लेख आपको पसंद आया हो तो इसे शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह और भी आर्टिकल्‍स पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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