Teachers' Day 2026: जब बेटियों का पढ़ना था मना, इन 4 महिलाओं ने बदली भारत की तस्वीर
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एक दौर था जब देश में लड़कियों का पढ़ना-लिखना सामाजिक नियमों के खिलाफ माना जाता था। रुढ़िवादी सोच और बंदिशों के बीच बेटियों को ज्ञान के अधिकार से दूर रखा जाता था, लेकिन कुछ निडर महिलाओं ने समाज के कड़े विरोध और अपमान की परवाह न करते हुए शिक्षा की मशाल जलाई। उनके इसी साहस और त्याग के कारण आज लाखों बेटियों का भविष्य उज्ज्वल हो सका है। इस शिक्षक दिवस 2026 के मौके पर जानते हैं, भारत की उन प्रेरणादायक महिलाओं के बारे में, जिन्होंने तमाम चुनौतियों को पार कर देश में महिला शिक्षा और सशक्तिकरण की नींव रखी। जानते हैं...
भारत में शिक्षा का अलख जगाने वाली प्रमुख महिलाएं
फेमस 4 महिलाओं के नाम, जन्म, प्रमुख पहचान और पद के बारे में टेबल के माध्यम से बताया गया है-
| नाम | जन्म | पहचान और पद | सबसे बड़ा योगदान |
| सावित्रीबाई फुले | 3 जनवरी 1831 (महाराष्ट्र) | प्रथम महिला शिक्षिका व समाज सुधारक | 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला |
| चंद्रप्रभा सैकियानी | 16 मार्च 1901 (असम) | स्वतंत्रता सेनानी व सामाजिक कार्यकर्ता | 13 वर्ष की आयु में बालिकाओं के लिए स्कूल बनाया |
| डॉ. असीमा चटर्जी | 23 सितंबर 1917 (बंगाल) | विख्यात वैज्ञानिक व प्रोफेसर | कैंसर रोधी औषधीय शोध और पद्म भूषण सम्मान |
| विमला कौल | साल 1937 में शिमला, हिमाचल प्रदेश दिल्ली | 'गुलदस्ता' संस्था की संस्थापिका | वंचित वर्ग के बच्चों को मुफ्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा |
1. चंद्रप्रभा सैकियानी: 13 साल की उम्र में स्कूल खोला
असम के कामरूप जिले के दोइसिंगारी गांव में 16 मार्च 1901 को जन्मी चंद्रप्रभा सैकियानी बचपन से ही बेहद मेधावी और साहसी थीं। उनके पिता रतिराम मजुमदार ने अपनी बेटी की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। चंद्रप्रभा ने न केवल खुद पढ़ाई की, बल्कि महज 13 साल की उम्र में अपने गांव की लड़कियों के लिए एक प्राथमिक विद्यालय खोलकर खुद शिक्षक की भूमिका निभाई।
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महिला अधिकार पर आवाज
उनकी इस लगन को देखकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने उन्हें नौगांव मिशन स्कूल की छात्रवृत्ति दिलाई, जहां उन्होंने छात्राओं के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई। चंद्रप्रभा ने असम में महिलाओं को जागरूक करने के साथ-साथ पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और आजीवन समाज सेवा से जुड़ी रहीं।
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2. डॉ. असीमा चटर्जी: विज्ञान और शोध के क्षेत्र में नाम रोशन करने वाली वैज्ञानिक
23 सितंबर 1917 को बंगाल के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी असीमा चटर्जी को उनके पिता डॉ. इंद्र नारायण मुखर्जी और माता कमला देवी ने हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से रसायन शास्त्र में स्नातक (ग्रेजुएशन) किया और राजाबाजार साइंस कॉलेज से कार्बनिक रसायन में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) और 1944 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे किसी भारतीय विश्वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट पाने वाली पहली महिला बनीं।
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कैंसर रोधी शोध किया
डॉ. असीमा चटर्जी ने प्राकृतिक औषधीय पौधों के रसायन पर गहरा शोध किया। उन्होंने पाया कि वेनेका अल्कोडिश के तत्व मानव शरीर की कोशिकाओं में कैंसर के फैलने की गति को काफी धीमा कर देते हैं। 1940 के दशक में लेडी ब्रेबॉर्न कॉलेज में केमिस्ट्री विभाग की अध्यक्ष रहीं असीमा चटर्जी इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन की पहली महिला जनरल प्रेसिडेंट बनीं। 1975 में पद्म भूषण से सम्मानित असीमा चटर्जी राज्यसभा सदस्य भी रहीं और सीएसआईआर द्वारा प्रकाशित सीरीज की संपादक रहीं।
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3. सावित्रीबाई फुले: देश की पहली महिला शिक्षिका का संघर्ष
महाराष्ट्र के नायगांव में 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारक और मराठी कवयित्री थीं। 18वीं-19वीं सदी में जब महिलाओं का स्कूल जाना वर्जित था, तब उन्होंने समाज के कड़े विरोध के बावजूद बेटियों को पढ़ाने का संकल्प लिया। जब वे पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर कीचड़, पत्थर और गोबर फेंकते थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने साथ एक एक्स्ट्रा साड़ी रखकर पढ़ाना जारी रखा।

क्रांतिकारी कदम और सामाजिक बदलाव
सावित्रीबाई ने अपने पति महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर साल 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में निचली जातियों की लड़कियों के लिए पहला स्कूल स्थापित किया। 1849 में उन्होंने वयस्कों के लिए भी रात में स्कूल शुरू किया। 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' के जरिए उन्होंने जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई। 1890 में पति के निधन के बाद उन्होंने स्वयं उनकी चिता को मुखाग्नि देकर रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ा और 10 मार्च 1897 को प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए खुद इस महामारी का शिकार हो गईं।
4. विमला कौल: झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों का भविष्य संवारने वाली मार्गदर्शक
दिल्ली में रहने वाली विमला कौल और उनके पति एच.एम. कौल ने वर्ष 1993 में 'गुलदस्ता' नाम से एक गैर-लाभकारी स्कूल की शुरुआत की। 81 वर्ष की उम्र में भी विमला कौल ने गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देने का कार्य जारी रखा।

रोजगार के अवसर निकाले
गुलदस्ता स्कूल में बच्चों को केवल गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, कंप्यूटर और पर्यावरण जैसे विषय ही नहीं पढ़ाए जाते, बल्कि योग और नृत्य जैसी गतिविधियों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। विमला कौल के इस प्रयास से उन इलाकों की लड़कियों ने स्कूल जाना शुरू किया, जहां शिक्षा का नामोनिशान नहीं था। उनके पढ़ाए कई छात्र आज अच्छी नौकरियों में कार्यरत हैं।
निष्कर्ष
सावित्रीबाई फुले का त्याग, चंद्रप्रभा सैकियानी का साहस, डॉ. असीमा चटर्जी की वैज्ञानिक प्रतिभा और विमला कौल का निस्वार्थ समर्पण भारत में महिला सशक्तिकरण की एक अमर कहानी बयान करता है।
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- भारत की पहली महिला शिक्षिका कौन थीं?
- सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, जिन्होंने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था।
- डॉ. असीमा चटर्जी का मुख्य योगदान क्या रहा है?
- वे विज्ञान में डॉक्टरेट पाने वाली पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने कैंसर रोधी औषधीय पौधों पर शोध किया।
- सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक कुरीतियों का सामना कैसे किया?
- लोगों के पथराव और गोबर फेंकने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखा।
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