सावन का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। इस दौरान लोग सोमवार का उपवास करते हैं और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। भूख लगने पर व्रत में खाया जाने वाला आहार का सेवन करते हैं। इसमें कुट्टू के आटे की पूरियां, सिंघाड़े के पकौड़े और साबूदाने की खीर या खिचड़ी शामिल है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि व्रत के खाने में ये चीजें कहां से आईं और इनकी शुरुआत कैसे हुई? सावन में आने वाले लंबे उपवासों के दौरान शरीर को ऊर्जा और पोषण देने के लिए हमारे बुजुर्गों ने इन सात्विक चीजों को व्रत के आहार में शामिल किया था। नीचे लेख में जानें इन खास व्यंजनों का इतिहास।
व्रत में अनाज क्यों वर्जित हैं?
सनातन धर्म में व्रत और उपवास के दौरान गेहूं, चावल और दाल जैसे पारंपरिक अनाजों का सेवन वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों शरीर और मन को पवित्र रखने के लिए अन्न का त्याग किया जाता है। इसके बजाय केवल शुद्ध और सात्विक फलाहार खाने का नियम है, जो हमारे शरीर को भीतर से हल्का और शांत रखता है।
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कुट्टू और सिंघाड़े का इतिहास
कुट्टू और सिंघाड़ा कोई साधारण अनाज नहीं हैं बल्कि ये पौधों के बीज और फल हैं। व्रत के नियमों के तहत इन्हें फलाहार की श्रेणी में रखा गया है। भारत में इनकी शुरुआत सदियों पहले पारंपरिक अनाजों के विकल्प के रूप में हुई थी ताकि लोग बिना अन्न खाए भी आसानी से उपवास रख सकें और अपने व्रत के नियमों का पालन कर सकें।
साबूदाना क्या है और इसकी उत्पत्ति कहां से हुई?
साबूदाना टैपिओका यानी कसावा की जड़ से मिलने वाले स्टार्च से तैयार किया जाता है। जड़ों को पीसकर दूध निकाला जाता है, जिसे साफ करके छोटी-छोटी गोलियों का आकार दिया जाता है और फिर सुखाकर चमकाया जाता है। भारत में टैपिओका को सबसे पहले केरल में लोकप्रियता मिली थी।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब त्रावणकोर राज्य भयंकर अकाल की चपेट में था, तब राजा अयिल्यम थिरुनल राम वर्मा और उनके भाई विशाखम थिरुनल महाराजा ने इस स्टार्चयुक्त कंद को जनता के लिए वरदान माना। हालांकि, शुरुआत में लोग इसे खाने से डरते थे।
इस अनोखे खाद्य पदार्थ पर लोगों का भरोसा कायम करने के लिए महाराजा ने खुद इसे पकाकर खाने की पहल की थी। आज यही टैपिओका न सिर्फ केरल की पहचान है बल्कि साबूदाने का मुख्य स्रोत भी बन चुका है।
सेहत के लिए क्यों है फायदेमंद?
व्रत के दौरान उपवास रखने से पाचन तंत्र को आराम की जरूरत होती है। कुट्टू आटा, सिंघाड़ा और साबूदाना पचने में बहुत हल्के होते हैं और शरीर को तुरंत भरपूर ऊर्जा देते हैं। इनमें मौजूद पोषक तत्व व्रत के दौरान शरीर में कमजोरी या थकान महसूस नहीं होने देते, जिससे हम बिना किसी परेशानी के आसानी से पूरा दिन उपवास रख पाते हैं।
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अब आप समझ गई होंगी कि उपवास में कूट्टू, सिंघाड़ा और साबूदाना का सेवन क्यों किया जाता है? अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।
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