Fri Sep 11, 2026 | Updated 06:24 PM IST

15 रुपये से शुरू हुई थी प्रेम कहानी, शादी के बाद ऐसा क्या हुआ कि 4 महीने के बच्चे को छोड़ गई विशाखा?

इस मुलाकात के साथ अतीत की कई ऐसी यादें सामने आती हैं, जिनमें प्यार, शादी, अधूरी पढ़ाई, बेरोजगारी और एक मासूम बच्चे नंदू की कहानी छिपी है। लेकिन विशाखा ने आखिर उमेश और अपने बच्चे को छोड़कर जाने का फैसला क्यों लिया था? इसका सच सिर्फ विशाखा ही जानती थी।
Updated:- 2026-09-10, 21:01 IST
vishakha left husband and 4 month baby 15 rupees sad love story part 2

पहले पार्ट में आपने पढ़ा कि विशाखा और शिवा की बातें धीरे-धीरे निजी जिंदगी के उस हिस्से की तरफ जा रही थी, जो एक बार फिर उसे दर्द का अहसास करवाने वाली थी। अब आगे...शिवा को पहले से ही विशाखा के बारे में पता था, फिर भी वह उससे सवाल कर रही थी, लेकिन वह विशाखा को क्यों बताती कि उसके परिवार के बारे में उससे बिना मिले भी उसे सब पता है। कोकिल उसे सब बताकर गई थी। मगर शिवा ने दुख जताते हुए कहा, “अरे, कैसे?” शिवा ने कहा- बस कैसे क्या, जो ऊपर वाले को मंजूर हो?
शिवा ने भी बेटे के बारे में ज्यादा पूछकर उसके दुख को और बढ़ाना नहीं चाहा। थोड़ी देर दोनों चुप रहीं। फिर शिवा ने पूछा, “क्या करती है बेटी?”
विशाखा ने कहा “लॉ कर रही है।” शिवा- और शादी?
वह हंसी, तो शिवा ने उसकी बात पूरी करते हुए कहा, “समझ गई। आजकल लड़कियां शादी कहां करना चाहती हैं। खुद कमाती हैं। अकेली दुनियाभर में घूमती हैं, तो आदमी की जरूरत ही कहां है?” उसने कहा, “सही कहती हो।”
शिवा ने हंसते हुए कहा- “और क्या, अब लड़कियों को जबरदस्ती धक्का तो नहीं दे सकते। वैसे भी शादी करें या न करें, यह फैसला उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए।” 

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फिर दोनों ने एक दूसरे को घर पर आने के लिए इवाइट किया और आगे बढ़ते हुए विशाखा अपनी राह चली गई और शिवा अपने घर की तरफ आ गई, लेकिन उसके दिमाग में न जाने कितनी बातें चल रही थीं। क्या नंदू की उसे कभी याद आई होगी? क्या उसने कभी सोचा होगा कि एक बीमार बच्चे को इस तरह छोड़कर जाना ठीक था? जब नंदू बेटा गुजरा होगा, तब क्या उसे कभी इस बात का दुख या गिल्ट महसूस हुआ होगा? उमेश की बहन कोकिल एक बार शिवा को ढूंढ़ते हुए उसके पास आ पहुंची थी। उसी ने विशाखा के बारे में उसे सारी बातें बताई थीं। उमेश और विशाखा के उस अटूट प्रेम के बारे में भी।

यह प्रेम शुरू भी कैसे हुआ था, इसकी गवाह तो शिवा खुद थी। चालीस साल पुरानी बारिश से भीगी वह दोपहर। युवाओं के लिए चलने वाले रेडियो के एक कार्यक्रम में उमेश, विशाखा, शिवा और नारायण मिले थे। वहां से जब वे सब पंद्रह-पंद्रह रुपए का चेक लेकर निकले थे, तो ऐसा लगा था जैसे करूं का खजाना हाथ लग गया हो। पहली कमाई की खुशी ही कुछ और थी। वहीं उन सबकी दोस्ती हो गई थी। उन दिनों अक्सर दोस्ती बढ़ते-बढ़ते प्यार में बदल जाया करती थी। वहीं से विशाखा और उमेश के बीच भी प्यार हो गया था। तब न उमेश कुछ करता था और न ही विशाखा। लेकिन प्यार भला यह सब क्यों देखता है? आगे आने वाली मुश्किलों के बारे में सोचकर आखिर किसे प्यार होता है। वरना तो खाली जेब वाले कभी प्यार ही न कर पाते, वैसे भी प्यार के बारे में तब कहा जाता था कि प्यार न जाति देखता है, न धर्म और न ही अमीरी-गरीबी।

