'एक महिला का कानून से क्या लेना-देना...' एक वक्त पर हमारे समाज में यही कहा और माना जाता था। आज भले ही महिलाएं वकालत के क्षेत्र में या फिर अन्य किसी फील्ड में खुद को बखूबी साबित कर रही हैं, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसके लिए कई महिलाओं ने हिम्मत और हौंसले से साथ लड़ाई लड़ी है। ऐसी ही एक महिला थीं कॉर्नेलिया सोराबजी। जिस समय पर महिलाओं के वकालत करने पर रोक थी, उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया जाता था, उस समय पर कॉर्नेलिया ने अपने साहस और दृढ़ संकल्प से इतिहास रच दिया। उन्होंने महिलाओं के हक की आवाज उठाई और उनके लिए अदालत के रास्ते भी खोले। हमारी खास सीरीज 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' में चलिए आज आपको उनकी कहानी और हिम्मत से भरे उनके सफर के बारे में बताते हैं।
भारत की पहली महिला वकील कॉर्नेलिया का सफर
कॉर्नेलिया सोराबजी का जन्म 15 नवंबर 1866 को नासिक में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनकी मां फ्रांसेस फोर्ड सोराबजी एक समाज सुधारक थीं। उन्होंने उस दौर में महिलाओं की शिक्षा के लिए कई काम किए थे और धीरे-धीरे कॉर्नेलिया को भी महिलाओं के हक से जुड़े कामों में दिलचस्पी पैदा होने लगी। उनकी पढ़ाई में गहरी रुचि थी और उनकी सोच उस जमाने से काफी आगे थे। साल 1888 में उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से साहित्य में डिग्री प्राप्त की। 1892 में कॉर्नेलिया बैचलर ऑफ सिविल लॉ की परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बनीं, लेकिन कॉलेज ने उन्हें डिग्री देने से मना कर दिया। यहां तक कि जब वह बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए पहुंचीं, तो यह कहकर उनका आवेदन रिजेक्ट कर दिया गया कि वह एक महिला हैं।
ऑक्सफोर्ड में पढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं
कॉर्नेलिया ने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके और हर मुश्किल का डटकर सामना किया। साल 1889 में वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय गईं और ऑक्सफोर्ड में पढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। ब्रिटेन में पढ़ाई के लिए उन्होंने स्कॉलरशिप हासिल की थी। हालांकि, उस वक्त से जुड़ी कई रिपोर्ट्स में ऐसा भी कहा जाता है कि परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक मिलने के बाद भी महिला होने के चलते उन्हें स्कॉलरशिप नहीं दी गई थी।
महिलाओं के हक के लिए उठाई आवाज
कॉर्नेलिया ने उस वक्त चल रही कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाईं। उन्होंने महिलाओं के हक की पैरवी की। उस वक्त भारत में पर्दा प्रथा काफी चलन में थी। महिलाओं को बोलने या अपनी राय रखने की आजादी नहीं थी। उस समय पर कॉर्नेलिया ने इसका विरोध किया।
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कई महिलाओं को दिलाया इंसाफ
कॉर्नेलिया ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को दूर करने और उन्हें इंसाफ दिलाने की ठानी। उन्होंने कई सालों तक कानूनी सलाहकार के रूप में काम किया। इसके लिए उन्हें कोई फीस भी नहीं मिली, क्योंकि वह एक महिला थीं। उन्होंने उस वक्त करीब 600 से ज्यादा महिलाओं को इंसाफ दिलाया। आखिर में उनकी जीत हुई और उन्हें भारत में ब्रिटिश सरकार के कानूनी सलाहकार के रूप में उन्हें नियुक्त किया गया।
ऐसे बनीं भारत की पहली महिला वकील
साल 1923 में लीगल प्रैक्टिशनर्स अधिनियम के पारित होने के बाद भारत में महिलाओं को वकालत करने की आजादी मिली। इसके बाद कार्नेलिया सोराबजी कलकत्ता हाईकोर्ट में बतौर बैरिस्टर कानून की प्रैक्टिस करने वाली पहली महिला बनीं और उन्होंने नया इतिहास लिखा। साल 1929 में उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया। हालांकि, वह समाज सेवा के काम करती रहीं। 06 जुलाई 1954 को उनका निधन हो गया।
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'महिलाएं जिनके हौसले ने बदल दिया इतिहास' सीरीज में हम रोजाना ऐसी ही साहसी और दुनिया को बदलने का हौसला रखने वाली महिलाओं की कहानी आप तक पहुंचाते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। साथ ही ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
