जब पूरी दुनिया में अनिश्चितता का माहौल हो तब आप अपने धन को लेकर क्या निर्णय लेंगे? इन दिनों विश्व के विभिन्न हिस्सों में युद्ध लड़े जा रहे हैं, समाचार चैनलों पर बाजार गिरने की खबरें लगातार खबरें दिखाई जाती हैं। हम में से बहुत से लोगों के जेहन में इसे लेकर सवाल उठने लगते हैं। उन्ही सुर्खियों के साथ शुरुआत करते हैं। जब समाचारपत्र में खबरें होती हैं कि एक दिन में निवेशकों के पांच लाख करोड़ डूबे, तो उसका वास्तविक अर्थ क्या होता है? दरअसल उससे आशय निकलता है कि भारत में सूचीबद्ध सभी कंपनियों के बाजार मूल्य में उतनी गिरावट आई है। इसका ये अर्थ नहीं होता कि पांच लाख करोड़ रुपए किसी के बैंक अकाउंट से निकल गए। ये पैसा कहीं गायब हो गया, ऐसा नहीं होता। इसका अर्थ होता है कि यदि भारत में सभी निवेशक उस दिन अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे तो उन्हें एक दिन पहले के बाजार भाव से पांच लाख करोड़ रुपये राशि कम प्राप्त होगी।
अधिकांश निवेशक बिकवाली नहीं करते। सही समय की प्रतीक्षा में बिक्री न करने वाले निवेशकों को कोई घाटा नहीं होता। बस उनके शेयरों का मूल्य थोड़ा कम रह जाता है। यही समझने की बात है। खबरों में बाजार भाव गिरने से जो घाटा ध्वनित होता है, वह तब तक वास्तव में घटित नहीं होता जब तक कि निवेशक अपने शेयरों की बिक्री नहीं करते। जब आप अपनी हिस्सेदारी बेचते हैं, तभी आपको घाटा होगा।
अब ये समझने का प्रयास करेंगे कि बाजार क्यों गिरता है?
बाजार भविष्य की संभावनाओं को लेकर विश्वास को प्रतिबिंबित करता है। जब लोग युद्ध, कोई राजनीतिक घटना, किसी बड़ी कंपनी के खराब तिमाही प्रदर्शन या अर्थ से जुड़ी खबरों से बने डर के माहौल जैसी किसी भी वजह से अनिश्चितता महसूस करते हैं तो घाटे की आशंका से डर अपनी हिस्सेदारी बेचने लग जाते हैं। जब बड़ी संख्या में लोग एकसाथ बिकवाली करते हैं तो शेयरों के मूल्य घटते हैं। जिस कंपनी के शेयर होते हैं, वो रातोंरात नहीं बदलती। उनके कारखाने और कर्मचारी उसी तरह काम करते हैं, उत्पाद भी बनाए और बेचे जाते हैं। बस बाजार के मिजाज में परिवर्तन झलकता है। यह मिजाज स्वाभाविक रूप से कालांतर में पुन: परिवर्तित होता है।
वर्ष 2024 में भारत का सेंसेक्स 80 हजार का आंकड़ा पार कर गया। करीब 20 साल पहले यह छह हजार पर था। दो दशक में कई बार बाजार धड़ाम हुआ, अफरातफरी का माहौल बना, करोड़ों रुपये डूबने की खबरें सुर्खियां बनीं, पर हर बार बाजार गिरावट से उबरा और अधिक ऊंचाई पर पहुंचता गया। बाजार में गिरावट आई पर व्यवसाय तरक्की करते रहे और निवेशकों का धैर्य बना रहा है, जिसकी वजह से स्थितियां बदल गईं। धैर्य के साथ निवेश की रणनीति लाभ देती है, इस स्तंभ में हम यही समझाना चाहते हैं।
