आज के समय में जब भी हम टॉय ट्रेन का नाम सुनते हैं तो आंखों के सामने पहाड़ों के शानदार नजारे और उसके बीच धीरे-धीरे चलती हुई छोटी ट्रेन का ही ख्याल आता है। पर क्या आप जानती हैं कि इसका इतिहास अंग्रेजों से जुड़ा है? उस जमाने में पहाड़ों पर जाना बहुत मुश्किल होता था। सिर्फ पैदल, घोड़े या पालकी का ही ऑप्शन था। ऐसे में पहाड़ों को काटकर रेल लाइन बनाना बहुत बड़ी बात थी।
इसी कोशिश में इस छोटी रेल लाइन का जन्म हुआ, जिसे आगे चलकर टॉय ट्रेन कहा गया। बताया जाता है कि भारत की पहली टॉय ट्रेन दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच चली थी, जो आज भी कायम है। आज हम आपको अपने इस लेख में इसकी कहानी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं-
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भारत में टॉय ट्रेन की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में ट्रेन की शुरुआत 1853 में हुई थी। इसके बाद देश के कोने-कोने को रेल नेटवर्क से जोड़ने का काम तेजी से शुरू हुआ, लेकिन सबसे बड़ी सिरदर्दी पहाड़ों को लेकर थी। पहाड़ी इलाकों में पटरियां बिछाना कोई बच्चों का खेल नहीं था। उस जमाने में पहाड़ों पर आने-जाने के लिए सिर्फ घोड़े, पालकी या पैदल चलने का ही ऑप्शन था। इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए ब्रिटिश इंजीनियर्स ने पहाड़ों को काटकर रेल लाइन निकालने का प्लान बनाया और बस यहीं से भारत में खूबसूरत टॉय ट्रेनों का दौर शुरू हुआ।
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पहाड़ों के बीच बनाई गई छोटी रेल लाइन
आपको बता दें कि जहां नॉर्मल रेल लाइन बनाना लगभग नामुमकिन था, वहां छोटी यानी नैरो गेज की पटरियां बिछाई गईं। ये ट्रेनें ढलानों पर आसानी से चढ़ सकें, इसके लिए रास्ते में जिग-जैग ट्रैक, लूप्स और ढेरों पहाड़ काटकर बनाई गई सुरंगें शामिल की गईं। इनकी स्पीड बहुत ही स्लो रखी गई और रास्ते में छोटे-छोटे स्टेशन बनाए गए, ताकि सफर सुरक्षित रहे। ऐसे में पहाड़ों के खूबसूरत नजारों के बीच जब ये ट्रेन चली तो लोगों को सहूलियत हुई। इस तरह भारत को अपनी पहली टॉय ट्रेन मिल गई जिसे हम दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (Darjeeling Himalayan Railway) के नाम से जानते हैं।
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4 जुलाई 1881 को पटरी पर उतरी थी पहली ट्रेन
बताया जाता है कि दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की शुरुआत 4 जुलाई 1881 को सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच हुई थी। यह पहाड़ों में बनी भारत की सबसे पहली रेल लाइनों में से एक है। इसके शुरू होने से पहाड़ों का मुश्किल सफर आसान हो गया था। जिस रास्ते पर जाने के लिए कभी लोगों को पैदल, घोड़े या पालकी का सहारा लेना पड़ता था, वहां लोग आराम से ट्रेन से जाने लगे। सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच चलने वाली यह ऐतिहासिक ट्रेन आज भी उतनी ही खास है।
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अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए बनाई थी यह ट्रेन
टॉय ट्रेन के इतिहास की बात करें तो यह भी काफी दिलचस्प है। इसे वहां के लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजों ने अपनी जरूरतों के लिए बनाया था। बताया जाता है कि मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से बचने के लिए अंग्रेज दार्जिलिंग जैसे हिल स्टेशनों पर भागते थे। इसके अलावा चीन से बिजनेस बंद होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने असम और दार्जिलिंग में बड़े पैमाने पर चाय के बागान लगाए। इन बागानों से चाय की सप्लाई और आने-जाने का रास्ता आसान बनाने के लिए पहाड़ों पर रेल लाइन बिछाई गई थी।
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नाम पड़ा 'टॉय ट्रेन', पर क्यों?
अब सवाल यह आता है कि इसे 'टॉय ट्रेन' क्यों कहा जाने लगा? दरअसल, आम ट्रेनों के मुकाबले इन ट्रेनों के डिब्बे, इंजन और पटरियां बहुत छोटी थीं। दिखने में यह बिल्कुल खिलौने जैसी लगती थी। इसी वजह से वहां के लोगों ने इसे मजाक-मजाक में टॉय ट्रेन कहना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यही नाम पॉपुलर हो गया और आज पूरी दुनिया में इन पहाड़ी ट्रेनों को टॉय ट्रेन के नाम से ही जाना जाता है।
न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक होता है रोमांचक सफर
दार्जिलिंग टॉय ट्रेन की राइड न्यू जलपाईगुड़ी से शुरू होती है, जो समुद्र तल से सिर्फ 100 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां से ट्रेन धीरे-धीरे पहाड़ों पर चढ़ना शुरू करती है और 2,200 मीटर की ऊंचाई पर बसे दार्जिलिंग तक जाती है। जैसे-जैसे ट्रेन सुकना स्टेशन पहुंचती है, नजारे खूबसूरत होते चले जाते हैं। इसके बाद घने जंगलों, ऊंचे पेड़ों और हसीन वादियों से होती हुई ट्रेन रंगटोंग पहुंचती है।
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