Traditional Kolkata Durga Puja: दुर्गा पूजा उत्सव का नाम आते ही दिमाग में सबसे पहले कोलकाता का नाम जहन में आता है। यहां के लोग पूरे वर्ष इस त्योहारा का इतंजार बेसब्री से करते हैं। इस पर्व के दौरान यहां का माहौल बेहद खास और कमाल का होता है। मगर इसी शहर में दुर्गा पूजा का एक ऐसा रूप भी है, जो आज के समय से काफी अलग है। यहां स्थित पुरानी हवेलियों में मां दुर्गा का स्वागत आज भी परिवार की परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही रस्मों के साथ किया जाता है।

नीचे लेख में पढ़ें उन जगहों के बारे में जहां आज के पंडालों से अलग मनाया जाता है मां दुर्गा का उत्सव। हालांकि, इसके लिए आपको सबसे पहले यह समझना होगा कि बोनेदी बाड़ी की दुर्गा पूजा क्या होती है?

क्या होती है बोनेदी बाड़ी की दुर्गा पूजा?

कोलकाता की पुरानी और प्रतिष्ठित बंगाली परिवारों की हवेलियों में होने वाली दुर्गा पूजा को आमतौर पर बोनेदी बाड़ी पूजा कहा जाता है। बंगाली भाषा में बोनेदी का अर्थ पुराने, प्रतिष्ठित या संपन्न परिवार से है, जबकि बाड़ी का अर्थ घर होता है। इन परिवारों में दुर्गा पूजा की शुरुआत कई पीढ़ियों पहले हुई थी और आज भी इसे उसी विरासत के साथ आगे बढ़ाया जाता है।

जहां के समय सार्वजनिक पंडालों में हर साल नई थीम, आकर्षक कलाकारी और मॉडर्न डेकोरेशन देखने को मिलती है। वहीं इसके उलट इन पुरानी हवेलियों की पूजा में पारंपरिक रीति-रिवाज, परिवार के धार्मिक नियम और पुराने पूजा स्थल खास महत्व रखते हैं। पूजा घर के आंगन या खंभों वाले खुले मंडप में होती है, जिसे ठाकुर दलान कहा जाता है।

कोलकाता में इन जगहों पर पारंपरिक तरीके से होती है दुर्गा पूजा

बदलते समय के समय पूजा-पाठ में काफी बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां दुर्गा मां की स्थापना के साथ ढोल-बाजे का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं वह इसकी जगह स्पीकर और डीजे ने ले लिया है। हालांकि, आज भी कोलकाता में कुछ जगह ऐसी हैं जहां पुराने और पारंपरिक तरीके से दुर्गा मां की आराधना की जाती है। नीचे जानें-

1. शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गा पूजा

कोलकाता की ऐतिहासिक दुर्गा पूजाओं में शोभाबाजार राजबाड़ी का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है। इस पूजा की शुरुआत राजा नबकृष्ण देव ने 1757 में की थी। यह वही साल था, जब प्लासी का युद्ध हुआ था। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के अनुसार, उस समय की यह पूजा कोलकाता के पुराने शाही और प्रतिष्ठित परिवारों की परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

शोभाबाजार राजबाड़ी की सबसे खास पहचान इसका बड़ा आंगन और ठाकुर दलान है। पहले इस पूजा में अंग्रेज अधिकारियों और उस समय के प्रभावशाली लोगों को भी आमंत्रित किया जाता था। आज भी इस राजबाड़ी की पूजा कोलकाता की पुरानी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।

2. साबर्ण राय चौधरी परिवार कोलकाता की पुराने दुर्गा पूजा में शामिल

कोलकाता में साबर्ण राय चौधरी परिवार की दुर्गा पूजा का विशेष स्थान है। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के आधिकारिक ब्लॉग के अनुसार, इस परिवार में दुर्गा पूजा की शुरुआत साल 1610 में लक्ष्मीकांत राय चौधरी ने की थी। यह परंपरा उस समय की है, जब आज के कोलकाता शहर का मौजूदा स्वरूप भी विकसित नहीं हुआ था। इसलिए इस पूजा को शहर की सबसे पुरानी पारिवारिक दुर्गा पूजाओं में गिना जाता है।

इस परिवार की पूजा की खासियत यह है कि यह कोलकाता के शुरुआती इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। परिवार का नाम शहर के विकास और उसके पुराने गांवों के इतिहास में भी मिलता है। कई सौ साल बाद भी यहां दुर्गा पूजा आयोजित होना इस बात का उदाहरण है कि पारिवारिक परंपराएं समय के साथ किस तरह आगे बढ़ सकती हैं।

3. रानी रासमणि घर में खास तरीके से होती है दुर्गा पूजा

कोलकाता के जानबाजार इलाके में स्थित रानी रासमणि का ऐतिहासिक घर भी पारंपरिक दुर्गा पूजा के लिए जाना जाता है। रानी रासमणि बंगाल के इतिहास की एक महत्वपूर्ण शख्सियत थीं। उनका नाम दक्षिणेश्वर काली मंदिर के निर्माण और धार्मिक-सामाजिक कार्यों के लिए भी प्रसिद्ध है। उनके परिवार की दुर्गा पूजा में पुराने बंगाली घरेलू उत्सव की झलक देखने को मिलती है।

इस तरह की पारिवारिक पूजा में घर का आंगन, पूजा का निर्धारित स्थान, पुरोहितों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान और परिवार के सदस्यों की भागीदारी खास महत्व रखते हैं। यहां त्योहार का अनुभव किसी विशाल सार्वजनिक आयोजन से अलग होता है। पूजा का माहौल परिवार की पुरानी परंपराओं और घर से जुड़ी धार्मिक स्मृतियों के इर्द-गिर्द बना रहता है।

इन हवेलियों में कैसे निभाई जाती हैं सदियों पुरानी रस्में?