बाजार में गिरावट को कम कीमत की सेल की तरह मानें। कुछ इस तरह समझें, आप कोई खास साड़ी लंबे समय से खरीदना चाहती हैं। उसकी कीमत तीन हजार रुपये है और आपको वह महंगी लगती है। एक दिन आप उसी दुकान के सामने से गुजरती हैं और वहां सेल का बोर्ड लगा होता है। वही साड़ी सेल में दो हजार रुपये में उपलब्ध है। आप स्वयं तय करें कि मूल्य घटने की वजह से उसे छोड़कर चली जाएंगी या आगे बढ़कर उसे खरीद लेंगी। बहुत से लोग ये समझते हैं कि जब कीमतें कम हों तो वह खरीदारी का अवसर होता है, वहीं जब निवेश की बात आती है तो लोग इसके विपरीत व्यवहार करते हैं। अब सोचिए, जब कीमतें गिरती हैं तो वे डरकर अपनी हिस्सेदारी बेचना शुरू देंगे या कुछ समय रुककर प्रतीक्षा करेंगे। बिक्री का निर्णय लेना घटी हुई कीमत पर साड़ी बेचने जैसा है, जबकि खरीद से आप अपनी वार्डरोब को समृद्ध कर सकते हैं।
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हमने इस स्तंभ में एसआइपी की कई बार चर्चा की है, उसके पीछे भी यही तर्क काम करता है। बाजार के उतार-चढ़ाव से व्यथित हुए बिना हर माह एक तय तिथि पर आप चयनित म्यूचुअल फंड में निर्धारित राशि डाल देते है। जब बाजार बढ़ा हुआ होता है तो उस धनराशि से आप कम यूनिट की खरीद कर पाती हैं, वहीं जब बाजार गिरता है तो घटी हुई कीमत पर अधिक खरीद सुनिश्चित होती है। कालांतर में खरीद का औसत मूल्य आपके पक्ष में ही जाता है। कुछ निवेशक बाजार धड़ाम होने पर निवेश रोक देते हैं, उनके मुकाबले वे बहुत बेहतर स्थिति में होते हैं जिन्होंने निवेश जारी रखने का निर्णय लिया।
तो अब आप बताएं कि जब बाजार में गिरावट की खबर आती है तो आप क्या करेंगे?
आवेश में कोई निर्णय न लें। भय में लिया गया निर्णय अक्सर पछतावा दे जाता है। अगर आपकी कोई एसआइपी चल रही है तो उसे चलने दें। यही वह समय होता है जब आप चीजों को अपने लिए जोड़ सकते हैं, कम मूल्य में अधिक खरीद कर सकते हैं।
यदि आपके पास कुछ ऐसा धन पड़ा है, जिसकी अगले पांच साल तक आवश्यकता नहीं होगी तो बाजार में हलचल का समय निवेश के लिए उपयुक्त होगा। यहां खरीद के लिए आप भविष्य का पूर्वानुमान नहीं लगाते, बल्कि ये सोचते हैं कि जो चीज गत माह जिस मूल्य में मिल रही थी, वह उससे कम दाम में उपलब्ध है। अतीत के अनुभव दर्शाते हैं कि दस वर्ष बाद उसकी कीमत बढ़कर ही मिलेगी।
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अपने निवेश के फलक को देखें कि वह कितना परवर्तित हुआ है। अगर आपने पांच साल अवधि के निवेश की शुरुआत की थी, उसमें से दो साल बीत चुके हैं तब भी तीन वर्ष शेष रहेंगे। बाजार की गिरावट से बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। यदि आपको छह माह बाद ही धनराशि की दरकार होगी तो इक्विटी में डालना उचित नहीं होगा।
अगले हफ्ते हम बात करेंगे अल्पकालिक निवेशों की।
एक अच्छा निवेशक होने का यह अर्थ नहीं कि आप घटे हुए मूल्य पर खरीद करें और दाम बढ़ते ही उसे बेच दें। कुशल निवेशक वो है जो उतार-चढ़ावों के बीच धैर्य बनाए रखता है। मूल्य में गिरावट को आपदा के बजाय वो खरीद का अवसर मानता है। बाजार तो उठता-गिरता रहेगा, इस चक्र में कोई जोखिम नहीं है, पर विश्वास बना रहना चाहिए।
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