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सिक्के, फरमान और सल्तनत: जानिए कैसे नूरजहां के इशारों पर चलता था मुगल साम्राज्य?

बताया जाता है क‍ि मुगल काल में नूरजहां ने जहांगीर के साथ मिलकर फैसले लिए, सिक्के चलाए और अपनी चतुराई से सत्ता पर पूरी पकड़ मजबूत कर रखी थी।
Updated:- 2026-08-16, 15:50 IST
nurjahan political history

मुगल इतिहास में नूरजहां का नाम सिर्फ जहांगीर की बेगम के रूप में नहीं लिया जाता है। वह उस समय की ऐसी महिला थीं जिनका असर फैसलों पर भी साफ दिखाई देता था। खास बात तो यह है कि उस समय महिलाओं का खुलकर राजनीति में आना आम बात नहीं थी, लेकिन नूरजहां ने इस सोच को काफी हद तक बदल दिया था। जहांगीर के शासनकाल में उनका रुतबा इतना बढ़ गया था कि शाही आदेशों से लेकर बड़े राजनीतिक फैसलों तक में उनकी अहम भूमिका होती थी।

बताया जाता है कि वह सिर्फ महल के अंदर बैठकर सलाह देने वाली बेगम नहीं थीं, बल्कि शासन का काम भी संभालती थीं। उनके नाम से फरमान जारी होते थे और सिक्कों पर भी उनका नाम दर्ज हुआ था। हालांकि, उनकी बढ़ती ताकत से दरबार में विरोध भी पैदा हुआ और आगे चलकर यही उनके लिए परेशानी की बड़ी वजह बनी। हमने 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' नाम की ए‍क सीरीज शुरू की है, ज‍िसमें रोजाना ऐसी मह‍िलाओं के बारे में बताएंगे। आइए इसके बारे में जानते हैं-

जहांगीर से शादी के बाद बढ़ा नूरजहां का रुतबा

आपको बता दें कि नूरजहां का असली नाम मेहरुन्निसा था। उनका जन्म अफगानिस्तान में हुआ था। उनकी पहली शादी अली कुली खां से हुई थी, जिन्हें बाद में शेर अफगान की उपाधि मिली। शेर अफगान की मौत के बाद मेहरुन्निसा को शाही महल में रहने की जगह मिल गई। साल 1611 की बात है जब नौरोज के मौके पर जहांगीर की मुलाकात मेहरुन्निसा से हुई।

nurjahan political history (1)

इसके बाद दोनों की शादी हुई और मेहरुन्निसा को नूरजहां का नाम मिल गया। शादी के बाद धीरे-धीरे उनका रुतबा शाही दरबार में बढ़ता चला गया। ऐसा कहा जाता है कि नूरजहां पढ़ी लिखी थीं और उनका दिमाग भी बहुत तेज था। उन्हें राजनीति और प्रशासन के बारे में अच्छी खासी समझ थी। उस दौरान जहांगीर को शराब की लत थी, जिससे उनकी सेहत दिन पर दिन बिगड़ती चली गई। ऐसे में राजकाज में नूरजहां की भूमिका और मजबूत हो गई।

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शाही फैसलों में सीधे दखल देने लगी थीं

ऐसा कहा जाता है कि नूरजहां का दबदबा सिर्फ सलाह देने तक ही सीमित नहीं था, वो सरकार चलाने में सीधे फैसला भी लेती थीं। बड़े अफसरों को निर्देश देना हो या सरकारी आदेश जारी करना, सब उनके कहने पर ही होता था। उनकी ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकारी फरमानों पर जहांगीर के साथ उनके भी साइन यानी कि हस्ताक्षर होते थे। इतना ही नहीं, उस दौर में उनके नाम के सिक्के भी चलाए गए थे, जिससे यह साबित होता है कि उस समय सत्ता की असली चाबी नूरजहां के हाथों में ही थी।

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नूरजहां ने बनाया अपना राजनीतिक गुट

बताया जाता है कि इसके बाद नूरजहां ने अपनी एक अलग पावरफुल टीम बना ली, जिसमें उनके पिता गियास बेग, भाई आसफ खां और बाद में शाहजहां बने शहजादा खुर्रम शामिल थे। दरबार की राजनीति में इस ग्रुप की अच्छी पकड़ थी और नूरजहां ने अपने पिता और भाई को बड़े पदों पर बिठा दिया था। इस तरह वो अपनों के साथ में शामिल करके पूरी सत्ता को कंट्रोल कर रही थीं। हालांकि, यही आगे चलकर उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई।

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शाहजहां से क्यों बिगड़े रिश्ते?

साल 1622 के बाद की बात है जब नूरजहां के दबदबे का नया दौर शुरू हो गया। इस दौरान उनके माता-पिता का निधन हो चुका था और शहजादा खुर्रम यानी कि शाहजहां से भी उनकी लड़ाई हो गई थी। दरअसल, नूरजहां चाहती थीं कि अगला बादशाह शहजादा शहरयार बने, जबकि खुर्रम को लगता था कि नूरजहां की पावर से वो बादशाह नहीं बनने पाएंगे। इसी तनातनी से शाहजहां ने बगावत कर दी। यह सिलसिला करीब तीन साल तक चला, जिससे मुगल साम्राज्य को नुकसान पहुंचा।

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महावत खां से भी हुआ टकराव

कई रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि नूरजहां की राजनीति का अगला बड़ा मोड़ महावत खां से दुश्मनी के साथ आया था। कहा जाता है कि महावत खां ने शाहजहां की बगावत को दबा दिया था, जिससे दरबार में उसका रुतबा काफी बढ़ गया था। नूरजहां को महावत की यह ताकत पसंद नहीं आ रही थी, इसलिए उन्होंने उसे अफगानिस्तान बॉर्डर पर भिजवा दिया।

उनका ट्रांसफर करना महावत खां को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। उन्हें लगा कि उनका अपमान किया गया है। ऐसे में 1626 में उन्होंने बगावत की और बादशाह जहांगीर को ही किडनैप कर लिया। इससे नूरजहां घबराई नहीं। हालांकि, उन्होंने बाद में जहांगीर को सुरक्षित छुड़ा लिया था।

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FAQ
नूरजहां का मकबरा कहां है?
नूरजहां का मकबरा पाकिस्तान के लाहौर शहर में रावी नदी के किनारे शाहदरा बाग में बना है।  
नूरजहां की मृत्यु कब हुई थी?
सत्ता से हटने के लंबे समय बाद, साल 1645 में लाहौर में उनका निधन हुआ था।
शाहजहां और नूरजहां का क्या रिश्ता था?
शाहजहां (खुर्रम) जहांगीर के बेटे थे, इस नाते नूरजहां रिश्ते में उनकी सौतेली मां लगती थीं।
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