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कौन थीं भारत रत्न अरुणा आसफ अली? अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर चलाई मुहिम

अरुणा आसफ अली एक निडर स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1942 में मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया और भूमिगत रहकर संघर्ष जारी रखा।
Updated:- 2026-08-31, 12:18 IST
aruna asaf ali story

महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नायकों को तो हमेशा याद किया ही जाता है, लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसी साहसी महिलाएं भी थीं, जिन्होंने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर इतिहास रच दिया था। जी हां, उन्हीं वीरांगनाओं में से एक प्रमुख नाम है अरुणा आसफ अली। वह एक निडर स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ कुशल शिक्षिका, प्रखर राजनीतिक कार्यकर्ता और निर्भीक प्रकाशक भी थीं। हम आपको यह जानकारी दे रहे हैं क्योंकि हमने 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' नाम की एक सीरीज शुरू की है। इसी कड़ी में हम रोजाना ऐसी महिलाओं के बारे में बताएंगे। आज हम आपको अरुणा आसफ अली की स्टोरी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं-

अरुणा आसफ अली का शुरुआती जीवन और शिक्षा

अरुणा जी का जन्म 16 जुलाई 1909 को कालका (पंजाब, जो अब हरियाणा में है) में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम अरुणा गांगुली था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक रेस्टोरेंट के मालिक थे और मां अंबालिका देवी थीं।

  • प्रारंभिक शिक्षा और करियर: उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा लाहौर से पूरी की। स्नातक की पढ़ाई के बाद वह कलकत्ता के गोखले मेमोरियल स्कूल में शिक्षिका के रूप में सेवाएं देने लगीं।
  • शादी: इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आसफ अली से हुई। 1928 में दोनों ने शादी कर ली। धर्म अलग होने और उम्र में 20 साल से ज्यादा का अंतर होने के कारण उनके परिवार ने इस विवाह का कड़ा विरोध किया था, लेकिन अरुणा जी अपने फैसले पर अडिग रहीं।

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आजादी के आंदोलन में पदार्पण

शादी के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ीं और देश सेवा के रास्ते पर निकल पड़ीं। नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने पब्लिक जुलूसों में भाग लिया और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की।

  • जेल यात्रा और महिला कैदियों का प्रदर्शन: अंग्रेजों ने देशद्रोह के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जब सरकार अन्य महिला कैदियों को रिहा करने लगी, तो कैदियों ने अरुणा जी की रिहाई न होने तक जेल छोड़ने से मना कर दिया। जनआक्रोश को देखते हुए आखिरकार ब्रिटिश प्रशासन को उन्हें भी छोड़ना पड़ा।
  • तिहाड़ जेल में भूख हड़ताल: 1932 में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया। वहां राजनीतिक बंदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार के खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें अंबाला जेल में ट्रांसफर कर कारावास में रख दिया।

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1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और ऐतिहासिक झंडा फहराना

8 अगस्त 1942 को जब ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का प्रस्ताव पारित किया, तो अंग्रेजों ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

  • 9 अगस्त की ऐतिहासिक घटना: इस आंदोलन में अरुणा जी ने अभूतपूर्व साहस दिखाया। 9 अगस्त 1942 को बंबई के गवालिया टैंक मैदान में उन्होंने अंग्रेजों की बंदूकों की परवाह किए बिना तिरंगा फहराया।
  • भूमिगत होकर संघर्ष: इस घटना ने देश भर के युवाओं में क्रांति की नई लहर दौड़ा दी। इसके बाद अंग्रेज सरकार उन्हें पकड़ने के लिए पीछे पड़ गई, लेकिन वह चकमा देकर भूमिगत हो गईं।

भूमिगत नेटवर्क, इंकलाब पत्रिका और गांधी जी की सलाह

अंग्रेजी हुकूमत से छिपकर अरुणा आसफ अली ने वर्षों तक स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाली।

  • संपत्ति की जब्ती और इनाम: सरकार ने उनकी संपत्ति जब्त कर ली और उन्हें पकड़वाने पर 5,000 रुपये के इनाम की घोषणा कर दी।
  • 'इंकलाब' का संपादन: भूमिगत रहते हुए उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की महीने की पत्रिका 'इंकलाब' का संपादन और प्रकाशन किया।
  • आत्मसमर्पण से इनकार: महात्मा गांधी ने उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा की चिंता करते हुए पत्र लिखकर उन्हें आत्मसमर्पण करने और इनामी राशि गरीबों में बांटने की सलाह दी। हालांकि, अपने मजबूत इरादों के लिए जानी जाने वाली अरुणा जी ने बापू के पत्र को अपने पास सहेज कर तो रखा, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं किया। वह तभी बाहर आईं जब सरकार ने उन पर से इनाम वापस ले लिया।

सामाजिक सुधार और निर्भीक राजनीतिक विचार

आजादी के पहले और बाद में भी अरुणा आसफ अली हमेशा अपने साफ विचारों के लिए जानी गईं।

  • दलितों के अधिकार: वह समाज के वंचित वर्गों और दलितों के अधिकारों के लिए लगातार काम करती रहीं।
  • पर्यावरण और उद्योग: उनका मानना था कि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण (Uncontrolled Industrialization) से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।
  • महिलाओं के अधिकार: वह महिलाओं के सशक्तिकरण की समर्थक थीं, लेकिन उनका मानना था कि केवल आरक्षण देने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं ही महिलाओं को असल में मजबूत बनाएंगी।

पुरस्कार, सम्मान और अंतिम यात्रा

देश के लिए उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया। इससे अलग कुछ अन्य भी पुरुस्तार मिले-

  • 1965 में लेनिन शांति पुरस्कार
  • 1991 में अंतरराष्ट्रीय समझ के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार
  • 1992 में पद्म विभूषण

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1997 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न'

1998 में उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया गया। नई दिल्ली की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम 'अरुणा आसफ अली मार्ग' रखा गया।

जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली जैसे नेताओं को अकसर "गांधी जी की राजनीतिक संतान और कार्ल मार्क्स के आधुनिक शिष्य" के रूप में याद किया जाता है। 29 जुलाई 1996 को 87 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में इस महान वीरांगना ने अंतिम सांस ली।

निष्कर्ष

भारत की आजादी की कहानी केवल चंद बड़े नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अरुणा आसफ अली जैसी अनगिनत निडर महिलाओं का खून-पसीना भी शामिल है। अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर आंदोलन को दिशा देने वाली 'ग्रैंड ओल्ड लेडी' अरुणा आसफ अली का जीवन और उनका साहस आज भी देश के युवाओं और महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक विशाल स्रोत है।

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Images: feminisminindia, wikipedia, istampgallery

FAQ
क्या उन्होंने महात्मा गांधी की आत्मसमर्पण की सलाह मानी थी?
नहीं, उन्होंने गांधी जी के पत्र को सहेज कर रखा, लेकिन आंदोलन जारी रखने के लिए आत्मसमर्पण नहीं किया।
उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' कब मिला?
उन्हें 1997 में मरणोपरांत 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया।
भूमिगत रहने के दौरान उन्होंने किस पत्रिका का संपादन किया?
उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर 'इंकलाब' पत्रिका का संपादन किया।
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