Main Hoon Apni Dhanlaxmi Part-41: बजट से लेकर बचत तक, दादी-नानी के ये तरीके आज भी हैं बेमिसाल

बजट बनाने में सहूलियत देने वाले एप्स, स्प्रैडशीट्स या पर्सनल फायनेंस से जुड़े स्तंभ आज के दौर में प्रचलित हैं, पर उनके आगमन से बहुत पहले ही भारतीय महिलाओं ने अपने घर-खर्च को व्यवस्थित करने का तरीका खोज निकाला था। किस मद में कितना खर्च होगा, इसके लिए कागज कलम पर लेखा-जोखा बनाने के बजाय किचेन की शेल्फ पर सजे कुछ डिब्बों में या अलमारी में बड़े सहज भाव में वे सबकुछ सहेज देती थीं। स्टील के उन प्रत्येक डिब्बे में रखे धन का एक अलग उद्देश्य होता था।
कोई डिब्बा मासिक राशन के लिए था तो किसी में स्कूल फीस के पैसे रखे जाते थे। किसी में बिजली बिल की राशि सहेजी जाती तो किसी में दो साल बाद संभावित शादी खर्च के लिए धन जोड़ने की शुरुआत हो चुकी होती थी। किसी अप्रत्याशित खर्च से निपटने के लिए बचत अलग से की जाती थी। ये हमारी दादी-नानी की सूझबूझ थी। किसी ने भी उन्हें 50-30-20 का नियम नहीं समझाया। उन्होंने जीरो बेस बजटिंग के बारे में सुना भी नहीं होगा, न ही इस विषय को विस्तार से समझाने वाली फायनेंस की किताबों पर नजर दौड़ाई होगी, पर इसके पीछे जो मूल सिद्धांत था उस पर उन्होंने व्यावहारिक अमल सुनिश्चित किया। उन्होंने ऐसा नहीं किया कि सारे खर्च निपटाने के बाद जो बचे उसे बचत माना हो। सबसे पहले बचत राशि निकालने के बाद जो धन बचा, उससे खर्चों को व्यवस्थित करने की कला वे जानती थीं। डिजिटल वालेट और बैंक अकाउंट के युग में हम में से बहुत लोग सामान्य तौर पर ऐसा नहीं करते।
इस पर विचार करें कि आपके पास जब धन आता है तो क्या होता है। बैंक खाते में ये धन आता है। दीवाली की खरीदारी, स्कूल फीस, राशन खर्च, सेवानिवृत्ति के लिए बचत, सभी मद के लिए धन एक ही जगह दिखता है। आप धन पर एक नजर डालते हैं, हर खर्च के लिए धन की उपलब्धता प्रतीत होती है। जब भी कोई खर्च आन पड़ता है तो खाते में पड़ी राशि पर नजर डालते हैं और संबंधित मद में खर्च कर देते हैं। माह समाप्त होने पर याद भी नहीं रहता कि सारा पैसा कहां खर्च हो गया। बस ये पता होता है कि पैसे खर्च हो चुके हैं।

