Savitribai Phule Inspiring Story: तानों से लेकर पत्थरों तक सब सहा, नहीं छोड़ा शिक्षा का मिशन; बनीं भारत की पहली महिला टीचर

कल यानी 5 सितंबर को टीचर्स डे मनाया जाता है और हम गुरुओं के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं। गुरु की जीवन में बहुत अहमियत होती है, क्योंकि वे हमारी जिंदगी का अंधेरा दूर करके अपने ज्ञान की रोशनी देते हैं। यह रोशनी सभी तक पहुंचनी चाहिए ताकि सभी की जिंदगी को सही दिशा मिल सके, लेकिन एक वक्त ऐसा था जब महिलाओं तक इस रोशनी को पहुंचने नहीं दिया जाता था, उनके लिए पढ़ाई-लिखाई करना, अपने हक की बात करना और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना किसी सपने के जैसा था। उस वक्त में सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका (टीचर) बनीं। उन्होंने हर चुनौती और मुश्किल का डटकर सामना किया, खुद आगे बढ़ीं, पढ़ाई की और बाकी महिलाओं को भी शिक्षा के लिए प्रेरित किया। हमारी खास सीरीज 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' में हम आपको ऐसी ही महिलाओं के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने अपने हौसले और हिम्मत से इतिहास बनाया। चलिए आज सावित्रीबाई फुले के बारे में जानते हैं।
सामाजिक बुराइयों के खिलाफ खुलकर उठाई थी आवाज
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के के सतारा के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने महिलाओं के हक के लिए आवाज उठाई सती प्रथा व बाल विवाह जैसी बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उनका विवाह नौ साल की उम्र में ज्योतिराव फुले से हुआ था। उनके पति ने भी उनके मिशन में उनका खूब साथ दिया।

महिला शिक्षा की जलाई थी मशाल
सावित्रीबाई फुले को अगर भारत की सबसे पहली आधुनिक नारी कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। एक वक्त पर महिलाओं और पिछड़ी जाति के लोगों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। सावित्रीबाई पढ़ना चाहती थीं, लेकिन उनके पिता ने यह कहकर उन्हें पढ़ने से मना कर दिया कि यह केवल पुरुषों का अधिकार है। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह न केवल खुद शिक्षा ग्रहण करेंगी, बल्कि अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करेंगी।
लड़कियों के लिए खोले थे 18 स्कूल
सावित्रीबाई ने महिला शिक्षा पर विशेष जोर दिया था। उन्होंने और उनके पति ने मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले थे। जब वह स्कूल में पढ़ने जाती थीं या दूसरी महिलाओं को पढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं, तो लोग उन पर पत्थर, कीचड़ और कूड़ा फेंकते थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। खुद शिक्षित होने के बाद उन्होंने सबसे पहले साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में भारत के पहले बालिका स्कूल की शुरुआत की थी। वह उस वक्त पर लड़कियों को स्कूल जाने के लिए वजीफा दिया करती थीं।

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विधवाओं और रेप विक्टिम के लिए उठाए कदम
सावित्रीबाई फुले की सोच उस वक्त की बेड़ियों में कैद नहीं थी, बल्कि काफी आगे थी। वह एक समाज सुधारक, दार्शनिक और कवयित्री भी थी। उन्होंने महिलाओं के हक, शिक्षा और जाति प्रथा को खत्म करने के लिए कई कविताएं लिखीं। जब देश में जाति प्रथा अपने चरम पर थीं, उन्होंने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंन विधवाओं के हक के लिए भी कदम उठाए थे। उस वक्त विधवाओं का मुंडन करने की प्रथा थी, जिसके खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई थी। वह दहेज के भी खिलाफ थीं और इसके खिलाफ भी उन्होंने खुलकर मोर्चा खोला था। सावित्रीबाई फुले का 10 मार्च 1897 को 66 साल की उम्र में पुणे में निधन हो गया था।
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'महिलाएं जिनके हौसले ने बदल दिया इतिहास' सीरीज में हम रोजाना ऐसी ही साहसी और दुनिया को बदलने का हौसला रखने वाली महिलाओं की कहानी आप तक पहुंचाते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। साथ ही ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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