इन पुरानी हवेलियों की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन रस्मों की होती है, जिन्हें परिवार लंबे समय से निभाता आया है। हालांकि, हर परिवार की पूजा पद्धति अलग हो सकती है। कहीं प्रतिमा बनाने का तरीका खास होता है, तो कहीं पूजा की शुरुआत, भोग तैयार करने या देवी को विदाई देने की परंपरा दूसरी जगहों से अलग दिखाई देती है।

षष्ठी से पूजा की शुरुआत- बंगाल की दुर्गा पूजा में षष्ठी का दिन देवी के स्वागत से जुड़ा होता है। पारंपरिक पारिवारिक पूजाओं में भी इस दिन से विशेष अनुष्ठानों का महत्व बढ़ जाता है। परिवार के सदस्य पूजा स्थल की तैयारी करते हैं और मां दुर्गा के आगमन का स्वागत करते हैं।

सप्तमी, अष्टमी और नवमी के अनुष्ठान- इन दिनों पूजा, मंत्रोच्चार, पुष्प अर्पण और भोग जैसी धार्मिक गतिविधियां प्रमुख होती हैं। महाष्टमी पर विशेष पूजा और संधि पूजा का महत्व है। हालांकि, इन रस्मों का सही समय और पालन परिवार की परंपरा तथा धार्मिक पंचांग के अनुसार होता है।

धुनुची नृत्य और ढाक की आवाज- बंगाल की दुर्गा पूजा में ढाक की थाप और धुनुची नृत्य का विशेष स्थान है। धुनुची में जलती धूप और सुगंधित सामग्री रखकर देवी के सामने नृत्य किया जाता है। पारंपरिक हवेलियों में इन सांस्कृतिक रूपों से पूजा का माहौल और भी खास हो जाता है।

दशमी और देवी की विदाई- विजयादशमी पर देवी को विदाई दी जाती है। बंगाली परंपरा में सिंदूर खेला भी इस दिन का एक जाना-पहचाना हिस्सा है। कुछ पारिवारिक पूजाओं में देवी की विदाई और विसर्जन से जुड़ी विशेष रस्में होती हैं, जिन्हें परिवार अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार निभाता है।

मूर्तियों और सजावट में भी दिखाई देती है पुरानी परंपरा

दुर्गा पूजा की झलक इन जगहों में न केवल पूजा बल्कि मां की मूर्ति बनावट में भी दिखाई देती है। बता दें कि बोनेदी बाड़ी की दुर्गा पूजा की एक खास पहचान पारंपरिक प्रतिमाएं भी हैं। कई पुराने परिवारों में मां दुर्गा और उनके चारों बच्चों की प्रतिमाओं को एक ही संरचना में सजाया जाता है। इस शैली को एकचाला प्रतिमा कहा जाता है। प्रतिमा के पीछे बने सजावटी हिस्से को चालचित्र कहा जाता है।

इन प्रतिमाओं में पारंपरिक शिल्प, पुराने डिजाइन और परिवार की पसंद को अधिक महत्व दिया जा सकता है। हालांकि, सभी हवेलियों में प्रतिमा का स्वरूप एक जैसा नहीं होता। कुछ परिवार अपनी विशेष परंपरा के अनुसार प्रतिमा बनवाते हैं, जबकि कुछ समय के साथ उसमें बदलाव भी करते हैं।

इन पुरानी हवेलियों की पूजा आज भी क्यों है बेहद महत्तवपूर्ण?

कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है। इस उत्सव में कला, शिल्प, संगीत, धार्मिक आस्था और सामुदायिक भागीदारी का अनोखा मेल दिखाई देता है। पारिवारिक हवेलियों में होने वाली दुर्गा पूजा इसी व्यापक सांस्कृतिक विरासत का एक खास रूप है।

इन पूजाओं को देखने का अनुभव भी अलग होता है। बड़े पंडालों में जहां लोगों का ध्यान सजावट, थीम और विशाल प्रतिमाओं पर जाता है, वहीं पुरानी हवेलियों में घर की वास्तुकला, पारंपरिक पूजा स्थल और परिवार के रीति-रिवाज लोगों को आकर्षित करते हैं। कई जगहों पर पुरानी इमारतों के खंभे, मेहराब और खुले आंगन पूजा के माहौल को ऐतिहासिक रूप देते हैं।

इनसे पता चलता है कि दुर्गा पूजा का स्वरूप समय के साथ कैसे बदला और पारिवारिक आयोजनों से लेकर बड़े सार्वजनिक उत्सवों तक कैसे पहुंचा।

आप इस नवरात्रि अगर कोलकाता की मशहूर और पारंपरिक दुर्गा पूजा का लुफ्त उठाना चाहती हैं, तो इन जगहों की सैर जरूर करें। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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