हर पूजा में जलाया जाता है दीपक, क्या आप जानते हैं इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

पूजा-पाठ की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु माना जाने वाले दीपक का इतिहास काफी दिलचस्प है और प्राचीन काल से ही इसका महत्व दिखाई देता है। आइए आपको बताते हैं कैसे इसकी शुरुआत हुई और वैदिक काल से कैसे इसका संबंध है।
Updated:- 2026-06-11, 17:00 IST
image

हमारी संस्कृति में किसी भी पूजा-पाठ में दीपक जलने की परंपरा है और ऐसा माना जाता है कि दीये से ही संसार का तमस दूर होता है। जब भी बात रोशनी की आती है तो सबसे पहले दीपक का ख्याल ही आता है। यही नहीं किसी भी पूजा को शुरू करना या फिर काम की शुरुआत से पहले दिया जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। वहीं मन में एक ख्याल यह भी आता है कि आखिर पहली बार दीपक किसने और कब जलाया होगा? आखिर कैसे यह हमारी संस्कृति का एक अहम् हिस्सा बना गया? आखिर क्यों इसका इस्तेमाल पूजा से लेकर अन्य कई स्थानों पर किया जाने लगा? ऐसे न जाने कितने सवाल हमारे में में आते हैं और उनका उत्तर जान पाना भी मुश्किल होता है। आइए आपको बताते हैं ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब।

क्या है दीया जलाने की परंपरा का इतिहास?

दीया जलाने के इतिहास को भारतीय सभ्यता के शुरुआती दौर, यानी वैदिक काल से जोड़ा जाता है। वेदों के अनुसार अग्नि को एक पवित्र तत्व माना जाता है और मनुष्य के साथ देवताओं के बीच संदेशवाहक के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है। वहीं अगर हम इतिहास के पन्नों को खंगालते हैं तो दीये को भारतीय उपमहाद्वीप से आया हुआ माना जाता है। इससे जुड़े कुछ पुरातत्व संबंधी शुरुआती सबूत भी मिलते हैं जो बताते हैं कि इनका इस्तेमाल सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान, लगभग 2,600 ईसा पूर्व में किया गया था।

deeya lit history

वैदिक काल के अनुसार दीपक की शुरुआत

वहीं वैदिक काल में ऐसा माना जाता है कि दीया जलाने की शुरुआत 'यज्ञ' जैसे पवित्र अग्नि अनुष्ठानों से प्रेरित थी, जहां ईश्वरीय प्रार्थना करने और दैवीय शक्तियों से संवाद करने के लिए अग्नि को एक माध्यम के रूप में माना गया और दीपक का स्वरुप दिया गया। जैसे-जैसे मानव सभ्यता आगे बढ़ी और नियंत्रित आग का इस्तेमाल आम हुआ और मिट्टी के छोटे दीपक बनने लगे। शुरुआती समय में दीये की बनावट साधारण होती थी और इनमें पर घी या तेल भरा जाता था और इनका इस्तेमाल रोशनी करने के साथ आध्यात्मिक अनुष्ठानों, दोनों के लिए किया जाता था। वहीं समय के साथ दीपक पूजा की सामग्री के रूप में काम आने लगा।

यह भी पढ़ें- दीपक की लौ को फूंक मारकर क्यों नहीं बुझाना चाहिए? जानें क्या कहता है शास्त्र

siginifiacne of deeya

हिंदू धार्मिक परंपराओं में दीपक का महत्व

हिंदू धर्म के अनुसार दीपक या दिया न सिर्फ रोशनी का एक जरिया है बल्कि यह आंतरिक ज्ञान का प्रतीक भी है। इसे अंधेरे में रोशनी और अज्ञानता पर ज्ञान की जीत का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान दीया जलाने से सकारात्मक ऊर्जा आती है और आस-पास की नकारात्मकता दूर होती है। यही नहीं दीये की लौ के माध्यम से भक्तों का संदेश सीधे ईश्वर तक पहुंचता है। आम तौर पर दिया तीन चीजों से मिलकर बनता है जिसमें बाती, तेल या घी और अग्नि मुख्य तत्व हैं। जब दीया जलाया जाता है, तो यह इंसानी स्वभाव के दिव्य चेतना में बदलने का संकेत देता है।

यह भी पढ़ें- Home Decor Idea: खाली कुल्फी मटकों से बनाएं 'फ्लोटिंग दीया', अपने घर को दें डिफ्रेंट लुक

दीयों को लेकर कई पौराणिक कथाएं

भारतीय पुराण में रोशनी और दीपक के महत्व को बताने वाली कई कथाएं प्रचलित हैं। यही कथाएं पूजा और शुभ काम में दीपक का महत्व बताती हैं। एक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब भगवान राम 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तो लोगों ने उनके स्वागत में हजारों दीये जलाए। उस समय से जीत और खुशी का प्रतीक दीपक महत्वपूर्ण माना जाने लगा।

वास्तव में किसी भी चीज के इतिहास की तरह दीयों की कहानी भी अलग है और हिंदू धर्म में इसका महत्व भी बहुत ज्यादा होता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Images: Magnifik.com

Disclaimer

हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।