Thu Oct 8, 2026 | Updated 12:08 AM IST

Main Hoon Apni Dhanlaxmi Part-38: धन से कैसे बनता है हमारा संबंध? जानें शुरुआत के नियम

बचपन की स्मृतियों से किस प्रकार निर्मित होता है धन से हमारा संबंध। उसका असर किस प्रकार धन से जुड़े हमारे निर्णयों पर पड़ता है, साथ ही सही दिशा में कदम रखने की कैसे कर सकते हैं शुरुआत, बता रही हैं डा. आरती गुप्ता 
Updated:- 2026-08-12, 20:16 IST
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बीते कुछ वर्षों में मैं कई तरह के लोगों के संपर्क में आई, जिनकी बातों ने मुझे चकित किया। उनमें 15 वर्ष से पढ़ा रहीं एक स्कूल टीचर थीं, जिन्होंने एक रुपया भी निवेश नहीं किया था। इसकी वजह ये नहीं थी कि उनके पास धन नहीं था, बल्कि उनके आस-पास ऐसा कोई नहीं था, जिसने निवेश किया हो, इसलिए उन्हें निवेश की शुरुआत करना जोखिमभरा लगता था। एक इवेंट प्लानर जो पिछले एक दशक से अच्छा खासा कमा रहे थे, उन्होंने भी बस सेविंग ही की। वो धन उनके अकाउंट में यूं ही पड़ा रहा। चूंकि रिटर्न की गारंटी नहीं होती, इसलिए वे आगे ही नहीं बढ़ सके। एक सरकारी अधिकारी, जो 12 साल से नौकरी कर रहे थे, उन्होंने तीन इंश्योरेंस पालिसी खरीदी थीं और उनका प्रीमियम अदा कर रहे थे, पर उनके विषय में वे बता पाने में असमर्थ थे। बस पालिसी खरीद ली, क्योंकि एजेंट ने भविष्य की सुरक्षा का हवाला दिया और उन्हें लगा कि ये जिम्मेदारी वाला काम होगा। उन्होंने पालिसी का कोई कागज नहीं पढ़ा, बस खरीद लीं।

देखा जाए तो ये सभी लोग गैर जिम्मेदार नहीं हैं, न ही अक्लमंदी की कमी है। बहुत से मामलों में उनकी जानकारी का स्तर सामान्य लोगों से कहीं अधिक होगा, लेकिन जब पैसे की बात आती है तो कुछ चीजें रह जाती हैं। आत्मविश्वास नदारद हो जाता है। निर्णय लेना सहज नहीं होता। पहला सवाल आता है कि क्या खरीदें, फिर ये सोचकर तनाव होता है कि उसके लिए धन कहां से जुटाएंगे। खर्चे बढ़ते जाते हैं, पर उन पर गंभीरता से ध्यान नहीं जाता। जीवनसाथी, माता-पिता व संतान के बीच जो संवाद होना चाहिए वो कभी शुरू ही नहीं हो पाता।

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ये किसी स्त्री या पुरुष की समस्या नहीं है। ये सभी के साथ हो सकती है, पर महिलाओं के साथ कुछ अतिरिक्त चीजें जुड़ जाती हैं। बहुत से लोग धन के प्रबंधन को लेकर असहज महसूस करते हैं, अस्पष्टता लगती है, फलस्वरूप उससे बचने की जुगत में लग जाते हैं। ये लगता है कि कोई और आकर ये काम संभाल ले। ये सब बातें बड़ा बोझ बन जाती हैं। एक प्रकार का भय घेर लेता है। डर लगता है कि कहीं हम गलत न कर बैठें। जानकारी के अभाव को लेकर मन विचलित होता है। ये लगता है कि लोग निर्णयों को सही-गलत की कसौटी पर तोलेंगे। उन्हें लगता है धन उनका कार्यक्षेत्र नहीं है। ये डर इतना बड़ा हो जाता है कि दीवार बन जाता है।

इस स्तंभ में आज हम किसी उत्पाद या रणनीति की बात नहीं करेंगे। हम चर्चा करेंगे कि ये दीवार कब बनती है।

धन को लेकर आपकी शुरुआती याद क्या है?

ये वित्त से जुड़ा सवाल नहीं है। मानवीय प्रश्न है। पुरानी यादों को टटोलें। हो सकता है कि मां को आपने किचेन टेबल पर माह के अंत में नोट गिनते देखा हो, सामान्य अवस्था से अलग उस समय उनका चेहरा धीर-गंभीर हो। संभव है कि स्कूल ट्रिप के लिए आपको पैसे दिए गए हों, साथ ही उसे संभालकर रखने की हिदायत भी मिली हो। हो सकता है कि कोई चर्चा सुनी हो कि अमुक खर्च परिवार के सामर्थ्य से बाहर है, आपको देखते हुए वो संवाद रुक गया हो। पहली बार धन कमाने की खुशी व गर्व का क्षण भी उससे जुड़ा हो सकता है। किसी चीज को खरीदने की चाह हो और उसके लिए मना कर दिया गया हो।