विशाखा और उमेश की जिंदगी में भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ था। वे हर रोज मिलते थे। घर वालों को भी अपने रिश्ते के बारे में बता चुके थे। विशाखा पर अपनी मां की इस सीख का भी कोई असर नहीं पड़ा था कि पहले जिंदगी में कुछ बन जाओ, फिर प्यार करना। जिससे कहोगी, उसी से शादी कर देंगे। दोनों चाहते थे कि नौकरी जब लगेगी, तब लग जाएगी। सबसे पहले वे शादी करना चाहते थे। उमेश के घर वालों को तो इस रिश्ते से कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन विशाखा के माता-पिता को बेरोजगार लड़का पसंद नहीं था। उन्हें चिंता थी कि वह खुद क्या खाएगा और उनकी बेटी को क्या खिलाएगा। उन्हें लगता था कि उनकी इतनी सुंदर लड़की एक बेरोजगार लड़के के साथ कैसे रह पाएगी?

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शादी के बाद मांग में ढेर सारा सिंदूर भरे विशाखा और उसका हाथ पकड़े उमेश अक्सर मिल जाते थे। कुछ ही महीनों में विशाखा उमेश के घर वालों की शिकायत भी करने लगी थी। वह बताती कि कैसे उन दोनों पर जल्दी से जल्दी नौकरी ढूंढ़ने का दबाव बनाया जा रहा है, ताकि वे अपना खर्च खुद उठा सकें। क्योंकि उमेश के माता-पिता को अपने दूसरे बच्चों को भी पालना था। वह अपनी मां की बातें भी दोहराने लगी थी, “उन्होंने तो मना किया था, मगर मैं ही नहीं मानी।” उमेश खड़ा-खड़ा उसकी बातें सुनता, मगर कुछ नहीं बोलता। पढ़ाई पूरी हुई नहीं थी, तो नौकरी मिलती भी कैसे? फिर एक दिन पता चला कि दोनों एक बच्चे के माता-पिता बन गए हैं।

बाकी दोस्तों को लगा कि अब तक तो उनका अपना ही खर्च नहीं चल रहा था, ऊपर से एक बच्चा भी आ गया। लेकिन सब चुप रहे। दूसरों की जिंदगी के बारे में कोई बाहर वाला, चाहे दोस्त ही क्यों न हो, बोल भी तो कैसे सकता था? बाकी सब दोस्त अभी पढ़ रहे थे और साथ में तरह-तरह के इम्तिहान भी दे रहे थे। धीरे-धीरे उनकी नौकरियां लगती गईं, तो मिलना-जुलना भी कम हो गया। शिवा भी नौकरी के बाद ज्यादा मिल नहीं पाती थी। कहीं निकलना ही नहीं होता था। उमेश और विशाखा से मिले हुए भी बहुत वक्त बीत गया था। एक शाम विशाखा कहीं से लौट रही थी। उसे जल्दी थी। सर्दी के दिन थे और बस का भी कुछ पता नहीं था। तभी सामने से उमेश आता हुआ दिखाई दिया। उसके साथ उसका बच्चा नंदू भी था। शिवा को तभी पता चला कि विशाखा तो नंदू के चार महीने का होते ही चली गई थी।

“लेकिन कहां?” “दरअसल वह अपने माता-पिता के घर गई थी। अब तो तलाक भी आखिरी दौर में है। सुना है कि जल्दी ही शादी करने वाली है।”
यह सुनकर शिवा को बड़ा धक्का लगा था। क्या वे लोग सही थे, जो उस समय कह रहे थे कि शादी की इतनी जल्दी क्या है, पहले कुछ कर लो? तब के बाद चार दशक का लंबा समय बीत गया। उमेश अब इस दुनिया में नहीं रहा था और विशाखा से अब मुलाकात हुई थी। शिवा को लगा जैसे जिंदगी वहीं आकर ठहर गई है, जहां से यह सब शुरू हुआ था।
हालांकि विशाखा के हिस्से की कहानी क्या थी और वह क्यों चली गई थी, यह तो वही जानती थी। उसकी जिंदगी को लेकर फैसला सुनाना दूसरों के लिए बहुत आसान था।

यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।

लेखक- क्षमा शर्मा

Image credit- gemini, anjani reddy

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