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गुस्से और जिद से नहीं, बच्चों में ऐसे डालें Sorry बोलने की आदत

पेरेंट्स के व्यवहार से बच्चों में बदले की भावना पनप सकती है, जिसे बचपन से ही रोकना जरूरी है। क्षमा करना और दूसरों के प्रति सहानुभूति सिखाना बच्चों के स्वस्थ भावनात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
By Sakhi Digital | Edited By Garima Garg
Updated:- 2026-07-31, 18:35 IST
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जब डेढ़-दो साल का नन्हा सा बच्चा लड़खड़ाते हुए चलना सीख रहा होता है और उसे मामूली सी भी चोट लगती है, तो पेरेंट्स उसे बहलाने के लिए उसके सामने ही जमीन या फर्नीचर को जोर से पीटना शुरू कर देते हैं। भले ही इस उम्र में वे बोलने में असमर्थ होते हैं, लेकिन बड़ों का ऐसा व्यवहार देखकर वे इतना जरूर समझ जाते हैं कि मुझे भी यही करना चाहिए। जिस किसी वस्तु या व्यक्ति से हमें तकलीफ पहुंचे, बदले में हमें भी उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए, जिससे उसे भी कष्ट हो।

अधिकतर पेरेंट्स को ऐसा लगता है कि यह रोते बच्चे को बहलाने का सबसे सरल तरीका है, लेकिन तीन साल की उम्र के बाद जब वह स्कूल या घर से बाहर खेलने के लिए पार्क में जाता है, तो वहां हमउम्र बच्चों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करता है दिक्कत तब होती है, जब दोस्तों के साथ बच्चे का व्यवहार उग्र हो जाए, वह नाराज होकर उनके साथ खेलना छोड़ दे या उनसे बातचीत बंद कर दे। ऐसी स्थिति में माता-पिता को सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि बच्चे के मन में बदले की भावना विकसित हो रही है, जिसे अभी से रोकना जरूरी है और कभी-कभी खुद को भी सॉरी बोलना जरूरी है। ये लेख क्लिनिकल एंड चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. गगनदीप कौर से बातचीत पर आधारित है। जानते हैं आगे...

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बदल डालें बदले की आदत

हाल ही में अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि जिस किसी वजह से व्यक्ति को तकलीफ होती है, उसे नष्ट करने की प्रवृत्ति उसमें जन्मजात रूप से पाई जाती है। फिर भी सही परवरिश के जरिए ऐसे व्यवहार को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन जब माता-पिता खुद बच्चे की ऐसी गलत आदतों को बढ़ावा देने लगते हैं, तो इससे उसमें क्रोध और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं का विकास तेजी से होने लगता है। जिन लोगों को बचपन में माफ करना और माफी मांगना नहीं सिखाया जाता, भविष्य में वे हमेशा तनावग्रस्त रहते हैं। 

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न करें बच्चों पर गुस्सा

किशोरावस्था में प्रवेश करते ही शरीर में आने वाले हॉर्मोन संबंधी बदलाव के कारण बच्चों में अक्सर मूड स्विंग की समस्या होती है। बेवजह गुस्सा आना, उदास होकर घर के किसी कोने में अकेले गुमसुम बैठना या छोटी-छोटी बातों पर रोना, जैसा अस्थिर व्यवहार पेरेंट्स को परेशान कर देता है। अगर घर में इसी आयु वर्ग के दो बच्चे हों और उनके बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस हो जाए, तो नाराजगी में कई बार वे एक-दूसरे से बातचीत बंद कर देते हैं।

बच्चों का मन कोमल होता है, जब भी वे ऐसा व्यवहार करें तो उसी वक्त डांटने के बजाय थोड़ी देर तक उन्हें अकेला छोड़ दें। जब उनका मन शांत हो जाए, तो उन्हें समझाएं कि दूसरों को माफ करने और अपनी गलती होने पर खुद सोरी बोलने से सारी मुश्किलें अपने आप आसान हो जाती हैं।

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खुद बनें रोल मॉडल

बच्चे बड़ों के हर व्यवहार को सही मानकर उसी का अनुसरण करते हैं। अगर किसी बात को लेकर माता-पिता के बीच अनबन हो जाती है और अपने अहम की वजह से वे कई दिनों तक बातचीत बंद कर देते हैं या एक-दूसरे को आसानी से माफ करने को तैयार नहीं होते, तो यह देखकर बच्चे के मन में भी यह बात गहराई से बैठ जाएगी कि दूसरे लोग हमेशा गलत होते हैं। अगर कभी हमारे साथ उनका कोई व्यवहार गलत होता है, तो उसे हमेशा याद रखते हुए उन्हें कभी माफ नहीं करना चाहिए।

अगर कोई बच्चा यह देखता है कि अपने भाई-बहनों या अन्य रिश्तेदारों के साथ उसके माता-पिता के संबंध अच्छे नहीं हैं, तो वह मन ही मन यह मान लेता है कि परिवार और समाज में कोई किसी का ख्याल नहीं रखता। इसलिए ऐसे बच्चे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं। खासतौर पर जिन परिवारों में एक ही संतान होती है, वहां अक्सर ऐसी समस्या होती है।

अगर आप अपने बच्चे को इससे बचाना चाहते हैं, तो उसे यह समझाएं कि कभी-कभी बड़ों के बीच भी झगड़ा होना स्वाभाविक है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हमेशा के लिए एक-दूसरे से नाराज हो जाएं। अगर कोई व्यक्ति हमें नापसंद हो, तब भी हमें उसे सहजता से स्वीकारना चाहिए।

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कुछ जरूरी बातें

  • परिवार का माहौल खुशनुमा रखें।
  • बच्चों को माफी मांगना सिखाएं।
  • उन्हें उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त करने से रोकें।
  • दूसरों के सामने बच्चों को न डांटें।
  • निसंकोच अपनी गलतियां स्वीकारें।

लेखक - विनीता

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