वो जैसी भी याद हो, उसका निहितार्थ उस क्षण तक सीमित नहीं है, ये धन के साथ आपके संबंध की शुरुआत भी है। धन को समझने से पहले ही ये संबंध बन चुका था, आपके प्रत्येक वित्तीय निर्णयों पर मौन रूप से उसका प्रभाव रहा।

ये हमें किसी ने सिखाया नहीं। हम स्कूल में गणित पढ़ते हैं, इतिहास, विज्ञान और कभी-कभी अर्थशास्त्र पढ़ते हैं, लेकिन हमें कभी भी धन को लेकर भावुक संबंध के विषय में नहीं पढ़ाया जाता। इसे तो हम अपने परिवार में परवरिश के दौरान स्वजन से सहज भाव में सीखते हैं। इसे लेकर डर और मौन, मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में कब सीख के रूप में आत्मसात करते जाते है, इसका पता ही नहीं चलता। परवरिश के तौर-तरीकों से हमारे वित्तीय निर्णय प्रभावित होते हैं।

एक लड़का जो ऐसे माहौल में पला-बढ़ा है, जिसने परिवार में धन को लेकर संवाद होते नहीं देखा, वो अपनी वित्तीय चीजों को पत्नी से छिपाकर रखेगा, धन से जुड़े निर्णयों को लेकर उनके बीच कोई संवाद नहीं होगा। एक-दूसरे की सोच का पता तब चलता है जब तक धन को विपरीत मद में खर्च करने को लेकर ठन नहीं जाती। वहीं एक लड़की जिसने अपनी मां को पिता की नजरों से बचाकर बचत करते देखा है, उसे लगता है कि इसे गोपनीय रखना ही उचित होता है। जिन लोगों को ये कहते सुना जाता है कि और अधिक की मांग करना लालच का पर्याय है, वे चाहेंगे कि कभी बहुत अधिक उपलब्धता न हो।

धन को लेकर लोग कई प्रकार का सोच रखते हैं। एक महिला ये मानती है कि फिक्स्ड डिपाजिट्स में धन रखने से वह सुरक्षित रहेगा, इसलिए वह 15 साल तक उसमें ही धन डालती है। इसमें उसे जिम्मेदार होने का बोध होता है, लेकिन एफडी में करीब चार-पांच प्रतिशत सालाना ब्याज ही मिलता है, जबकि महंगाई पांच-छह प्रतिशत की दर से बढ़ती है। इस प्रकार देखें तो उसका धन बढ़ता नहीं, बल्कि कम होता जाता है। उसकी ये असफलता बाजार की वजह से नहीं है, बल्कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसने परवरिश के दौरान यही तरीका सीखा होता है। उसे लगता कि इस तरह धन को सुरक्षित रखा जा सकता है, पर इस कारण 15 साल में उसे अधिक चक्रवृद्धि ब्याज राशि का हर्जाना होता है।

ये सब अंतिम रूप से मान्य चीजें नहीं, बल्कि विश्वास की बात है और उसे बदला भी जा सकता है।

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इस बदलाव की शुरुआत तीन चरणों में होती है। प्रथम, सजग होना पड़ेगा, ये देखना होगा कि किस माहौल के कारण आपका ये विश्वास बना है। दूसरा, मूल्यांकन करें, स्वयं से ईमानदारी से सवाल करें कि वास्तविकता की कसौटी पर वह विश्वास कितना खरा है? क्या महज बचपन की यादों को सीख मानकर आपने अपनाया है और उसे लेकर कभी कोई सवाल नहीं किए। तीसरा, बदलाव को अपनाना। इच्छाशक्ति के साथ नवीन परिदृश्य में नई चीजों को देखने का प्रयास करना होगा। उसी के अनुरूप नए तौर-तरीकों को अपनाना होगा। यहीं पर आकर फिक्स्ड डिपाजिट को एसआइपी में बदलने की शुरुआत होगी। धन से जुड़ी चीजों से बचने के बजाय आप उनमें रुचि लेंगी। समय के साथ आपका डर आत्मविश्वास में बदल जाएगा।

इस स्तंभ का उद्देश्य आपको उस यात्रा के विषय में तैयार करना है। इसकी शुरुआत इस प्रकार करें। तीन वाक्य लिखें, तीनों के उत्तर ईमानदारी से त्वरित दें। उसमें कोई संशोधन न करें।

  • धन के मायने हैं...
  • जो लोग धन के बारे में खुलकर बात करते हैं, उनके बारे में राय...
  • जब निवेश के विषय में सोचती हूं तो महसूस होता है...

इन सवालों के जो जवाब सबसे पहले जेहन में आएंगे, वही सबसे विश्वसनीय होंगे। अपने जवाबों पर विचार करें, ये सोचें कि वैसा खयाल कहां से आया। क्या उससे आपके मौजूदा उद्देश्य की पूर्ति होती है। ईमानदारी से पूछे गए सवाल के साथ सोच में बदलाव के तीसरे चरण की शुरुआत होगी।

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अगले हफ्ते, मैं आपसे कुछ व्यक्तिगत बातें साझा करूंगी। अपनी कहानी बताऊंगी। उम्मीद है कि आप उसे जानना चाहेंगे।
अर्थ से जुड़ी जिज्ञासा व अनुभव साझा करने के लिए हमें लिखें- iamolaxmi@gmail.com

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Images: magnific

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