
शादी न सिर्फ दो लोगों के बीच का बंधन है बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का मिलन भी है। शादी से जुड़ी कई अन्य बातों के अलावा परंपराओं और रीति-रिवाजों से भी जुड़ी ऐसी चीजें हैं जो आपको इसके बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं। शादी की हर एक रस्म का एक मतलब होता है और हर परंपरा का अलग पहलू। शादी से जुड़ी सभी परंपराएं चाहे वह दूल्हा-दुल्हन को हल्दी लगाना हो या अग्नि के चारों ओर विवाह की शपथ लेना हो, सभी का अपना अलग महत्व है। इनमें से कुछ परंपराएं भले ही मामूली लगें, लेकिन वास्तव में, ये किसी उद्देश्य से की जाती हैं। इन्हीं में से एक है शादी के समय होने वाली विदाई की रस्म जिसमें लड़की मायके से विदा होती है। इस रस्म में लड़की हाथों से चावल पीछे की तरफ फेंकती है। यह शादी के बंधन का सबसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक क्षण होती है। इस दौरान दुल्हन जब अपने मायके से विदा होती है, तो वह घर की दहलीज़ पार करते हुए पीछे की ओर चावल फेंकती है। यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा ज्योतिष और आध्यात्मिक महत्व छिपा है। आप सबके मन में कभी न कभी ये सवाल जरूर आया होगा कि विदाई के समय आखिर चावल क्यों पीछे फेंका जाता है। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें इस रस्म और इसके महत्व के बारे में विस्तार से।
शास्त्रों में चावल को शुभता, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। जब दुल्हन अपने घर की ओर मुड़कर चावल पीछे की ओर फेंकती है, तो यह रस्म इस बात का प्रतीक होती है कि वह अपने मायके में सुख, शांति और धन की स्थिरता का आशीर्वाद छोड़कर जा रही है। वह अपने पीछे समृद्धि की ऊर्जा को प्रवाहित करती है, जिससे उसका मायका हमेशा खुशहाल बना रहे। ज्योतिष की मानें तो चावल का संबंध चंद्र ग्रह से होता है, जो मन, भावनाओं और परिवार का कारक ग्रह होता है। इसलिए यह क्रिया दुल्हन के मन के प्रेम, अपनापन और भावनात्मक बंधन का प्रतीक मानी जाती है।
अक्षत का इस्तेमाल किसी भी पूजा-पाठ में करने से शुभता बनी रहती है। ऐसे ही जब विदाई के समय बेटी घर की दहलीज को पार करते हुए चावल पीछे फेंकती है तो ये इस बात को दिखाता है कि वो ढेरों शुभकामनाएं पीछे छोड़ रही है जो उसके मायके को हमेशा समृद्ध रखेंगी। चूंकि चावल को चंद्रमा से जोड़ा जाता है और चंद्रमा को मातृत्व, करुणा और भावनाओं का ग्रह कहा गया है। इसलिए चावल चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं और जब दुल्हन उन्हें पीछे चावल फेंकती है, तो इसका अर्थ है कि वह अपनी मातृ ऊर्जा और प्रेम उसी घर में छोड़ रही है। ऐसा कहा जाता है कि यदि दुल्हन चावल फेंकते समय मन में प्रेम, कृतज्ञता और आशीर्वाद का भाव रखे, तो यह उसके मायके के लिए सदैव मंगलकारी होता है।

ऐसा माना जाता है कि जब नई दुल्हन मायके से विदाई के समय अक्षत पीछे फेंकती हैं तब वो मायके के साथ ससुराल की समृद्धि की कामना भी करती है। ऐसा माना जाता है कि जब दुल्हन विदाई के वक्त अक्षत पीछे फेंकती है, तब वह अपने मायके के लिए सुख, शांति और उन्नति की कामना करती है, साथ ही अपने ससुराल की भी समृद्धि और स्थिरता की प्रार्थना करती है। चावल को शास्त्रों में मां लक्ष्मी और चंद्रदेव से जुड़ा माना जाता है, जो घर में सौभाग्य और शीतलता का संचार करते हैं। ऐसे में यह रस्म केवल एक भावनात्मक क्षण नहीं बल्कि शुभता, प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक भी मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस कर्म से दोनों परिवारों के बीच ऊर्जा का संतुलन बना रहता है और नवविवाहित जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं।
वास्तव में शादी से जुड़ी हर एक रस्म का अपना अलग महत्व है और ये सभी रस्में लड़के और लड़की के परिवारों को खुशहाल बनाने में मदद करती हैं। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर शेयर और लाइक जरूर करें। इसी तरह के अन्य आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी से।
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