भारत को विभिन्नाताओं का देश कहा जाता है। यहां न केवल लोकगीत, रहन-सहन बल्कि पारंपरिक खान-पान की भी अपनी अलग कहानी है। हालांकि, वर्तमान में बहुत सारे पारंपरिक व्यंजन गायब से हो गए हैं। आज के इस लेख में हम आपको उत्तर प्रदेश की शान रसियाव के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कभी बड़े चाव से खाया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में अब केवल इनके कभी-कभार नाम ही सुनने को मिलते हैं। जानें गन्ने के रस से बनने वाली इस रेसिपी की खासियत?
रसियाव क्या है?
किसी भी व्यंजन का नाम जब हम सुनते हैं, तो पहले यह जानना चाहते हैं कि यह क्या है? अगर आपने बचपन में या फिर कभी आपने रसियाव का स्वाद चखा होगा, तो इसके बारे में आपको अच्छे से पता होगा। बता दें कि यह व्यंजन गन्ने के ताजे रस में नया चावल और सूखे मेवे मिलाकर धीमी आंच पर पकाई जाने वाली पारंपरिक खीर है। इस डिश को कुछ जगहों पर रसिया के नाम से जाना जाता है।
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रसियाव की खास बात
रसियाव गन्ने के ताजे रस और चावल से बनने वाली एक खास तरह की खीर है। इसे आमतौर पर सर्दियों के मौसम में या त्योहारों के दौरान बनाया जाता था। जब गन्ने की फसल कटती थी और नया गुड़ या ताजा रस बाजार में आता था, तब घर-घर में इसकी सौंधी महक फैल जाती थी। पारंपरिक तरीके से इसे मिट्टी के बर्तन में धीमी आंच पर पकाया जाता था, जिससे इसका स्वाद और भी ज्यादा बढ़ जाता था।
रसियाव कब बनाया जाता था?
रसियाव को मुख्य रूप से उत्तर भारत और बिहार जैसे क्षेत्रों में कुछ खास मौके पर देखने को मिल जाती है। हालांकि, धीरे-धीरे यह गायब सा हो जा रहा है। छठ पर्व खरना के मौके पर छठी माता को भोग लगाने के लिए बनाया जाता है।
रसियाव को क्यों भूलते जा रहे हैं लोग?
वक्त के साथ न केवल हमारी जीवनशैली बल्कि खानपान भी पूरी तरह बदल चुका है। आज हम मिनटों में बनने वाले खाने को बनाना ज्यादा पसंद करते हैं। अब ऐसे में पारंपरिक कब हमारी थाली से गुम हो चुके पता ही नहीं चला। नीचे जानें रसियाव के गायब होने के कारण।
- आज की पीढ़ी पारंपरिक मिठाइयों के मुकाबले चॉकलेट, केक और बाजार की पैकेटबंद चीजों को ज्यादा पसंद करती है।
- रसियाव को बनाने में अच्छे खासे समय और धैर्य की जरूरत होती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग इतना समय नहीं देना चाहते।
- अब शहरों में गन्ने का ताजा रस आसानी से नहीं मिलता और गुड़ से बने विकल्प भी लोग कम ही अपनाते हैं।
- शादी-ब्याह और त्योहारों पर गुलाब जामुन, रसगुल्ला और कस्टर्ड जैसी आधुनिक मिठाइयों ने इसकी जगह ले ली है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सुनने को मिलती है रसियाव की कहानी
गांवों के कुछ बुजुर्गों को रसियाव का पुराना स्वाद अच्छी तरह याद है। जब ठंड के दिनों में चूल्हे पर मिट्टी की हांडी में यह पकता था, तो पूरे मोहल्ले में इसकी महक बिखर जाती थी। इस व्यंजन के बारे में मुझे मेरी नानी से पता चला था।
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निष्कर्ष
जब कभी किसी ऐसे खाने के बारे में पता चलता है, जिसे हमने कभी खाया होता है, तो पुरानी यादें तुरंत सामने आ जाती हैं। इसी में से एक है रसियाव। अगर आपको इसके बारे में नहीं पता था, तो इस लेख को पढ़ने के बाद अपने घर के बड़े-बुजुर्ग से जरूर पूछना। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें व इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।
Image Credit- ai
