अगर कभी आप लोगों के बीच होने वाली बातचीत की भाषा पर गौर करें, तो उसमें बार-बार भावनाओं का जि़क्र होता है। जैसे-उसकी बातों से मेरी भावनाएं आहत हो गईं, लोग मेरी फीलिंग्स को नहीं समझते, वह बहुत भावुक व्यक्ति है, उसकी बातें मेरे दिल को छू गईं....। सभी रिश्ते भावनाओं की डोर से बंधे होते हैं। हमारी जि़ंदगी का कोई भी पहलू इनसे अछूता नहीं है। मन के अथाह सागर में भावनाओं की असंख्य लहरें उठती-गिरती रहती हैं, जिनमें से कुछ हमें खुशी और सुकून देती हैं तो कुछ तनाव और उदासी का सबब बन जाती हैं। चाहे अच्छी हों या बुरी, हम उन्हें अपने मन में आने से नहीं रोक सकते क्योंकि यह सहज प्रक्रिया है, लेकिन सचेत तरीके से इमोशन मैनेजमेंट करते हुए उनके प्रभाव को नियंत्रित ज़रूर कर सकते हैं।
कैसे करें इमोशन मैनेजमेंट
अपने मन में आने वाली असंख्य परस्पर विरोधी भावनाओं को कैसे संभालें? यह बहुत बड़ी समस्या है। जिस तेज़ी से मनुष्य का शारीरिक विकास होता है, उसकी तुलना में उसके भावनात्मक विकास की गति बहुत धीमी होती है। युवावस्था में प्रवेश करने के बाद भी कुछ लोग भावनात्मक रूप से परिपक्व नहीं होते। इसी वजह से वे अपनी फीलिंग्स को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं। भावनाओं के इस बोझ को ढोते हुए उन्हें बहुत थकान महसूस होती है। अगर कभी हमारे जीवन में ऐसी स्थिति आए तो हमें भावनाओं की गठरी को अपने कंधे से उतारकर फेंक देना चाहिए। मन में आने वाले नकारात्मक विचारों का गहन विश्लेषण करने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश करें। कुछ लोग अकसर यही कहते हैं कि क्या करूं, मैं हर बात पर क्रोधित हो जाता हूं, मैं बहुत जल्दी उदास हो जाता हूं। अपने मन में आने वाले ऐसे विचारों को अहमियत देने के बजाय उन्हें एक झटके में त्याग दें। इसे आप छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं कि अगर आसमान में काले बादल दिखाई देते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे उसकी संपत्ति हैं। आकाश तो उन्हें केवल अपने पास से गुजऱने की अनुमति देता है। हमारे लिए भावनाएं भी उन्हीं बादलों की तरह होती हैं, जो कभी-कभी मन के आसमान पर छा जाती हैं। कुछ सुखद होती हैं तो कुछ दुखद, पर चाहे कैसी भी भावनाएं हों, उन्हें अपने मन पर हावी न होने दें। इमोशन मैनेजमेंट की दिशा में यह पहला कदम है।
आसक्ति है बड़ा अवरोध
हमारी सभी भावनाएं व्यक्ति, वस्तु या किसी परिस्थिति से जुड़ी होती हैं। वस्तुओं, व्यक्तियों या रिश्तों से अत्यधिक लगाव स्वतंत्रता एवं मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है। कभी ईमानदारी से इस बारे में सोचिए कि छोटी-छोटी बातों से अकसर आपका मनोबल क्यों टूट जाता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगर कभी किसी ने आपके साथ बुरा व्यवहार किया, तो सिर्फ यह समझिये कि वह व्यक्ति अपने मन के भीतर जमा कचरे निकालकर बाहर फेंक रहा था। संयोगवश आप उसके सामने थे और आपने उस कूड़े को अपने हाथों में पकड़ लिया। फिर उसे वर्षों तक अपने दिल में संजोकर रखा। उसकी वजह से उदास और नाराज़ रहे, फिर आपको भी गुस्सा आने लगा। ज़रा सोचिए कि किसी दूसरे की गलती के कारण बेवजह आप अपना नुकसान कर रहे हैं। इसलिए अब जागिए और किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी मुस्कान छीनने का अधिकार मत दीजिए। अपनी भावनाओं का रिमोट हमेशा अपने हाथों में रखें, ताकि आप उन्हें सचेत ढंग से नियंत्रित कर सकें।
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लहरों-सी अस्थिर हैं भावनाएं
