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पढ़ाई या नौकरी के लिए दूर जा रहे हैं बच्चे? माता-पिता ऐसे संभालें अकेलापन

जब बच्चे पढ़ाई या नौकरी के लिए घर छोड़ते हैं, तो माता-पिता अक्सर अकेलेपन का अनुभव करते हैं। इस बदलाव को स्वीकार कर, नए शौक अपनाकर और अपने साथी के साथ समय बिताकर वे इस दौर को खूबसूरत बना सकते हैं।
By Sakhi Digital | Edited By Garima Garg
Updated:- 2026-07-13, 16:27 IST
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हर माता-पिता का यही सपना होता है कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद व्यावसायिक जीवन में सफलता के शीर्ष पर पहुंचें। आज के दौर में यह सपना साकार करने के लिए शिक्षा और रोजगार के अच्छे अवसरों की तलाश में अधिकतर किशोरों और युवाओं को अपना घर छोड़कर दूसरे शहर में या विदेश जाना पड़ता है। इसी वजह से स्कूल की पढ़ाई पूरी होते ही अधिकतर छात्र अपनी रुचि से जुड़े क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए अपने घर से दूर चले जाते हैं। जहां एक ओर पैरेंट्स को बच्चों की कामयाबी से खुशी होती है, वहीं दूसरी ओर उन्हें अकेलापन खटकने लगता है। इस लेख में मनोवैज्ञानिक सलाहकार संजना श्रॉफ से भी बात की है।

माहौल में सूनापन

ऐसे में पैरेंट्स के लिए बच्चों के साथ दूरी को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है। भले ही वे कॉलेज जाने की उम्र में पहुंच चुके हों, फिर भी माताओं को हर पल इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उनके बच्चों को कोई तकलीफ न हो। वे सुबह से शाम तक उनकी मनपसंद डिशेज बनाने के लिए किचन में जुटी रहती हैं, लेकिन जैसे ही बच्चे उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलते हैं, तो सारी चहल-पहल थम सी जाती है। हर मां को अचानक ऐसा लगता है कि अब उसके पास कोई काम नहीं है।

आमतौर पर पिता अपनी भावनाओं का इजहार नहीं करते, पर घर का सूनापन उन्हें भी रास नहीं आता। पहले सुबह-शाम बच्चों की धमाचौकड़ी, प्यार भरी नोकझोंक और थोड़ी सी डांट-फटकार से माहौल हमेशा गुलजार रहता था। अब पूरे घर में सूनापन छा जाता है। माताएं इस बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। जिस तरह कुछ समय बाद पक्षियों के नन्हे बच्चे अपना घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं, वही स्थिति हमारे घरों की भी होती है।

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मानसिक तैयारी है जरूरी

मनोवैज्ञानिक सलाहकार संजना श्रॉफ के अनुसार, पढ़ाई या जॉब के लिए बच्चों के बाहर जाने के बाद माता-पिता जिस उदासी भरी मनोदशा से ग्रस्त होते हैं, मनोविज्ञान की भाषा में उसे 'एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम' कहा जाता है। अपने जीवन में अचानक आने वाले इस खालीपन की वजह से कुछ स्त्रियों में डिप्रेशन जैसे लक्षण भी नजर आते हैं क्योंकि उन्हें अपने जीवन का कोई उद्देश्य नजर नहीं आता। हालांकि, माता-पिता को यह समझना चाहिए कि खास उम्र के बाद बच्चों को भी पढ़ाई और करियर के लिए थोड़े पर्सनल स्पेस की जरूरत होती है। अतः समझदारी इसी में है कि पैरेंट्स इस बदलाव को स्वीकार करने की कोशिश करें।

लखनऊ की होममेकर अलका शर्मा कहती हैं, "जब मेरी छोटी बेटी एमबीबीएस करने के लिए दिल्ली जा रही थी, तो शुरुआत में मेरे लिए भी इस बदलाव को स्वीकार करना मुश्किल था। मुझे ऐसा लग रहा था कि अब मेरे पास कोई काम ही नहीं है। मैं उसके खाली कमरे और स्टडी टेबल को देखकर अक्सर रोती रहती थी। कुछ महीने बीतने के बाद अपनी इस उदासी को दूर करने के लिए मैंने अपने घर के खाली हिस्से में लड़कियों के लिए पीजी की व्यवस्था करवा दी। इससे मेरा अकेलापन दूर हो गया और थोड़ी आमदनी भी होने लगी। मैं रोजाना लड़कियों से उनका हाल पूछ लेती हूं। उनकी वजह से हमारे घर में रौनक बनी रहती है।"

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अपने लिए निकालें समय

अगर आप जरा पीछे मुड़कर देखें तो आपको खुद ही इस बात का एहसास होगा कि लगभग 18-20 वर्षों तक बच्चों की परवरिश में व्यस्त होने के कारण पहले आपके पास अपने लिए जरा भी वक्त नहीं होता था। बच्चों की हर सुविधा का ध्यान रखने वाली मां अपने लिए जरा भी वक्त नहीं निकाल पाती थी।

