इलाहाबाद के इस गांव में जन्म लेते हैं जुड़वा बच्चे, यहां जानें ट्विन विलेज की कहानी

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद क्षेत्र के पास स्थित मोहम्मदपुर कौशाम्बी जिसे अक्सर 'उमरी' भी कहा जाता है। गांव देश-दुनिया में अपने एक अनोखे रहस्य के लिए जाना जाता है। नौ सौ से भी कम आबादी वाले इस छोटे से गांव को दुनिया की जुड़वां राजधानी कहा जाता है। यहां की कुल छह सौ की आबादी में लगभग 33 जोड़ियां सिर्फ जुड़वां बच्चों की हैं। विभाजन और स्वतंत्रता के ठीक बाद यानी 1947 के आसपास यहां पहली बार जुड़वां बच्चियों का जन्म हुआ था। इस छोटे से गांव में हर पांचवां घर ऐसा है जहां जुड़वां बच्चे मौजूद हैं। एक परिवार में तो माता-पिता को छोड़कर बाकी सभी सदस्य जुड़वां ही हैं।
क्या है इस के पीछे का कारण?
जुड़वां बच्चों के जन्म को लेकर अलग-अलग तरह के तर्क दिए जाते हैं। गांव के स्थानीय लोगों का मानना है कि यह भगवान का आशीर्वाद है या फिर वहां की मिट्टी और पानी का कोई खास असर है। देश और विदेश के कई वैज्ञानिकों ने यहां के लोगों के डीएनए पर शोध किया है, लेकिन वे आज भी पूरी तरह से उलझन में हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों और लगातार आपसी शादियों की वजह से हो सकता है। यह चमत्कार किसी एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं है बल्कि यह सभी उम्र और समुदायों में देखा जाता है।
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दो एक जैसे बच्चे होने पर होती है परेशानी
इतनी बड़ी संख्या में एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चों का होना गांव में रोजमर्रा के कई मजेदार और भ्रमित करने वाले किस्से पैदा करता है। कभी एक ही बच्चे को गलती से दो बार खाना खिला दिया जाता है, तो कभी एक की गलती पर दूसरे को सजा मिल जाती है।

मगर इस खूबी के साथ गंभीर आर्थिक और सामाजिक समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं। गांव के अधिकांश लोग गरीब और भूमिहीन किसान हैं। सरकारी मदद और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी के कारण यहां नवजात शिशुओं की मृत्यु दर अधिक है। पर्यटकों के आने के बावजूद गांव की बुनियादी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है, जिससे स्थानीय लोग रोजमर्रा की जिंदगी में काफी संघर्ष करते हैं।
जानवरों और पक्षियों में भी दिखता है यही अनोखा असर
इस गांव की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह अजीब घटना केवल इंसानों तक ही सीमित नहीं है। गांव के पशु-पक्षियों में भी यही प्रकृति देखने को मिलती है। यहां मुर्गियों द्वारा दिए जाने वाले अंडों में अक्सर दो जर्दी निकलना आम बात है। इसके अलावा, गाय और भैंस जैसी मवेशी भी लगातार जुड़वां बछड़ों को जन्म देती हैं।
कोडिन्ही गांव से होती है इसकी तुलना
मोहम्मदपुर कौशाम्बी की तुलना अक्सर केरल के प्रसिद्ध कोडिन्ही गांव से की जाती है। जहां कोडिन्ही के लोग गल्फ देशों से आने वाले पैसों की वजह से आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं।

वहीं उमरी (मोहम्मदपुर कौशाम्बी) के लोग आज भी गरीबी से जूझ रहे हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि कोडिन्ही में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और जुड़वां बच्चों का एक आधिकारिक संघ है, जबकि मोहम्मदपुर कौशाम्बी आज भी इन सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
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निष्कर्ष
मोहम्मदपुर कौशाम्बी का यह हिस्सा पूरे जिला में मशहूर है। यहां के इस रहस्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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- इलाहाबाद के इस प्रसिद्ध जुड़वां गांव का असली नाम क्या है?
- इलाहाबाद के इस गांव का असली नाम मोहम्मदपुर कौशाम्बी (जिसे उमरी भी कहा जाता है) है।
- इलाहाबाद के मोहम्मदपुर कौशाम्बी गांव में सबसे पहले जुड़वां बच्चे कब पैदा हुए थे?
- यहां सबसे पहले जुड़वां बच्चों का जन्म साल 1947 में देश की स्वतंत्रता और विभाजन के तुरंत बाद हुआ था।
- प्रयागराज रेलवे स्टेशन से मोहम्मदपुर कौशाम्बी गांव कितनी दूर है?
- प्रयागराज रेलवे स्टेशन से मोहम्मदपुर कौशाम्बी गांव से 40-50 किलोमीटर दूर है।
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