शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत होने वाली है। नवरात्रि या दुर्गा पूजा की धूम बंगाल में देखने लायक होती है। बंगाल की दुर्गा पूजा सिर्फ मां दुर्गा की पूजा करने का त्योहार नहीं है बल्कि यहां इससे जुड़ी एक पारिवारिक भावना भी है। दरअसल, बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को सिर्फ शक्ति का प्रतीक नहीं माना जाता है बल्कि उन्हें बेटी उमा के रूप में पूजा जाता है, जो साल में 9 दिनों के लिए अपने मायके आती है।

यही वजह है कि दुर्गा पूजा में मां का स्वागत, उनके साथ बिताए दिन और फिर उनकी विदाई में एक अलग ही अपनापन नजर आता है। माना जाता है कि मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं और फिर विजयादशमी पर वापस चली जाती हैं। आइए इसके बारे में जानते हैं-

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बंगाल में मां दुर्गा को बेटी क्यों मानते हैं?

आपको बता दें कि बंगाल की परंपरा में मां दुर्गा को सिर्फ देवी नहीं बल्कि घर की बेटी (उमा) माना जाता है। लोगों की मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्रि में दुर्गा पूजा के दौरान अपने मायके आती हैं। इसलिए बंगाल में दुर्गा पूजा का माहौल बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसे किसी शादीशुदा बेटी के कुछ दिनों के लिए अपने मायके आने पर होता है। यही वजह है कि बंगाल की दुर्गा पूजा बाकी जगहों से थोड़ी अलग और खास होती है। यहां मां दुर्गा को देखकर भक्तों के दिल में सिर्फ पूजा-पाठ की श्रद्धा ही नहीं होती बल्कि अपनी बेटी के घर लौटने जैसी अपनों वाली खुशी होती है।

महालया से शुरू होता है मां दुर्गा के आने का इंतजार

दुर्गा पूजा से पहले महालया का खास महत्व है। इसी के साथ मां के आगमन का माहौल बनने लगता है। बंगाल में महालया की सुबह मां दुर्गा के आने की तैयारी और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं का खास हिस्सा मानी जाती है। 2026 में महालया 10 अक्टूबर को है।

आगमन यानी बेटी के घर आने जैसी खुशी

जब पूजा के दिनों में मां दुर्गा की प्रतिमा पंडाल में स्थापित होती है, तो इसे ऐसा माना जाता है कि‍ वे घर आई हैं। मां अकेली नहीं आतीं बल्कि उनके साथ उनके चार लोग आते हैं। इसलिए बंगाल के कई पंडालों में मां दुर्गा के साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, भगवान गणेश और भगवापन कार्तिकेय की प्रतिमाएं भी दिखाई देती हैं।

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सिंदूर खेला में दिखता है मां से बेटी वाला रिश्ता

बंगाल में विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला होता है, जो कि बंगाल की सबसे खास परंपराओं में से एक है। शादीशुदा महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद मां की विदाई होती है।

विदाई के समय क्यों हो जाती हैं आंखें नम?

दुर्गा पूजा की सबसे भावुक बात यही है कि जिस मां का कुछ दिनों तक बेटी की तरह स्वागत किया जाता है, उन्हें दशमी के दिन विदा भी किया जाता है। प्रतिमाओं के विसर्जन वाले दिन मां अपने घर कैलाश लौट जाती हैं। इस दौरान ढाक की आवाज, जयकारे और नम आंखों के बीच लोग मां को अगले साल फिर आने की बात कहकर विदा करते हैं।

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