नागपुर की होममेकर आशा जोशी कहती हैं, "मेरे दोनों बेटे उच्च शिक्षा के लिए देश से बाहर जा चुके हैं। उनके जाने के बाद अचानक बहुत खालीपन महसूस होने लगा। किसी भी काम में मेरा मन नहीं लगता था। अगर उनका कॉल आने में जरा भी देर हो जाए तो मेरी घबराहट बढ़ जाती थी। इसलिए रोजाना सुबह-शाम मैं खुद ही उन्हें कॉल कर लेती थी। पहले बहुत अकेलापन महसूस होता था, लेकिन अपनी उदासी दूर करने के लिए आजकल मैं अपनी पुरानी हॉबी सिलाई-कढ़ाई की ओर रुख कर चुकी हूं। मेरा खाली समय ऐसी क्रिएटिव एक्टिविटीज के साथ मजे में कटता है। वीडियो कॉल और व्हाट्सएप के जरिए मैं बच्चों से जुड़ी रहती हूं। सच कहूं तो घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से पहले अपने लिए जरा भी फुर्सत नहीं मिलती थी, पर अब मैं जीवन के इस सुकून भरे दौर को जी भरकर एंजॉय करने लगी हूं।"

खूबसूरत है यह दौर

नई गृहस्थी की शुरुआत में अधिकतर दंपती बच्चों की परवरिश और अन्य जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं, इसलिए वे चाहकर भी अपने साथी को समय नहीं दे पाते। लेकिन जब बच्चे अपनी पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त हो जाते हैं, तो यही वह दौर होता है, जब पति-पत्नी एक-दूसरे को क्वालिटी टाइम दे पाते हैं।

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धनबाद की सुधा मिश्रा कहती हैं, "हमारे जीवन का शुरुआती दौर काफी मुश्किलों से भरा था। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए। उस दौरान हमें अपने बारे में सोचने की भी फुर्सत नहीं होती थी। जब मेरे छोटे बेटे ने मेडिकल कॉलेज का रुख किया, तो हमें थोड़ी उदासी जरूर महसूस हुई, लेकिन मुझे मालूम था कि उसके बेहतर भविष्य के लिए यह बहुत जरूरी है। बच्चे इस काबिल हो गए हैं कि वे अपना ख्याल खुद रख सकें, इसलिए अब हम एक-दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताते हैं और अपनी रुचि से जुड़े कार्यों में व्यस्त रहते हैं। पर्याप्त समय होने के कारण हम अपनी सेहत का भी पूरा ख्याल रखते हैं।"

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दोनों पीढ़ियों का नजरिया

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम की मनोदशा पर एक ही परिवार की मां और बेटी क्या सोचती हैं, आइए जानते हैं यहां:

  • हमेशा रहती हूं सक्रिय (माधुरी वर्मा, गाजियाबाद): मुझे ऐसा लगता है कि आज के जमाने में हमें खुद को इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए कि हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए हमारे बच्चों को शहर या देश से बाहर जाने की जरूरत पड़ सकती है। हमारा बेटा वरुण पिछले बारह वर्षों से घर से दूर है और बिटिया शगुन पांच साल पहले एमबीए करने के लिए बेंगलुरु गई थी और अब वहीं जॉब कर रही है। खास उम्र के बाद बच्चे अपनी दुनिया में खुश रहते हैं और अब मैं भी अपनी हाउसिंग सोसायटी की सांस्कृतिक गतिविधियों में व्यस्त रहती हूं। फोन पर बच्चों से बात हो जाती है, इसलिए अकेलापन महसूस नहीं होता।

  • जागरूक हैं पैरेंट्स (शगुन, बेंगलुरु): जब मैं पढ़ाई के लिए पहली बार घर से दूर जा रही थी, तो इस बात को लेकर मन में थोड़ी चिंता जरूर थी कि मेरी अनुपस्थिति में मम्मी-पापा अकेले पड़ जाएंगे। खैर, कोविड की वजह से घर वापस आ गई और वर्क फ्रॉम होम की सुविधा के कारण मैं लगभग दो वर्षों तक पैरेंट्स के साथ रही। वह भी बड़ा दिलचस्प अनुभव था। घर पर इतना लंबा वक्त बिताने के बाद बेंगलुरु वापस जाते समय मन थोड़ा उदास हो रहा था, लेकिन उस दौरान पैरेंट्स से बातें करके मुझे ऐसा लगा कि आज के अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के प्रति बहुत जागरूक हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि अब पुरानी पीढ़ी समय के साथ आने वाले बदलावों को सहजता से स्वीकार करने लगी है।

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विनीता

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