अक्सर आपने देखा है भावुक फिल्में देखकर या फिर किसी इमोशनल किरदार की कहानी पढ़कर कुछ लोग रोने लगते हैं। ऐसे लोगों को भावनात्मक रूप से कमजोर समझा जाता है, लेकिन शोध ऐसे लोगों को कमजोर नहीं बल्कि संवेदनशील बताते हैं। आइए मेंटल हेल्‍थ डे के मौके पर मनोविज्ञानी से जानते हैं, लोगों के इस व्यवहार के पीछे कारण क्या है?

रोने से दिमाग को क्‍या फायदे मिलते हैं? 

जब इमोशनल फिल्म देखकर कोई रोने लगे तो आस-पास के लोग उसे भावनात्मक रूप से कमजोर समझने लगते हैं, लेकिन नीदरलैंड की यूनिवर्सिटी आफ ग्रोनिंगन की स्टडी इसका उल्टा बताती है। स्टडी के मुताबिक फिल्मों के दौरान आंसू बहाने वाले लोग ज्यादा सहानुभूतिशील होते हैं, उनके अंदर भावनाओं को समझने की शक्ति ज्यादा होती है। स्टडी यह भी कहती है कि रोने के बाद ऐसे लोग और ज्यादा सकारात्मक हो जाते हैं।

रोने के बाद अच्छा हो जाता है मूड

दरअसल, इससे पहले भी इस विषय पर कई शोध हुए हैं, उनमें भी इसी बात पर जोर दिया गया था कि ऐसे लोग फिल्म देखते वक्त रोते जरूर हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका मूड अच्छा हो जाता है, क्योंकि उनकी भावनाएं आंसू के साथ बाहर निकल रही होती हैं। मनोविज्ञानी इसका कारण यह बताते हैं कि रोने से शरीर में ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिन जैसे हार्मोन रिलीज होते हैं, जो तनाव को कम करने और मूड को बेहतर बनाने का काम करते हैं। यही नहीं, शोध बताते हैं कि इस तरह की भावनात्मक कहानियां लोगों उनके जज्बातों को और स्पष्ट तरीके से समझने और हालातों को समझने में मदद करती है।

तनाव से मिलती राहत

ऐसा नहीं है कि भावनाएं केवल आंसू के रूप में सामने आती हैं, कई बार हंसी-खुशी वाले सीन देखकर हम जोर-जोर से ठहाके लगाने लगते हैं, यह भी उसी तरह से हमारे दिमाग से जुड़ा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जो लोग ऐसा करते हैं, वे फिल्म के किरदारों को स्वयं और अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों से जोड़कर देखते हैं, इसलिए ज्यादा गहरा संबंध महसूस करते हैं। रोने के 90 मिनट बाद ऐसे लोग और ज्यादा राहत महसूस करते हैं। कभी-कभी एक दर्दनाक फिल्म देखने के कुछ घंटों बाद कुछ लोग इतना बेहतर महसूस करते हैं, जितना फिल्म देखने के दौरान नहीं किया था। यह ऐसा है जैसे किसी ने रीसेट बटन दबा दिया हो और सब कुछ फिर से शुरू हो गया हो।

निमहंस, बैंगलुरू के मनोवैज्ञानिक डॉक्‍टर टीएस जयसूर्या बताते हैं कि हाइपोथैलेमस हमारे मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का एक हिस्सा है, जिसे "भावनात्मक मस्तिष्क" भी कहा जाता है। यह ग्रंथि हमारे डर, गुस्सा, दुख, खुशी और तनाव जैसी भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करती है।

जब हम किसी गहरी भावना (दुख, खुशी, डर या तनाव) से गुजरते हैं, तब यह काम करना शुरू कर देती है। उस दौरान मस्तिष्क का भावुक हिस्सा (एमिग्डाला) हाइपोथैलेमस को एक सिग्नल व संदेश भेजता है। उसके बाद हाइपोथैलेमस हमारे आटोनोमिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय कर देता है और इस तरह की प्रतिक्रियाएं निकलने लगती हैं। यह प्रतिक्रियाएं बहुत ही आम और स्वतस्फूर्त है। दरअसल, कई बार किसी एहसास को शब्दों में बयां नहीं किया जाता, तब वे आंसू बनकर निकलते हैं, इससे मन हल्का होता है।

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लेखक- सुमन अग्रवाल

Images: magnific