भारत देश में कई बड़े त्योहार मनाए जाते हैं। रक्षाबंधन से लेकर नवरात्रि और दिवाली तक कई त्योहार बड़ी धूमधाम के साथ सेलिब्रेट किए जाते हैं। ये त्योहार सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्था के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि हर त्योहार मिलना जुलना, खुशियों और नई चीजों की खरीदारी के लिए भी प्रसिद्ध है।अधिकतर लोग त्योहारों पर नए कपड़े, सजावट का सामान, बर्तन और खाने-पीने की कई चीजें खरीदते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में त्योहारों पर खरीदारी करने की यह परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? अगर नहीं, तो आज इस लेख में हम आपको इसी दिलचस्प सफर के बारे में बताएंगे।

प्राचीन काल और हाट-बाजार की शुरुआत

एक समय था जब लोग त्योहारों के सामान के लिए महीनों पहले गांवों में लगने वाले हाट-बाजारों का इंतजार करते थे। सालों पहले लोग बड़ी-बड़ी दुकानों और पक्के बाजारों से खरीदारी नहीं कर पाते थे। वे त्योहारों के खास मौके पर नदियों के किनारे या खुले मैदानों में लगने वाली छोटी-मोटी दुकानों से जरूरत का सामान खरीद लिया करते थे।

शुरुआती दौर में लोग कपड़े, बर्तन और ज्वेलरी जैसी चीजें खरीदने के लिए बार्टर सिस्टम यानी सामान या अनाज का आदान-प्रदान करते थे। पुराने समय में खरीदारी के लिए लगने वाले इन मेलों में लोग केवल सामान खरीदने ही नहीं जाते थे, बल्कि वहां उनका एंटरटेंमेंट, मिलना जुलना और संस्कृति को समझना भी होता था। उस दौर में लोग अपने गांव से कई किलोमीटर दूर पैदल चलकर खरीदारी करने जाते थे।

स्थानीय बाजार और मोलभाव का दौर

समय के साथ खरीदारी के तरीकों में भी कई बदलाव देखने को मिले। हर छोटे-शहर में स्थानीय बाजार या साप्ताहिक बाजार लगने लगे, जिन्हें लोग सदर बाजार या लोकल मार्केट के रूप में जानने लगे। त्योहार शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही इन बाजारों में भारी रौनक देखने को मिलती थी। इस दौर में किसी भी सामान का फिक्स प्राइस नहीं होता था। खरीदार और दुकानदार के बीच चीजों के दाम को लेकर मोलभाव होता था, जिससे शॉपिंग करने का एक अलग ही मजा मिलता था।

मॉल संस्कृति और एडवर्टाइजमेंट

धीरे-धीरे देश में डिपार्टमेंटल स्टोर्स और शॉपिंग मॉल्स की शुरुआत हुई। 90 के दशक और 2000 की शुरुआत में बड़े शहरों में मॉल्स खुले, जहां एक ही छत के नीचे कपड़े, फुटवियर और इलेक्ट्रॉनिक्स की ढेरों दुकानें मिलने लगीं। कंपनियां त्योहारों पर कस्टमर्स को लुभाने के लिए टीवी और न्यूजपेपर्स में एडवर्टाइजमेंट देने लगीं। इन एडवर्टाइजमेंट के जरिए कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स पर लकी ड्रॉ, भारी डिस्काउंट और फेस्टिव ऑफर्स की घोषणा करने लगीं, जिससे लोगों की खरीदारी का तरीका और भी मॉडर्न हो गया।

ई-कॉमर्स, मेगा सेल्स और क्विक डिलीवरी का समय

धीरे-धीरे इंटरनेट और स्मार्टफोन का जमाना आया। इसके बाद बिग बिलियन डेज और ग्रेट इंडियन फेस्टिवल जैसी कई ई-कॉमर्स कंपनियों ने त्योहारी सीजन में 'महा सेल' की शुरुआत की। इन ऑनलाइन सेल्स में लोग इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन्स और फैशन वियर पर भारी डिस्काउंट के साथ सामान खरीदने लगे।

10 से 15 मिनट में डिलीवरी

बदलते दौर में यूपीआई, क्रेडिट कार्ड, बाय-नाउ-पे-लेटर और नो-कॉस्ट ईएमआई जैसी सुविधाओं के आने से शॉपिंग का क्रेज और भी बढ़ गया, जिससे लोग महंगी चीजें भी आसानी से खरीदने लगे। आज के समय में शॉपिंग करना और भी ज्यादा आसान हो गया है। अब लोगों को त्योहारों की खरीदारी के लिए भीड़भाड़ वाले बाजारों में घंटों धक्के नहीं खाने पड़ते, बल्कि वे 10 से 15 मिनट में डिलीवरी देने वाले क्विक कॉमर्स ऐप्स के जरिए जरूरत का हर सामान घर बैठे मंगवा रहे हैं।

निष्कर्ष: पुराने समय में मिट्टी के दीये, सूती कपड़े और बाकी जरूरत का सामान खरीदने के लिए लोग कई किलोमीटर दूर पैदल जाते थे। वहीं, आज का दौर ऐसा है जब लोग सिर्फ कुछ ही क्लिक में घर बैठे अपनी मनपसंद चीजें ऑर्डर करके मंगवा लेते हैं। भले ही समय के साथ खरीदारी के साधन और तरीके पूरी तरह बदल गए हों, लेकिन त्योहारों पर नया सामान खरीदने का उत्साह और उल्लास लोगों में आज भी वैसा ही है। यही वजह है कि भारत का यह फेस्टिवल शॉपिंग कल्चर हर किसी को बेहद पसंद आता है।