जिन मुद्दों पर समाज चुप रहा, उन पर बेबाकी से बोली इस्मत चुगताई की कलम; जानें उनकी कहानी

बेबाक कलम, बेखौफ अंदाज और उन मुद्दों को लिखने की काबिलियत व हौंसला, जिनके बारे में बात करना भी उस वक्त पर मुश्किल हुआ करता था। कुछ ऐसी ही थी भारतीय लेखिका इस्मत चुगताई की शख्सियत। महिलाओं की जिंदगी और उनके अधिकारों के बारे में उन्होंने बहुत कुछ लिखा, कभी उनकी आलोचना हुई, कभी उन पर पाबंदी लगाई गई, तो कभी उन पर अश्लीलता फैलाने के आरोप, लेकिन वो नहीं रूकीं। इस्मत चुगताई ने उपन्यास से लेकर किस्से-कहानियां और कई कविताएं लिखीं।
जिस दौर में लड़कियों के लिए कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों को सीखना ज्यादा बेहतर माना जाता था, उस उम्र और दौर में वो लफ्जों से इश्क कर बैठीं और इतना गहरा इश्क कि किसी बेड़ी, किसी बंदिश में वो नहीं बंधीं। चलिए उनके बारे में जानते हैं।
बाल विवाह का किया था विरोध
इस्मत चुगताई का जन्म 21 अगस्त 1915 को बदायूं, उत्तर प्रदेश में हुआ था। हालांकि, कई जगह उनके जन्म का वर्ष 1911 बताया जाता है। उनके पिता एक सरकारी नौकरी में थे। इस्मत के नौ भाई बहन थे। उनके विचार बचपन से ही बंधन में बंधने को तैयार नहीं थे और वो किसी भी नियम को सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकारना चाहती थीं, क्योंकि बाकी लोग उन्हें ऐसा करने के लिए कह रहे हैं। 14-15 साल की उम्र में परिवार ने उनकी शादी तय कर दी थी। हालांकि, उन्होंने परिवार को पढ़ाई करने के लिए मना लिया और इसाबेला थोबर्न कॉलेज से बैचलर डिग्री हासिल कीं। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से टीचिंग की पढ़ाई की। एक पब्लिशर ने उनके बायो में जिक्र किया था कि वह बैचलर ऑफ आर्ट्स और बैचलर ऑफ एजुकेशन, दोनों डिग्रियां हासिल करने वाली पहली भारतीय मुस्लिम महिला बनीं।

इस्मत चुगताई को 'लेडी चंगेज खां' का मिला था टैग
इस्मत चुगताई को उनकी लेखनी शैली और बागी अंदाज के चलते 'लेडी चंगेज खां' भी कहा गया था। असल में यह नाम उन्हें उर्दू की एक अन्य मशहूर लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर ने दिया था। इन दोनों ने महिलाओं के बारे में काफी कुछ लिखा, लेकिन जहां इस्मत ने महिलाओं से जुड़े असल मुद्दों और जमीनी हकीकत पर बात की, वहीं कुर्रतुल का महिलाओं के लिए दायरा काफी बंधा हुआ था और इसी वजह से दोनों के बीच काफी मतभेद थे। दोनों लेखिकाओं के महिलाओं को चित्रित करन के अंदाज में जमीन-आसमान का अंतर था। एक बार इस्मत ने उन्हें लेकर एक लेख लिखा, जिसका शीर्षक 'पॉम पॉम डार्लिंग था'। इसी के जवाब में उन्होंने इस्मत को 'लेडी चंगेज खां' कहा था।
इस्मत चुगताई की शॉर्ट स्टोरी 'लिहाफ' पर हुआ था काफी बवाल
इस्तम चुगताई की विद्रोही कलम कई बार विवादों के घेरे में भी आई। खासतौर पर उनकी शॉर्ट स्टोरी 'लिहाफ' पर काफी बवाल भी हुआ और उन पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा था। उस वक्त पर जहां महिलाओं की इच्छाओं के बारे में खुलकर बात नहीं होती थी, उस दौर में उन्होंने 'लिहाफ' में लेस्बियन रिलेशनशिप को दिखाया। इसे लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई। इस्मत की यह कहानी 'लिहाफ', 'अदब-ए-लतीफ' पत्रिका में साल 1942 में छपी थी। इसके लिए उन्हें अदालत में भी पेश होना पड़ा था।
'अमर बेल' रही है इस्मत की लोकप्रिय कहानी
इस्मत चुगताई की कहानी 'अमर बेल' काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने अलग-अलग कहानियों में औरतों से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को दिखाने की कोशिश की और उसमें कामयाब भी रहीं। इस कहानी में एक कम उम्र की लड़की की अधिक उम्र के पुरुष से शादी की दास्तान कही गई है। यह कहानी समाज की उस सोच का आईना है, जहां महिलाओं की जरूरतों, उनकी चाहत और उनकी सोच को सबसे पीछे रखा जाता था।

साल 1941 में की थी शादी
इस्मत चुगताई ने साल 1941 में फिल्म निर्देशक और राइटर शाहिद लतीफ से शादी की थी। इनके दो बेटियां सीमा और सबरीना हुईं। कहा जाता है कि दोनों के रिश्ते में प्यार और दोस्ती भरपूर थी।
कहा जाने लगा था बोल्ड विषयों पर लिखने वाली लेखिका
इस्मत चुगताई को उनकी कहानियों के चलते उनके साथी लेखक ही एक ऐसी महिला लेखिका मानने लगे थे, जो बोल्ड विषयों पर लिखती थीं और किसी बात पर अपनी राय देने से पीछे नहीं हटती थीं। रख्शंदा जलील ने अपनी किताब 'अ रेबेल एंड हर कॉज' में लिखा है कि इस्मत को शुरू से ही उन बातों पर बेधड़क बात करना आता था, जो उन्हें सही लगती थीं और जिन पर बाकी लोग बात करने से बचते थे।
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आखिरी ख्वाहिश थी भी अलग
इस्मत चुगताई का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को मुंबई में हुआ था। उनकी आखिरी ख्वाहिश थी कि उन्हें दफनाने के बजाय उनका दाह-संस्कार किया जाए। उन्होंने कहा था कि कब्र में मिट्टी के नीचे दबने में उन्हें घुटन लगती थी।
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