दुर्गा पूजा में ढाक की आवाज क्यों है इतनी खास? जानें इस परंपरा की कहानी

कोलकाता में दुर्गा पूजा का काफी महत्व है। वहां रहने वाले किसी भी बंगाली से अगर आप पूछेंगी कि दुर्गा पूजा आने का पहला संकेत क्या है? तो आपको एक नहीं बहुत से जवाब मिलेंगे। कोई सुबह की ठंडी हवा में महकते शिउली फूल की खुशबू को याद करेगा, तो किसी को गली के नुक्कड़ पर बांस के डंडों का ढेर दिखेगा। साथ ही सजी हुई मार्केट भी दुर्गा पूजा की एक बड़ी पहचान है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये सभी सुंदर नजारे एक चीज के बिना अधूरे हैं और वह है ढाक की आवाज।
यह सिर्फ एक आवाज नहीं है, यह एक इमोशन है। जब पहली बार ढाक की आवाज आपके कानों में पड़ती है, तो एक अलग ही सुकून मिलता है और पता चल जाता है कि दुर्गा मां आ गई हैं। इस आवाज को सुन ऐसा लगता है मानों ढोल हाथों से नहीं बल्कि दिल से बजाया जा रहा हो।
ढाक की परंपरा और कारण
दुर्गा पूजा में आखिर क्यों बजाई जाती है ढाक। इसका क्या कारण और यह कितनी साल पूरानी परंपरा है। आइए जानते हैं इसकी कहानी।
1- महालया से ही मिलता है मां के आगमन का संकेत
ढाक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसका बजना मां के आने का संकेत होता है। महालया के दिन से ही जब ढाक की आवाज सुनाई देती है, तो हर बंगाली एक ही बात सोचता है कि मां आ गई हैं। यह सिर्फ एक लकड़ी से बना ढोल नहीं होता है, बल्कि भक्ति और आस्था का प्रतिक माना जाता है।
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2- धुनुची नाच में भर देता है दोगुना जोश
धुनुची नाच के बारे में भी हर किसी ने सुना होता है। यह बंगाल में काफी फेमस है और अपने आप में एक अलग ही मजा देता है। जब लोग अपने हाथों में धुनुची लेकर नाचते हैं, तो एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। ढाक की थाप पर थिरकते कदम और धुएं से भरा पंडाल पूरे माहौल को ऊर्जा और भक्ति से भर देता हैं।
3- ढाक की गूंज से मिलता है मानसिक सुकून
ढाक की गूंज का असर सिर्फ कानों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। जब ढाक एक ही धुन में बजती है, तो उसे सुनने वाले सभी लोगों के दिलों की धड़कनें भी एक ही सुर में बंध जाती हैं। इससे लोगों के बीच आपसी भाईचारा बनता है।
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4- 3000 साल पुरानी परंपरा
ढाक बजाने की परंपरा लगभग 3,000 साल पुरानी मानी जाती है। यह सिर्फ एक संगीत नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति की पहचान है। सफेद धोती-कुर्ता जैसी पारंपरिक पोशाक पहन जब 'ढाकी' समूह में एक साथ ताल से ताल मिलाकर ढाक बजाते हैं, तो वह नजारा और संगीत हर बंगाली के लिए गर्व का क्षण होता है।
इसलिए कहा जाता है कि शिउली के फूल, पंडालों की तैयारी और बाजारों की भीड़ के साथ-साथ अगर किसी चीज के बिना दुर्गा पूजा अधूरी है, तो वह है ढाक की थाप।
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- दुर्गा पूजा में ढाक का इतना महत्व क्यों है?
- दुर्गा पूजा में ढाक सिर्फ संगीत के लिए नहीं बजाया जाता, इसे मां दुर्गा के स्वागत और भक्ति के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।
- क्या ढाक बजाने की परंपरा सिर्फ पश्चिम बंगाल तक ही सीमित है?
- इसकी जड़ें बंगाल में सबसे गहरी हैं, लेकिन आज दुर्गा पूजा जहां भी मनाई जाती है, चाहे दिल्ली, मुंबई या विदेश में, वहां पंडालों में ढाक और ढाकी को जरूर बुलाया जाता है।
- ढाक और सामान्य ढोल में क्या अंतर होता है?
- ढाक आकार में सामान्य ढोल से काफी बड़ा होता है और इसे कंधे पर लटका कर दो पतली छड़ियों से बजाया जाता है।
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