75 दिनों तक चलने वाला भारत का अनोखा दशहरा, जहां नहीं जलता रावण; जानें फिर कैसे मनाया जाता है यह त्योहार?

भारत में दशहरा आते ही रावण दहन की परंपरा है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा अनोखा है। यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि यह पर्व स्थानीय देवी मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी परंपराओं पर केंद्रित है।
Updated:- 2026-10-20, 18:30 IST
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भारत में दशहरा आते ही रावण के बड़े-बड़े पुतले, आतिशबाजी और रामलीला की तस्वीरें सामने आने लगती हैं। मगर छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा मनाने का तरीका बिल्कुल अलग है। यहां रावण का पुतला न जलाना इस उत्सव का मुख्य आकर्षण है और न ही इसकी पहचान केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित है। बस्तर का दशहरा करीब 75 दिनों तक चलता है और इसमें आदिवासी परंपराओं, स्थानीय देवी-देवताओं, भव्य रथ यात्रा और सदियों पुरानी सांस्कृतिक मान्यताओं की खास भूमिका होती है। आज के इस लेख में हम आपको बस्तर के 75 दिनों तक चलने वाले दशहरा पर्व के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

75 दिनों तक चलने वाला दशहरा कहां मनाया जाता है?

75 दिनों तक चलने वाला दशहरा त्योहार छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर में मनाया जाता है। इसे बस्तर दशहरा या बस्तर दशहरा पर्व के नाम से जाना जाता है। देश के दूसरे हिस्सों में जहां दशहरे का संबंध मुख्य रूप से भगवान राम की ओर से रावण के वध से जोड़ा जाता है, वहीं बस्तर में यह उत्सव स्थानीय देवी मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी समाज की परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल Incredible India के अनुसार, यह उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलता है। इसमें बस्तर की अलग-अलग जनजातियों, गांवों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी होती है।

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बस्तर में क्यों नहीं जलाया जाता रावण का पुतला?

बस्तर दशहरे की सबसे खास बात यही है कि यहां रावण दहन इस त्योहार का हिस्सा नहीं है। इसकी वजह यह है कि बस्तर की दशहरा परंपरा का मुख्य केंद्र रामायण में रावण के वध की घटना नहीं, बल्कि स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा और क्षेत्र की पारंपरिक मान्यताएं हैं। बस्तर के लोग इस पर्व को मां दंतेश्वरी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के अवसर के रूप में मनाते हैं। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान, देवी-देवताओं की शोभायात्राएं और पारंपरिक रथ से जुड़े आयोजन होते हैं।

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बस्तर दशहरे से जुड़ी खास रस्में

बस्तर दशहरे की परंपरा का इतिहास कई सदियों पुराना माना जाता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर मौजूद जानकारी के अनुसार, इसकी शुरुआत 15वीं सदी के आसपास बस्तर के काकतीय राजवंश के राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल से जोड़ी जाती है। इस त्योहार की परंपराओं में जगन्नाथ पुरी की धार्मिक संस्कृति और रथ परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। समय के साथ यह आयोजन बस्तर के स्थानीय देवी-देवताओं, जनजातीय मान्यताओं और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ गया। आज भी इस उत्सव में पुरानी परंपराओं को निभाया जाता है।

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पाट जात्रा से होती है त्योहार की शुरुआत

बस्तर दशहरे की शुरुआत पाट जात्रा नाम के पारंपरिक अनुष्ठान से होती है। इस रस्म में साल की लकड़ी के एक बड़े लट्ठे को विशेष महत्व दिया जाता है। इसे जंगल से लाकर धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा जाता है। यह लकड़ी आगे होने वाले रथ निर्माण से जुड़ी परंपराओं का प्रतीक है। इस अनुष्ठान के जरिए त्योहार की औपचारिक शुरुआत होती है और स्थानीय समुदाय इसमें भाग लेते हैं।

रथ निर्माण और खींचने की परंपरा है खास

बस्तर दशहरे में भव्य लकड़ी का रथ विशेष आकर्षण होता है। इसे पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है और उत्सव के दौरान लोग मिलकर इसे खींचते हैं। रथ यात्रा में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग हिस्सा लेते हैं। रथ खींचने में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी त्योहार को एकजुटता का प्रतीक बनाती है। रथ से जुड़े अनुष्ठान बस्तर की पुरानी परंपराओं को आज की पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी हैं।

काछन गादी और जोगी बिठाई जैसी रस्में भी होती हैं खास

बस्तर दशहरे में कई ऐसी रस्में निभाई जाती हैं, जिनके बारे में देश के दूसरे हिस्सों के लोग कम जानते हैं। काछन गादी इस त्योहार की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक है। इसे काछन देवी की आराधना और उनसे त्योहार मनाने की अनुमति लेने की परंपरा से जोड़ा जाता है। यह रस्म बस्तर की स्थानीय मान्यताओं और देवी-देवताओं के प्रति लोगों की श्रद्धा को दर्शाती है। इस तरह जोगी बिठाई भी दशहरे के अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

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अलग-अलग गांवों के देवी-देवता होते हैं शामिल

बस्तर दशहरे में आसपास के विभिन्न इलाकों से स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराओं से जुड़े प्रतिनिधि और समुदाय शामिल होते हैं। इस दौरान लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचते हैं। स्थानीय रीति-रिवाज, पूजा-पाठ, संगीत और सामुदायिक आयोजन त्योहार को खास बनाते हैं। यह मेल-जोल अलग-अलग गांवों और समुदायों को एक साझा सांस्कृतिक मंच पर लाता है।

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बस्तर का 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक अनोखा उदाहरण है। यहां रावण दहन के बजाय मां दंतेश्वरी की आराधना, पाट जात्रा, भव्य रथ यात्रा, स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी रस्में और मुरिया दरबार जैसे आयोजन त्योहार की पहचान बनाते हैं।

Image Credit- Main Image (ai), Incredidal india official website


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