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क्या आपको पता है बैग, जूते और कपड़े को चिपकाने वाली पट्टी वेल्क्रो कहां से आई ?

रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसी कई चीजें रोजाना इस्तेमाल करते हैं, जिसके आविष्कार की कहानी के बारे में हमें नहीं पता हो है। इसी में से एक है बैग, जूते और कपड़े को चिपकाने वाला वेल्क्रो यानी चिपकाने वाली पट्टी। नीचे लेख में जानें-
Updated:- 2026-07-09, 09:37 IST
History of Velcro

बचपन में हम सबने अपने जूतों, स्कूल बैग या सैंडल पर लगी उस पट्टी को बार-बार चिपकाया और छुड़ाया है, जिससे 'चरर-चरर' की मजेदार आवाज आती है। अंग्रेजी में इसे वेल्क्रो और बोलचाल की भाषा में इसे चिपकने वाली पट्टी, चिटकनी भी कहते हैं। कपड़े या बैग में जब बटन और चैन न लगाना हो, तो यह पट्टी कमाल की साबित होती है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि झट से बंद करने वाली यह पट्टी, जो हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है वह कैसा बना है? आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी खोज किसी लैब में नहीं बल्कि प्रकृति में मौजूद पौधे के फल से आया था। चलिए नीचे लेख में पढ़ें इसके अविष्कार की पूरी कहानी-

कुत्ते के बाल और कपड़े पर चिपके कांटे से निकला आइडिया

अगर आप काफी झाड़ियों या फिर जंगल में खाएं होंगे कि आपने भी इस कांटेनुमा बीज को जरूर देखा होगा। वेल्क्रो की कहानी कुछ इसी प्रकार शुरू हुई। साल 1941 में स्विट्जरलैंड के एक इंजीनियर जॉर्ज डी मेस्ट्रल अपने पालतू कुत्ते के साथ पहाड़ों पर सैर करने निकले थे।

velcro seeds

वे जब वापस लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनके कपड़ों और कुत्ते के बालों पर छोटे-छोटे जंगली पौधों के बीज चिपके हुए थे। हिंदी में हम इन बीजों को गोखरू भी कहते हैं, जो अक्सर घास-फूस में जाने पर कपड़ों से चिपक जाते हैं।

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बीज की बनावट से बना वेल्क्रो

जॉर्ज डी मेस्ट्रल ने जब इन बीजों को देखा तो वह बड़ी मजबूती से चिपके हुए थे। इसके बाद उन्होंने उन बीजों को फेंका नहीं, बल्कि उन्हें निकालकर माइक्रोस्कोप के नीचे रखा। इसके बाद उन्हें उन छोटे-छोटे बीजों पर सैकड़ों छोटे-छोटे हुक बने हुए थे। ये हुक कपड़ों के धागों और कुत्ते के बालों के छल्लों में जाकर बुरी तरह फंस गए थे। इसके बाद उन्होनें इस सिद्धांत पर एक पट्टी बनाई, जिसे वेल्क्रो के नाम से जानते हैं।

वेल्क्रो या चिपकाने वाली पट्टी को बनाने लगा लंबा समय

जॉर्ज को वेल्क्रो बनाने में लगभग 14 साल का लंबा समय लगा। उन्होंने कई तरह के कपड़ों के साथ प्रयोग किए और आखिरकार नायलॉन की मदद से दो तरह की पट्टियां बनाईं। एक पट्टी पर छोटे-छोटे हुक थे और दूसरी पट्टी पर मखमली छल्ले थे। इन दोनों को जब आपस में दबाया जाता, तो ये मजबूती से चिपक जाते और खींचने पर आसानी से अलग हो जाते।

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इस पट्टी को कैसे मिला वेल्क्रो नाम?

अब सवाल आता है कि इन बीजों के सिद्धांत पर बनने वाली इस पट्टी को वेल्क्रो कैसे पड़ा? बता दें कि जॉर्ज ने फ्रेंच भाषा के दो शब्दों Velour जिसका मतलब (मखमल) होता है और दूसरा शब्द Crochet जिसका अर्थ हुक है। इन दोनों शब्दों को मिलाकर Velcro नाम रखा और 1955 में इसका पेटेंट कराया।

नासा के अंतरिक्ष यात्रियों से मिली दुनिया को इसकी पहचान

वेल्क्रो जब बनकर तैयार हुआ तो इसे कुछ खास पसंद नहीं किया गया। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने जब इसका इस्तेमाल स्पेस सूट और स्पेस क्राफ्ट में सामान को एक जगह टिकाए रखने के लिए करना शुरू किया। इसके बाद वेल्क्रो को नई पहचान मिली।

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इस स्टोरी को पढ़ने के बाद आप जब भी बैग, जूते या फिर कपड़े पर लगे वेल्क्रो को देखेंगी कि तो आपको इसके अविष्कार के पीछे की कहानी जरूर याद आएगी। 

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Image Credit- ai

 

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