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फोन थमाकर पीछा छुड़ाना पड़ सकता है महंगा, डिजिटल युग में बैड पेरेंटिंग के ये 3 बड़े खतरे जान लें

क्या आप भी अपने बच्चों के हाथों में फोन दे देती हैं और अपने काम में लग जाती हैं? अगर हां, तो यह आदत आपके बच्चे को खतरे की तरफ लेकर जा सकती हैं। जानते हैं इनके बारे में...
Updated:- 2026-01-23, 15:11 IST
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आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में स्मार्टफोन एक डिजिटल बेबीसीटर बन गया है। ऐसे में माता-पिता बच्चों के हाथ में कभी भी फोन थमा देते हैं। खासतौर पर तब जब बच्चा रोता है शैतानी करता है तो माता-पिता से अपना काम शांति से करने के लिए उसके हाथों में फोन चला कर देते हैं। पहली नजर में यह एक आसान समाधान लगता है, लेकिन ये बैड पेरेंटिंग की श्रेणी में आता है और बच्चे के भविष्य के लिए बेहद ही खतरनाक साबित हो सकता है। डिजिटल युग में फोन के जरिए पीछा छुड़ाने की यह आदत आपके बच्चे को तीन बड़े खतरों की तरफ ले जा सकती है। ऐसे इनके बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि फोन के जरिए बच्चों से पीछा छुड़ाने की आदत कैसे खतरनाक साबित हो सकती है। इसके लिए हमने कोच और हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की। पढ़ते हैं आगे...

बच्चों के हाथों में क्यों फोन न दें?

बच्चे का शुरुआती सफर बेहद कोमल होता है। ऐसे में माता-पिता का स्पर्श, इंसानी बातचीत, शारीरिक गतिविधियां आदि विकसित होते हैं। जब बच्चा घंटों स्क्रीन पर समय बीताता है तो उसका दिमाग न केवल पैसेव इनफार्मेशन लेता है, जिससे उसकी एकाग्रता कम हो जाती है और अलग तरीके से सोचना शुरू कर देता है।  

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बता दें कि इससे बच्चों की सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है और अटेंशन डिफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। बच्चे हमारी दुनिया से कट कर एक वर्चुअल दुनिया में रह जाते हैं।

बता दें कि यह आदत बच्चे के अंदर भावनाओं के कमी को पैदा करती है। पेरेंटिंग का मतलब होता है बच्चे को भावनाओं को संभालना सीखाना। जब बच्चा बहुत रोता है या दुखी होता है और आप उसे फोन दे देते हैं तो वह अपनी भावनाओं को मैनेज करना नहीं सीख पाता। वह यह नहीं जान पता कि इन इमोशंस से कैसे लड़ें या दूसरों से कैसे बात करें। ऐसे में बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं और जिद्द करने लगते हैं। उनमें सामाजिक मेलजोल की भी कमी हो जाती है, जिससे भविष्य में उन्हें दोस्त बनाने में दिक्कत होती है या टीम के साथ काम करने में परेशानी हो सकती है।

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फोन से निकलने वाला डिपामिन बच्चों को इसकी लत लगा देता है। इसके अलावा इंटरनेट एक खुला समंदर के रूप में देखा जाता है। बिना निगरानी के फोन इस्तेमाल करने से बच्चे अश्लील हिंसा या साइबर पुलिस के संपर्क में आते हैं। इसके लिए उनका कोमल मन तैयार नहीं होता। यह उनके मन में अक्रामक व्यवहार पैदा करता है। 

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नोट - आप काम के बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लें और बच्चे के साथ बातें करें। उनके साथ खेलने के लिए समय निकालें। घर में जो फोन जोन बनाएं। बच्चों को खिलौने, पेंटिंग या आउटडोर गेम्स के लिए प्रोत्साहित करें।

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