भारत अपनी समृद्ध संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और लजीज खान-पान के लिए दुनियाभर में एक अलग पहचान रखता है। यहां के हर राज्य और शहर का अपना एक अनूठा स्वाद और पारंपरिक भोजन है, जो सदियों से हमारी विरासत का हिस्सा रहा है। हालांकि, बदलते वक्त के साथ हमारे खान-पान में भी काफी बदलाव आया है। उत्तर प्रदेश की कई पारंपरिक डिशेज धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं।
आज के इस लेख में हम यूपी के एक ऐसे ही पारंपरिक व्यंजन के बारे में बात करने जा रहे हैं, जिसे कभी यहां बड़े चाव से खाया और बनाया जाता था। मगर आज यह लगभग गुम सा हो चुका है। नीचे जानें इस व्यंजन की खासियत और इसे बनाने के पारंपरिक तरीके के बारे में।
गूलर क्या है?
गूलर, अंजीर परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इसके पेड़ भारत के ग्रामीण इलाकों, जंगलों और नदियों के किनारे आसानी से देखने को मिलते हैं। गूलर के फल छोटे, गोल और हरे रंग के होते हैं, जो पकने पर लाल या हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं।
पारंपरिक संस्कृति में गूलर के फूलों को लेकर कई तरह की लोक-कथाएं प्रचलित थीं। लोग इसे 'लपूसन' या अनछुए फूलों की श्रेणी में रखते थे, क्योंकि इसके फूल फल के अंदर छिपे होते हैं, जिन्हें आसानी से देखा नहीं जा सकता।
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गूलर की सब्जी की पारंपरिक रेसिपी
यूपी के ग्रामीण इलाकों में गूलर की सब्जी को एक खास तरीके से पकाया जाता था। इसे बनाने से पहले गूलर को पानी में उबालकर उसका कड़वापन निकाला जाता था। इसके बाद प्याज, लहसुन, टमाटर और मसालों के साथ इसकी मसालेदार सूखी या तरी वाली सब्जी तैयार की जाती थी।
गूलर फल की खासियत
स्वाद के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पारंपरिक वैद्य और बुजुर्ग गूलर की सब्जी को स्वास्थ्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं मानते थे। इसके फलों का उपयोग केवल पारंपरिक सब्जियां बनाने के लिए ही नहीं बल्कि कई घरेलू नुस्खों और औषधियों में भी किया जाता है।
- पेट से जुड़ी समस्याएं, कब्ज, और पित्त संबंधी दोषों को दूर करने के लिए गूलर के सेवन को बहुत फायदेमंद माना गया है।
- शरीर में खून की कमी को दूर करने और कमर दर्द जैसी शारीरिक समस्याओं में इसकी सब्जी बेहद असरदार मानी जाती थी।
- इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिंस, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो मौसमी बीमारियों से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं।
इस पारंपरिक डिश के गायब होने के पीछे के कारण?
यूपी की मशहूर और पारंपरिक डिश गूलर की सब्जी के गायब होने के पीछे कई कारण है। नीचे प्वाइंट में जानें
- पेड़ों की कटाई के कारण अब गांवों और शहरों दोनों जगहों से गूलर के पेड़ तेजी से कम हो रहे हैं।
- गूलर को तोड़ने, धोने, उबालने और साफ करने में काफी मेहनत लगती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग इतना समय रसोई में देना पसंद नहीं करते।
- आलू, गोभी या भिंडी जैसी सब्जियां आसानी से बाजार में मिल जाती हैं। वहीं गूलर आसानी से बिकने के लिए उपलब्ध नहीं होता।
- आज के समय में बच्चे फास्ट फूड ज्यादा पसंद करते हैं। साथ ही बदलती पीढ़ी में बहुत सारी रेसिपी गायब होती गई। इस में से यह भी एक है।
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अगर आप खान-पान की खोई दुनिया को जानने में रुचि रखते हैं, तो गुमनाम जायका पढ़ सकते हैं। इस सीरीज के जरिए हम गुम हो रहे पारंपरिक व्यंजनों के बारे में बताते हैं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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