हरतालिका तीज में मिट्टी से शिव-पार्वती बनाने की परंपरा क्यों? जानें महत्व और पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले हरतालिका तीज व्रत का सुहागिनों के जीवन में बड़ा स्थान है। इस पावन दिन पर महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। इस व्रत की खास बात यह है कि इसमें बाजार की बनी महंगी मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती बल्कि सुहागिनें अपने हाथों से शुद्ध मिट्टी के भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाती हैं। नीचे लेख में पंडित राघवेंद्र तिवारी से जानें इस व्रत में मिट्टी की मूर्तियां बनाने की परंपरा आखिर क्यों शुरू हुई और इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा जुड़ी है।
माता पार्वती द्वारा स्वयं की गई पहली स्थापना की परंपरा
हरतालिका तीज में मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाने के पीछे सीधा संबंध माता पार्वती के उस ऐतिहासिक तप से है, जो उन्होंने शिवजी को पाने के लिए जंगल में किया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती को अपनी सखियों के साथ महल छोड़कर घने जंगल में शरण लेनी पड़ी थी, तब वहां उनके पास पूजा करने के लिए सोने-चांदी या किसी अन्य धातु की मूर्तियां उपलब्ध नहीं थीं।

उस एकांत और प्राकृतिक माहौल में माता पार्वती ने अपनी कोमल और पवित्र हाथों से नदी के किनारे की रेत और शुद्ध मिट्टी को इकट्ठा किया। उसी मिट्टी से उन्होंने सबसे पहले भगवान शिव के लिंग रूप और अपनी श्रद्धा के अनुसार उनकी प्रतिमा को आकार दिया। माता ने पूरी तल्लीनता और श्रद्धा के साथ उस मिट्टी की मूर्ति की विधि-विधान से पूजा की थी। चूंकि इस व्रत की शुरुआत ही माता पार्वती द्वारा मिट्टी की पूजा से हुई थी, इसलिए आज भी सुहागिन महिलाएं उसी प्राचीन परंपरा को जीवित रखते हुए हाथों से मिट्टी के भगवान बनाकर उनकी आराधना करती हैं।
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शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाने में मिट्टी का खास इस्तेमाल क्यों?
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मिट्टी को पंचतत्वों में से एक सबसे पवित्र और शुद्ध तत्व माना जाता है। सनातन संस्कृति में यह मान्यता है कि इस सृष्टि की हर रचना अंततः इसी मिट्टी में विलीन हो जाती है और जीवन का आधार भी यही है। जब सुहागिनें अपने हाथों से मिट्टी को गूंथकर भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरूप देती हैं, तो यह इस बात का प्रतीक होता है कि उनकी आस्था और भक्ति बिल्कुल इस कच्ची और पवित्र मिट्टी की तरह ही निर्मल, सच्ची और अडिग है।
इसके अलावा, हाथों से मूर्ति बनाना इस बात को भी दर्शाता है कि पूजा सिर्फ दिखावे या बाजार की महंगी चीजों की मोहताज नहीं होतीबल्कि इसके लिए सच्चे मन, समर्पण और भावना की जरूरत होती है। बालू या मिट्टी से बनाए गए इन स्वरूपों को बाद में विधि-विधान से जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
मिट्टी की मूर्ति बनाने को लेकर पौराणिक कथा
इस परंपरा से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने जब राजा हिमालय के महल का त्याग किया और जंगल की गुफा में बालू के शिवलिंग की स्थापना करके कठोर साधना शुरू की, तो उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया था। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन उन्होंने बिना कुछ खाए-पिए लगातार भगवान शिव की आराधना की। उनकी इस कठिन तपस्या और मिट्टी से बनाए गए शिवलिंग के प्रति अटूट प्रेम को देखकर भोलेनाथ बहुत प्रसन्न हुए।

भगवान शिव ने उसी बालू के शिवलिंग से प्रकट होकर माता पार्वती को उनकी तपस्या का फल दिया और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। तभी से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि जो भी स्त्री इस दिन पूरी निष्ठा से अपने हाथों से मिट्टी के शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करती है, उसे माता पार्वती जैसा अखंड सौभाग्य और शिवजी जैसा वर मिलता है।
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अगर आपको हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी की मूर्ति बनने के पीछे का कारण और महत्व के बारे में नहीं पता था, तो यकीनन पंडित के द्वारा बताई गई जानकारी से समझ आ गया होगा। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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- भगवान शिव ने पार्वती जी को पत्नी रूप में कब स्वीकार किया?
- माता पार्वती की वर्षों की कठिन तपस्या और अटूट विश्वास को देखकर शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया।
- हरतालिका तीज व्रत में फुलेरा का क्या महत्व है?
- हरतालिका तीज में शिव-पार्वती की प्रतिमा के ऊपर फूल और पत्तों से सजाया गया 'फुलेरा' भगवान शिव के पांच पुत्रियों का प्रतीक माना जाता है।
- हरतालिका तीज व्रत का पारण कब और कैसे किया जाता है?
- हरतालिका तीज में अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद चतुर्थी तिथि को मूर्तियों के विसर्जन और ब्राह्मण भोजन के बाद व्रत खोला जाता है।
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