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कौन थीं डॉ. जानकी अम्माल? जिन्होंने देश के गन्ने को बनाया मीठा और 'साइलेंट वैली' को दिया नया जीवन

डॉ. जानकी अम्माल, भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक थीं, जिन्होंने गन्ने की संकर किस्मों की खोज में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 'साइलेंट वैली' को बचाने में भी अहम भूमिका निभाई।
Updated:- 2026-08-14, 18:50 IST
janaki ammal

ब्रिटेन के सरे शहर में जब गुलाबी फूल खिलते हैं तो उनकी खुशबू अपनी ओर खींच लेती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन खूबसूरत फूलों के तार भारत से जुड़े हैं। इन्हें 19वीं सदी में केरल में जन्मी भारत की महान वनस्पति वैज्ञानिक ई.के. जानकी अम्माल ने रोपा था। लगभग छह दशकों के अपने करियर में जानकी जी ने पौधों की कई प्रजातियों का गहरा अध्ययन किया। वे सिर्फ एक साइटोजेनेटिक्स वैज्ञानिक नहीं थीं, बल्कि एक शोधकर्ता और प्रकृति प्रेमी भी थीं। उस दौर में वे पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने 1930 के दशक में ही जैव विविधता पर बात करना शुरू कर दिया था। जानते हैं इनके बारे में...

1. शुरुआती जीवन और संघर्षों को मात देकर शिक्षा

जानकी जी का जन्म 1897 में केरल के थलास्सेरी में हुआ था। उनके पिता मद्रास प्रेसीडेंसी में सब-जज थे, जिससे उनका बचपन साधन संपन्न माहौल में बीता। वे सामाजिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले थिय्या समुदाय से आती थीं। समाज में जातिगत भेदभाव मौजूद था, लेकिन जानकी जी ने कभी इन बाधाओं को अपने रास्ते में नहीं आने दिया। अगर कोई उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करता, तो वे उसे नजरअंदाज कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाती थीं। उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी शिक्षा और शोध पर केंद्रित रहता था।

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2. उच्च शिक्षा और गन्ने की संकर किस्म का विकास

मद्रास से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें अमेरिका की प्रसिद्ध मिशिगन यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप मिली। इसके बाद साल 1932 में वे बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) में डॉक्टरेट (PhD) की डिग्री पाने वाली भारत की पहली महिला बनीं।

भारत वापस आकर उन्होंने कोयंबटूर के गन्ना प्रजनन केंद्र में काम करना शुरू किया। यहां उन्होंने गन्ने की एक ऐसी नई और बेहतर किस्म तैयार की, जो भारत के मौसम के हिसाब से ज्यादा उपज दे सकती थी। इतना ही नहीं, उन्होंने गन्ने और मक्के को मिलाकर (क्रॉस-ब्रीडिंग कराकर) एक सफल प्रयोग भी किया, जिससे गन्ने के बनने और बढ़ने की प्रक्रिया को समझना आसान हो गया। हालांकि, उस समय उनके इस ऐतिहासिक और शानदार काम का पूरा श्रेय उन्हें नहीं दिया गया।

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3. द्वितीय विश्व युद्ध के बीच ब्रिटेन में ऐतिहासिक शोध

1940 में वे शोध जारी रखने के लिए लंदन चली गईं। यह द्वितीय विश्व युद्ध का दौर था और ब्रिटेन में भोजन की भारी कमी थी। चारों तरफ बमबारी हो रही थी, लेकिन जानकी जी का हौसला नहीं डगमगाया। वे धमाकों के दौरान मेज के नीचे छिप जातीं और माहौल शांत होते ही फिर से अपने काम में जुट जातीं। 1945 में वे रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी गार्डेन में वैज्ञानिक बनने वाली पहली महिला बनीं। उनके कठोर परिश्रम और वैज्ञानिक सोच ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

4. स्वदेश वापसी, पर्यावरण संरक्षण और सर्वोच्च सम्मान

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के न्योते पर 1951 में जानकी जी भारत वापस आ गईं और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (BSI) को नए सिरे से संभालने के काम में लग गईं। हालांकि, उस समय की पुरुषप्रधान सोच की वजह से उनके साथ काम करने वाले लोगों ने एक महिला को अपना लीडर (अधिकारी) मानने से झिझक दिखाई। इस बात से उन्हें बहुत दुख पहुँचा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान देश भर में घूम-घूमकर पौधों की नई-नई किस्मों की तलाश करने पर लगा दिया। इससे पहले, साल 1948 में वे नेपाल में पौधे ढूँढने वाले एक खास अभियान की अगुआई करने वाली पहली महिला भी बनी थीं।

साइलेंट वैली को हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से बचाया

साइलेंट वैली को हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से बचाने और उसके वजूद को बनाए रखने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बता दें कि वैली को बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अभियान चलाया था। उन्होंने अपनी उम्र और स्वास्थ्य की परवाह किए बिना वहां के पौधों और पेड़ों का क्रोमोसोम सर्वेक्षण किया, जिससे इस दुर्लभ वर्षावन की जैव विविधता (Rainforest Biodiversity) का महत्व सामने आया और परियोजना रद्द कर इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।

80 वर्ष की आयु में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। 1984 में उनका निधन हो गया। भले ही अपने जीते जी उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसकी वे हकदार थीं, लेकिन उनका काम आज भी जीवंत है। उनका जीवन ईमानदारी, समर्पण और वैज्ञानिक सोच का एक ऐसा मिसाल है जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

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