भरी रोड पर कर दिया एक्स गर्लफ्रेंड का कत्ल, आखिर महिलाओं की ना क्यों बर्दाश्त नहीं होती है?

मुंबई की घटना है जहां भरी रोड पर एक सिरफिरे आशिक ने अपनी एक्स गर्लफ्रेंड की जान ले ली। ऐसा ही हाल दिल्ली में भी हुआ था। पर ऐसा होता क्यों है? 
Updated:- 2024-06-20, 13:59 IST
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मुंबई के वसई इलाके के पास सुबह 8.30 बजे एक कत्ल होता है। यह सड़क लोगों से भरी हुई है और इसी बीच एक सिरफिरा आशिक अपनी एक्स गर्लफ्रेंड को पाने (गाड़ियों की मरम्मत के लिए यूज होने वाला टूल) से मारता है। लड़की सड़क पर गिर जाती है और अपने हाथों से खुद को बचाने की कोशिश करती है। आस-पास के लोग यह नजारा देख रहे हैं और साइड से चलकर जा रहे हैं। उस लड़की को बचाने के लिए एक व्यक्ति सामने आता है, लेकिन फिर डरकर वह भी पीछे हो जाता है। बाकी किसी को फर्क नहीं पड़ता कि सड़क पर किसी इंसान की जान जा रही है। 

लड़की के सिर पर 18 बार वार किया जाता है और वह लहूलुहान होकर सड़क पर ही दम तोड़ देती है। आस-पास वाले लोग वीडियो बनाते हैं और लड़की के निर्जीव शरीर की फोटो खींचते हैं। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो जाता है। 

यह पहली घटना नहीं है जहां हमें समाज का ऐसा घिनौना चेहरा देखने को मिला है। दिल्ली की साक्षी का भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ था। उसे भी ऐसी गली के अंदर मारा गया था जिसमें आस-पास लोग देख रहे थे। 

rejection and people issues

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ऐसी घटनाएं अपने साथ दो सवाल छोड़ जाती हैं, पहला यह कि क्या लोग ऐसी स्थिति में बीच-बचाव करके लड़की को बचा नहीं सकते? और दूसरा यह कि सिरफिरे आशिक जो एक बार तो लड़की के लिए जीने मरने की कसमें खाते हैं वह ऐसा कैसे कर जाते हैं?

इन दोनों चीजों को समझने के लिए हमने फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट की सीनियर चाइल्ड और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और हैप्पीनेस स्टूडियो की फाउंडर डॉक्टर भावना बर्मी से बात की। डॉक्टर भावना के मुताबिक, इसे कहीं ना कहीं मनोविज्ञान से जोड़कर देखा जा सकता है।  

आखिर क्यों लोगों से बर्दाश्त नहीं होता रिजेक्शन?  

डॉक्टर भावना का कहना है कि रिजेक्शन लोगों के लिए एक्सेप्ट करना मुश्किल होता है। चाहे वो लड़के हों या लड़कियां, प्यार में रिजेक्शन सेल्फ रिस्पेक्ट से जोड़कर देखा जाता है। इसके पीछे कई साइकोलॉजिकल और सोशल फैक्टर्स होते हैं जैसे- 

इमोशनल जुड़ाव 

मान लीजिए कोई रिलेशनशिप में बहुत गहरा जुड़ाव महसूस कर रहा है। उसका दिल टूटा है और रिजेक्शन मिला है। इस दर्द को हैंडल करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि वह व्यक्ति इमोशनली ड्रेन्ड फील कर रहा है। रिजेक्शन मिलना बहुत दुखद होता है।  

rejection and emotional factors

ईगो और सेल्फ रिस्पेक्ट पर खतरा 

रिलेशनशिप को लेकर कई लोग इतने सीरियस इसलिए हो जाते हैं क्योंकि वह इसे अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट से जोड़कर देखने लगते हैं। जब उन्हें रिजेक्शन मिलता है, तब उनका ईगो हर्ट होता है और उन्हें लगता है कि उनकी वैल्यू कम हो गई है।  

rejection and violent partner

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कल्चरल फैक्टर 

यह बहुत बड़ा फैक्टर है किसी गंभीर कदम को उठाने के पीछे। हमारी सोसाइटी में कई बार रिजेक्शन को एक्सेप्ट करना वीकनेस माना जाता है। इस वजह से लोग अपने आप को और दूसरों को प्रूव करने की कोशिश करते हैं कि वो वीक नहीं हैं। कई बार दोस्त और रिश्तेदार भी हंसी-मजाक करते हैं जिसके कारण लोग और भी ज्यादा परेशान होने लगते हैं।  

इमोशनल समस्याएं 

हर कोई अपने इमोशन्स को आसानी से मैनेज नहीं कर पाते हैं। कुछ लोग इमोशनल रेगुलेशन में प्रॉब्लम भी फेस करते हैं। इसी वजह से उन्हें इम्पल्सिव और एक्स्ट्रीम एक्शन लेने से कोई रोक नहीं पाता। जब हमारे इमोशन्स हम पर भारी पड़ जाते हैं, तब हमारा खुद पर से कंट्रोल ही चला जाता है। 

ऐसे ही गर्लफ्रेंड और ब्वॉफ्रेंड के मामलों में रिजेक्शन कई बार टॉलरेट ही नहीं हो पाता है। इसी के कारण, ऐसी एक्स्ट्रीम घटनाएं होती हैं।  

आखिर क्यों राह चलते लोग अनदेखा कर देते हैं ऐसी घटनाएं 

यहां दूसरे की रक्षा से ज्यादा खुद की रक्षा की बात होती है। लोग समझने की कोशिश नहीं करते कि अगर वह साथ मिलकर रोकेंगे, तो किसी की जान बच सकती है। हर व्यक्ति किसी और के पचड़े में क्यों पड़ें जैसी मानसिकता लेकर चलता है। हमलावर के पास अगर हथियार है, तो लोग उसके आस-पास जाने से डरते हैं। यहां डर हमलावर के चक्कर में पुलिस और कोर्ट-कचहरी से भी होता है।  

यहां ह्यूमन नेचर और स्वार्थ सामने आता है।  

ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि हम किसी भी जगह पर सुरक्षित नहीं हैं। हम रोजाना होने वाली घटनाओं को लेकर अब संवेदनशील नहीं रह गए हैं। देश में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ कोई ना कोई घटना होती ही रहती है। ऐसे में किसी एक को गुनहगार नहीं माना जा सकता। एक व्यक्ति बीच सड़क पर किसी लड़की की हत्या कर देता है और लोग देखते रह जाते हैं। मदद के लिए कोई आगे नहीं आता और खुद मुंह छुपाकर बचते फिरते हैं।  

बतौर समाज हम फेल हो रहे हैं अपने आस-पास की जगहों को सुरक्षित बनाने में। हमारा देश संस्कृति और सत्ता पर गर्व करता है, लेकिन इस तरह के अपराधों को नजरअंदाज कर देता है। क्या यही भविष्य चाहिए हमें? 

 

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