Fri Sep 11, 2026 | Updated 06:25 PM IST

प्रभा की कहानी सुनने के बाद सपना ने क्यों चुना आश्रम का रास्ता, ऐसा क्या हुआ?

पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कि प्रभा ने अपनी दर्दभरी आपबीती सुनाकर सपना को अंदर तक झकझोर दिया था। अब आगे पढ़िए, उस मुलाकात के बाद सपना की जिंदगी ने कौन-सा नया मोड़ लिया। 
By Sakhi Digital | Edited By Priya Singh
Updated:- 2026-07-26, 22:00 IST
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सपना जब प्रभा से मिलने के लिए आश्रम पहुंची, तो उसकी भव्यता देखकर हैरान रह गई। विशाल इमारत और  श्रद्धालुओं के रहने के लिए सुविधा भी अच्छी थी। आश्रम में लोगों से पता पूछते-पूछते आखिर सपना को प्रभा का कमरा मिल गया। जैसा ही मैं कमरे की तरफ बढ़ी प्रभा ने देखते ही मुझे खुद आगे बढ़कर गले लगा लिया और पूछा  "कैसी हो, प्रभा? यहां इस आश्रम में कैसे और क्यों आई तुम?” सपना ने कहा- “जब से तेरा फोन आया है, तब से मैं सब कुछ जानने के लिए बेचैन हूं।" प्रभा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- “अरे घर-गृहस्थी में उलझे रहने के कारण हम एक-दूसरे के हाल-चाल भी नहीं जान पाएं, जब पत्रिकाओं में मुझे तेरा नााम दिखा, तो तुझसे मिलने का मन हो गया, तू तो अच्छी लेखिका बन गई है सपना’” मैंने मुस्कुराकर कहा, "बस, यह तो समय बिताने का एक साधन है। तू बता, इस आश्रम में कब से है और यहां क्यों आई?"

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ये सुनकर प्रभा की आंखें भर आईं। उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, "हां सपना, मैं खुद अपनी कहानी, अपनी आपबीती सुनाने को बेताब हूं। इस बहाने अपनों का जिक्र करके शायद मन हल्का हो जाए। तू तो लेखिका है, मेरी आपबीती को किसी पत्रिका में छाप देना। जिन्होंने मुझे ये दर्द दिए हैं, मैं चाहती हूं वे इसे पढ़ें, उन्हें भी अपने किए का पछतावा हो और वे चैन से सो न सकें।" थोड़ी देर चुप रहने के बाद प्रभा ने अपनी कहानी शुरू की।"सपना, मेरा बचपन प्यार की बौछारों में बीता था। पढ़ाई पूरी होने के बाद मेरा विवाह हो गया। इतना तो तू मेरे बारे में पहले से जानती ही है। शादी के बाद ससुराल की दहलीज पर कदम रखा। कहते हैं कि विवाह के बाद हर औरत का दूसरा जन्म होता है। मां-बाप की देहरी छूटी और ससुराल की दहलीज पर कदम रखा। कहते हैं, विवाह के बाद हर औरत का दूसरा जन्म होता है। मायके का खुला और बेफिक्र माहौल छोड़कर ससुराल की नई जिम्मेदारियों के बीच खुद को ढालना आसान नहीं था। फिर भी मैं खुश थी। नए रिश्तों का अपनापन ऐसा था कि समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।

विवाह के शुरुआती दो-तीन साल हंसी-खुशी और प्यार के साथ बीते थे। तब लगा था कि जिंदगी हमेशा इसी तरह मुस्कुराती रहेगी, लेकिन वक्त के साथ घर का माहौल बदलने लगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि सभी की निगाहें एक नए मेहमान के इंतजार में थीं। इंतजार करते-करते सात साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला। इन 7 सालों के दौरान इलाज, व्रत-उपवास, गंडे-तावीज, मंदिरों की मन्नतें और यहां तक कि मैंने नीम-हकीमों का भी सहारा लिया ताकि बच्चा हो जाए। आखिरकार एक दिन डॉक्टर की रिपोर्ट ने मेरी सारी उम्मीदें तोड़ दीं। उसके बाद जैसे सब कुछ बदल गया।  पहले से रिश्तों में घुला प्यार धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा, साफ देखा जा सकता था कि सास के व्यवहार में अपनापन नहीं रहा और पति के चेहरे की उदासी व उनकी बेरुखी भी दिल दुखा रही थी। ये सब बातें मुझे हर पल भीतर तक तोड़ती रहती। हालांकि, इन सब के बाद मैं उनसे क्या कहती, जब मैं खुद ही अपने आपको अधूरा और हीन समझने लगी थी। 

देख सपना मनुष्य के मन के भाव बदलते देर नहीं लगती। कभी जो समय घर प्यार से भरा लगता था, वहां अब मेरे लिए अपनापन कम होता दिख रहा था। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी। इसी बीच रोहित के दूसरे विवाह की बातें शुरू हो गईं। यह सुनकर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने रोहित से कहा, 'रोहित, क्या हमारे प्यार भरे दिन तुम इतनी जल्दी भूल गए?'

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रोहित ने ठंडे स्वर में कहा, 'नहीं प्रभा, मैं कुछ भी नहीं भूला हूं, लेकिन तुम बताओ कि मैं यह भी कैसे भूल जाऊं कि तुम मां नहीं बन सकती।' ये सुनकर मैंने भर्राए गले से पूछा, 'लेकिन रोहित, अगर यही कमी तुममें होती, तो क्या समाज मुझे दूसरी शादी करने की इजाजत देता? क्या तुम मुझे ऐसा करने देते?' मेरी बात सुनकर रोहित को अच्छा नहीं लगा, उसने मुझपर एक तीखी नजर डाली, लेकिन उसके पास मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं था। आखिर वह दिन भी आ गया, जब मेरी सौतन घर में आ गई था। जो घर कभी मेरा था, अब उस पर उसका अधिकार था। घर में रहते हुए हर पल अपमान और मानसिक पीड़ा सहना मेरे बस की बात नहीं थी।  आखिरकार एक दिन मैंने वह घर छोड़ दिया और मां के पास आ गई।

इसके बाद मैंने जिंदगी को फिर से संभालने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए नौकरी करना शुरू किया। धीरे-धीरे समय बीतता गया। फिर एक ऐसा दौर आया, जब मां और पापा दोनों इस दुनिया से चले गए। ऐसे में अब मैं आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद भाई-भाभी को मेरा साथ खलने लगा था। कुछ समय तक अकेलेपन और असुरक्षा के डर से मैं उनका अनादर चुपचाप सहती रही, लेकिन आखिर कब तक? खोजबीन से इस आश्रम की जानकारी मिली, मैंने यहां रहने का निर्णय ले लिया। सपना यहां हम जैसी न जाने कितनी महिलाएं हैं, जो तन, मन और धन से सेवा कर रही हैं। बस सपना, यही है मेरी आपबीती थी, अब पता चल गया न मैं यहां कैसे आई?"

क्या प्रभा की इस कहानी के बाद सपना भी घर छोड़ देगी, जानने के लिए इंतजार करें अगले पार्ट का...

यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।

लेखक- सुशीला द्विवेदी

image credit- Gemini

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