भारत देश में हर साल दशहरा बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। विजयदशमी का यह त्योहार रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले जलाने के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताएंगे, जहां रावण दहन नहीं बल्कि रथ यात्रा निकाली जाती है। भारत के उत्तरी राज्य यानी हिमाचल प्रदेश में दशहरा बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में मनाया जाने वाला दशहरा पूरी दुनिया में अपने अनोखे अंदाज के लिए जाना जाता है।

एक तरफ जहां पूरे देश में रावण दहन के साथ दशहरे के उत्सव का समापन होता है, वहीं ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में 'कुल्लू दशहरा' की भव्य शुरुआत उसी दिन यानी विजयदशमी से होती है। लगभग सात दिनों तक यह त्योहार बड़ी धूमधाम से चलता है। यहां न तो रावण के पुतले जलाए जाते हैं और न ही इसमें पारंपरिक रामलीला का मंचन होता है। यह उत्सव पूरी तरह भगवान श्री राम की भक्ति, पहाड़ी देवी-देवताओं के संगम और देव संस्कृति के लिए जाना जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कुल्लू दशहरे की अनोखी परंपरा के बारे में।

क्या है कुल्लू दशहरे का 370 साल पुराना इतिहास?

कुल्लू जिला प्रशासन का आधिकारिक पोर्टल और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का डिजिटल आर्काइव के अनुसार कुल्लू में दशहरे की परंपरा का इतिहास आज से लगभग 370 साल से भी ज्यादा पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजा जगत सिंह से अनजाने में एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गई थी। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए राजा बहुत परेशान हुए और धीरे-धीरे उनको काफी गंभीर रूप से बिमारियों का भी सामना करना पड़ा।

बीमारी के इलाज और पाप से मुक्ति पाने के लिए सिद्ध साधु पयहारी बाबा ने सलाह दी कि अगर अयोध्या से भगवान राम की पवित्र मूर्ति लाकर कुल्लू में स्थापित की जाए, तो राजा इस दोष से मुक्त हो सकते हैं। इसके बाद बाबा दामोदर दास अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति लेकर कुल्लू आए। राजा ने सन 1651 में अपना पूरा राजपाट भगवान रघुनाथ जी के चरणों में समर्पित कर दिया और उनके सेवक बन गए।

बिना रावण दहन के कैसे मनाया जाता है यह उत्सव?

कुल्लू दशहरे में रावण या अन्य राक्षसों के पुतले नहीं जलाए जाते हैं। इसकी जगह उत्सव के आखिरी दिन व्यास नदी के तट पर 'लंका दहन' के प्रतीक के रूप में सूखी घास, झाड़ियों और लकड़ियों को जलाकर यह उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कुल्लू घाटी के लगभग 300 से भी ज्यादा देवी-देवता को रथों में सजाकर ढालपुर मैदान तक ले जाते हैं। पूरे मैदान में ढोल-नगाड़े और हिमाचली लोकगीत सुनने को भी मिलते हैं।

भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथ यात्रा

उत्सव के पहले दिन भगवान रघुनाथ जी को मुख्य मंदिर से लाकर एक विशाल लकड़ी के रथ पर विराजमान किया जाता है। इसके बाद इस पवित्र रथ को खींचकर हजारों की संख्या में श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं और उत्सव की शुरुआत करते हैं। माना जाता है कि इस रथ की रस्सी को छूने से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।उत्सव के समय ढालपुर मैदान में स्थानीय लोग अपने पारंपरिक आउटफिट पहनकर हिमाचली लोक नृत्य करते हैं, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।

निष्कर्ष: हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह देवभूमि की अटूट आस्था और समृद्ध परंपरा को भी दर्शाता है। भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथ यात्रा और देवी-देवताओं का यह महासंगम देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं। अगर आप भी इस साल कुल्लू दशहरा देखने जाने का विचार बना रही हैं, तो यहां जाकर इस अनोखे उत्सव का आनंद ले सकती हैं। यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहे हर जिंदगी से।