कोई भी व्यक्ति हमेशा अच्छा या बुरा महसूस नहीं करता, सारी भावनाएं लहरों की भांति उठती-गिरती रहती हैं। किसी उठती हुई लहर को आप रोक नहीं सकते, न ही किसी गिरती हुई लहर को ऊपर उठा सकते हैं। जिस तरह सागर में लहरें और आकाश में बादल आते-जाते हैं, ठीक उसी तरह मन में भावनाओं का भी आना-जाना लगा रहता है, लेकिन हम इसे इतना बड़ा मुद्दा बना देते हैं कि भावनाएं हमारे दिलोदिमाग पर बुरी तरह हावी हो जाती हैं। लगातार उन्हें संजोकर रखने की आदत के कारण व्यक्ति के मन में ढेर सारी बेकार किस्म की भावनाएं कूड़े की तरह जमा हो जाती हैं। यह स्थिति भावनात्मक कमज़ोरी को दर्शाती है। इसलिए स्वयं को संभालें। भावनाएं सबसे अच्छी मित्र होने के साथ-साथ हमारी शत्रु भी बन सकती हैं। नकारात्मक भावनाएं, जहां हमें निर्बल बनाती हैं, वहीं उनका सकारात्मक स्वरूप हमारा मनोबल बढ़ाता है और स्वयं के प्रति सजग रहना सिखाता है। सूक्ष्म और कोमल भावनाएं हमें गहरे ध्यान में ले जाती हैं। इसके विपरीत जब भावनाएं कठोर हों, तो वेे व्यक्ति के मन एवं शरीर के लिए घातक होती हैं। जो भावना आपको भीतर से कोमल बनाए, वही आपकी मित्र और जो आपको कठोर बनाए, वह आपकी शत्रु है। भावना-रहित व्यक्ति मानसिक रूप से मृतप्राय होता है। उसके अंतस में दिव्य प्रेम का पुष्प कभी नहीं खिल सकता।
मानसिक स्वच्छता है ज़रूरी
वर्तमान दौर में, वातावरण को स्वच्छ रखने के प्रति सजगता लाई जा रही है, लेकिन हमने भावनात्मक अशुद्धियों के प्रति ध्यान ही नहीं दिया। जब हम भीतर से नकारात्मक हो जाते हैं, तब हम ऐसी ही बुरी भावनाओं को प्रोत्साहित करते हैं, जब हम अपने मन के मैल को ज्ञान रूपी साबुन से साफ नहीं करते, तो हमारा दूषित मन और अधिक प्रदूषण फैलाता है। यदि कोई व्यक्ति क्रोधित और अशांत हो, तो उसकी यह अशांति केवल उसी तक सीमित नहीं रहती, वह उन लोगों पर भी प्रभाव डालती है, जो उस व्यक्ति के संपर्क में आते हैं। इस तरह नकारात्मक ऊर्जा की किरणें एकत्र होकर पूरे समाज में अशांति पैदा करती हैं। वर्तमान दौर में मानव मन की तरफ और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें आसपास के वातावरण के साथ सामंजस्य बैठाना सीखना होगा। मानसिक शांति और स्वच्छता के लिए ध्यान और योग जैसी क्रियाएं अपनाएं, इनसे आपको अपने भीतर सकारात्मक बदलाव महसूस हेगा।
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पानी जैसा हो मानव स्वभाव
हमारे विचारों और भावनाओं के बीच एक अजीब संबंध है। विचारों से भावनाएं उत्पन्न होती हैं और भावनाएं हमारे मन में विचार भी ला सकती हैं। कई बार हम असहाय महसूस करते हैं और हमें पता नहीं होता कि आगे क्या करें? जब हमारी ऊर्जा का स्तर उच्च होता है, तब हमारे जीवन में कोई समस्या नहीं होती। परेशानियां तभी आती हैं जब हमारी ऊर्जा का स्तर कम हो। जब कोई व्यक्ति स्वयं को भावनात्मक रूप से कमज़ोर महसूस करता है तो वह अपनी ऊर्जा बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत हो जाता है, लेकिन ऐसा करने से उसकी सारी दुखद भावनाएं और मज़बूत हो जाती हैं। जब आप उदास महसूस करें तो उदासी की भावना से भागने के बजाय पानी की तरह सहज हो जाएं, पानी का स्वभाव है विनम्रता। जब आप किसी ग्लास में जल डालते हैं, वह उसी का आकार ले लेता है। जल का अर्थ है वर्तमान क्षण की स्वीकृति, परंतु यह स्वीकृति भाग्यवाद के साथ नहीं, बल्कि गतिशीलता एवं पुन: उठने की तत्परता से जुड़ी है। समुद्र आखिर समुद्र बना कैसे? ...क्योंकि उसने सबसे निचली स्थिति को धारण किया। पहाड़ की चोटियों से सभी नदियां और नहरें नीचे समुद्र तक पहुंचती हैं। समुद्र भरा हुआ है। जो सबसे अधिक विनम्र है, वह सबसे महान है। जब आप उदास महसूस कर रहे हों तो उस स्थिति में विनम्र हो जाएं, इससे आप पृथ्वी के सबसे धनवान व्यक्ति हो जाएंगे। क्या आपने कभी अपनी उदासीन भावनाओं से प्रेम किया है? आप हमेशा उनसे लड़ते रहे हैं। आंखें बंद कर लें और उस उदासीनता में समा जाएं। दुखद भावनाएं आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएंगी। बादल चाहे जितने भी काले और घने क्यों न हों, वे सूर्य को छिपा नहीं सकते। इसलिए जब कभी दुखों के बादल हों, तो घबराएं नहीं। बस गहरे उतरते जाएं, देखें और आप पाएंगे कि अनेक संवेदनाएं उभर रही हैं। कुछ भय भी उभरेंगे। डर केवल शारीरिक स्तर की संवेदना है। उसे स्वीकार करें। यदि आप इन भावनाओं से लड़ेंगे, तो इन्हें अपने भीतर से निकालने में अधिक समय लगेगा। इसका केवल एक ही उपाय है, समर्पण। अगर आप अपनी उलझनों को संभाल नहीं सकते, तो उन्हें ईश्वर को समर्पित कर दें। अपने ज्ञान से ही हम परिस्थितियों को सकारात्मक या नकारात्मक बना सकते हैं।
