भारतीय खान-पान की दुनिया में कुलचा एक बेहद लोकप्रिय और स्वादिष्ट व्यंजन है, जिसे नान या पराठे की तरह बड़े चाव से खाया जाता है। मैदे से बनने वाली यह गोल और फूली हुई रोटी सिर्फ उत्तर भारत के ढाबे या रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं है बल्कि इसका इतिहास देश की राजनीति और शाही घरानों से जुड़ा हुआ है।

मुगलों के शाही रसोईघर से निकलकर दक्षिण भारत के निजामों के दरबार तक पहुंचने वाला कुलचा एक ऐसा व्यंजन है, जिसने इतिहास में अपनी एक खास जगह बनाई है। यह दुनिया की इकलौती ऐसी डिश है जिसे किसी शाही रियासत के राष्ट्रीय ध्वज पर प्रमुखता से स्थान मिला। नीचे लेख में जानें कुलचे का इतिहास।

मुगल दरबार से दक्कन से जुड़ा है कुलचा का इतिहास

कुलचे की कहानी अट्ठारहवीं शताब्दी के उस दौर से शुरू होती है जब मुगल साम्राज्य अपने पतन की ओर बढ़ रहा था। आसफ जाही वंश के संस्थापक मीर कमर-उद-दीन-खान आसफ जाह उस समय दिल्ली के मुगल दरबार में एक प्रतिष्ठित दरबारी हुआ करते थे।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद फैली राजनीतिक उथल-पुथल के बीच उन्होंने दक्षिण भारत यानी दक्कन के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। वे दिल्ली छोड़कर दक्कन के सूबेदार के रूप में गए और वहां एक स्वतंत्र राजवंश की नींव रखी, जिसे आगे चलकर हैदराबाद रियासत के नाम से जाना गया।

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सूफी संत का आशीर्वाद और कुलचे की भविष्यवाणी

दक्कन की इस ऐतिहासिक यात्रा पर निकलने से पहले मीर कमर-उद-दीन ने प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औरंगाबादी से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद लिया। संत ने उनका स्वागत बड़े ही अनूठे तरीके से किया। उन्होंने एक पीले कपड़े में लिपटे हुए ताजे और स्वादिष्ट कुलचे उनके सामने रखे।

कमर-उद-दीन उस समय इतने भूखे थे या कुलचे का स्वाद इतना शानदार था कि वे खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने एक या दो नहीं बल्कि पूरे सात कुलचे खा लिए।

उनकी इस भूख और सहज स्वभाव से प्रसन्न होकर संत ने भविष्यवाणी कर उन्होंने कहा कि चूंकि उन्होंने सात कुलचे खाए हैं, इसलिए उनके वंश के लोग सात पीढ़ियों तक दक्कन की इस उपजाऊ और विशाल भूमि पर राज करेंगे।

निजामों ने कुलचे को अपने शाही झंडे पर किया था अंकित

संत की यह बात सच साबित हुई और आसफ जाही वंश ने हैदराबाद पर ठीक सात पीढ़ियों तक शासन किया। इस राजवंश के अंतिम शासक नवाब मीर उस्मान अली खान थे, जिन्होंने 1948 में भारत संघ में विलय होने तक शासन संभाला। अपनी इस सफलता और संत के आशीर्वाद को हमेशा याद रखने के लिए निजामों ने कुलचे को अपने आधिकारिक शाही झंडे पर अंकित करवा लिया।

इस झंडे की पृष्ठभूमि का पीला रंग उस कपड़े की याद दिलाता था जिस पर संत ने कुलचे परोसे थे, और बीच में कुलचे की आकृति बनी होती थी। हालांकि, कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि वह चिन्ह कोई और प्रतीक या अर्धचंद्र हो सकता है, लेकिन लोक कथाओं में इसे कुलचा ही माना गया है।

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निष्कर्ष

आज भले ही राजशाही का दौर खत्म हो चुका है और रियासतें इतिहास के पन्नों में सिमट गई हैं, लेकिन कुलचे की यह शाही दास्तान आज भी लोगों को हैरान कर देती है। जब भी हम प्लेट में गर्म-गरम कुलचा परोसते हैं, तो हम अनजाने में ही उस भूली-बिसरी शाही दावत और सूफी संत की भविष्यवाणी के स्वाद को ताजा कर रहे होते हैं।

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