स्टील के डिब्बों में हर मद के लिए धन सहेजने का तरीका इसी बेफिक्री पर लगाम लगाता था। जब किसी खर्च के लिए पैसे अलग निकाल कर रख दिए जाते थे, तो उसे अन्य मद में खर्च करने में हिचक होती थी। सारा धन एक जगह पर हो तो ये एहसास ही नहीं होगा कि किसी मद के लिए जो राशि निकाली जानी चाहिए, उसका इस्तेमाल किसी अन्य खर्च में किया जा रहा है। धन को विभिन्न मदों में पृथक किए जाने से वित्तीय व्यवहार में बड़ा बदलाव आ जाता था। ये पता होता था कि पृथक किया गया धन किसी खास उद्देश्य के लिए है। ये उद्देश्य बजट के किसी भी नियम से बड़ा है, जिसकी वजह से वित्तीय व्यवहार में बदलाव आता है। हमारी दादी नानी के पास जो चीजें उपलब्ध थीं, उनका इस्तेमाल करते हुए उन्होंने व्यावहारिक समस्या का समाधान निकाला। उन्होंने जो व्यवस्था बनाई वह घर खर्च को व्यवस्थित करने का सहज तरीका बन गया। उन्हें ये पता था कि यदि उन्होंने विभिन्न मदों में धन की बचत नहीं की तो वह धन कहां खर्च हो जाएगा, पता भी नहीं चलेगा। जिस धन के साथ उद्देश्य जुड़ जाता है, वो संचित रहता है।
जिन घरों में एक निश्चित धनराशि आती है, उनके लिए 50-30-20 का नियम एक अच्छी शुरुआत हो सकता है। हालांकि आम भारतीय घरों को बजट के इस नियम का पालन करते कम ही देखा जाता। स्कूल में दाखिले के लिए एकमुश्त राशि की आवश्यकता होती है। त्योहारों की अपनी गरिमा होती है। शादियों से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियां होती हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पिता का मेडिकल खर्च सहूलियत के हिसाब से टाला नहीं जा सकता। ये अपवाद नहीं हैं। ऐसी आवश्यकताएं हर साल ही आन पड़ती हैं। जिस फ्रेमवर्क में इनकी अनदेखी की जाती है, उसे लोग सामान्यत: नहीं अपनाते। इसकी वजह अनुशासन की कमी नहीं होती, बल्कि मूल कारण होता है कि इसे उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार नहीं किया जाता। डिब्बे में हर मद के लिए धन सहेजने का तरीका भारतीय जरूरतों के अनुरूप रहा है।
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अब इसका आधुनिक अवतार देखें। आपकी सैलरी आती है और 24 घंटे के भीतर उसकी पाई-पाई का हिसाब हो जाता कि कहां कितना खर्च होना है। इसके बारे में बहुत योजना से नहीं चलते, माह समाप्त होने पर किस मद में कितनी राशि खर्च हुई, इस पर भी विचार नहीं करते। सैलरी जब आती है, तो आपके पास अपने सभी खर्चों की पूर्व योजना होनी चाहिए। इस पर विचार के लिए हम समय नहीं निकालते जबकि ये माह का सबसे अहम दिन होना चाहिए।
धनराशि का प्रथम आवंटन भविष्य के लिए निवेश में होना चाहिए। आपकी एसआइपी, इमरजेंसी फंड में योगदान, रिकरिंग डिपाजिट, रिटायरमेंट के लिए बचत। इस मद के लिए राशि निकालने के बाद अन्य खर्चों की योजना बनानी चाहिए।
दूसरा आवंटन आपकी निश्चित देयता पूरी करने के मद में होना चाहिए, जैसे किराया या घर की ईएमआइ, स्कूल फीस, इंश्योरेंस प्रीमियम, राशन, विभिन्न प्रकार के बिल। जो खर्च जरूरी हैं, वो तो किए ही जाएंगे। इसके लिए आपको कोई निर्णय नहीं लेना होताा, बस राशि जमा करनी होती है।
तीसरा आवंटन है, जिसकी बहुत से लोग बजट में अनदेखी कर जाते हैं, पर हमारी दादी-नानी को उसकी भरपूर समझ थी। ये वार्षिक खर्च होते हैं। एकमुश्त राशि की जरूरत हर माह नहीं पड़ती, लेकिन दीवाली, स्कूल में दाखिले का समय या पर्यटन-यात्रा, घर की मरम्मत इत्यादि पर होने वाले खर्च इस श्रेणी में आएंगे, जिनके बारे में हमें पहले से अंदाज रहता है। प्रत्येक के लिए आवश्यक राशि को जोड़कर उसे 12 से भाग दें। फिर उतनी ही राशि हर माह अलग कर दें। इस तरह जब एकमुश्त राशि की जरूरत पड़ेगी तो बोझ नहीं महसूस होगा। इन तीन मद में धन आवंटित करने के बाद जो राशि बचती है, उसे अपनी इच्छा से कहीं भी इस्तेमाल कर सकती हैं।

दादी-नानी का तरीका उन्हें दूसरों से अलग नहीं करता, इसलिए मुझे ये विशेष रूप से अर्थपूर्ण लगता है। अधिकांश भारतीय महिलााएं जो घर चलाती हैं, वो वर्षों से इस तरह धन का आवंटन करती आई हैं, पर उन्होंने कभी इसकी खूबियां नहीं गिनाईं। इस बात पर विचार करें कि इस हफ्ते किस खर्च की जरूरत है और किसके लिए अगले हफ्ते का इंतजार किया जा सकता है। एक मद के बजट को खींचते हुए किसी अप्रत्याशित खर्च को वहन किया जा सकता है। कौन सी जरूरत को तत्काल पूर्ण करना आवश्यक है और किसके लिए इंतजार किया जा सकता है, ये समझना आवश्यक है। डिब्बा सिस्टम में यही कौशल झलकता है, यह आपको एक वित्तीय समाधान उपलब्ध कराता है। हमारी दादी-नानी ने शायद बजट का अध्ययन नहीं किया होगा। वित्तीय योजना के बारे में भले ही उन्होंने कोई बात नहीं की, पर उन्हें उन सब चीजों की समझ थी, जिनके महत्व की बात हम आज करते हैं। जिस धन के साथ कोई उद्देश्य नहीं जुड़ा होता, वो शीघ्र ही कहां खर्च हो जाता ये याद भी नहीं रहता। जिस धन के साथ कोई उद्देश्य जुड़ जाता है उससे ही संपदा निर्मित होती है।
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इस हफ्ते, अपने सामने चार डिब्बे यानी खर्च के चार मद रखें। ये अलग उद्देश्य के लिए चिह्नित चार बैंक खाते भी हो सकते हैं, सैलरी आने पर उनमें स्वत: धन स्थानांतरित होने की व्यवस्था बनाएं। एप के नोट्स में फोल्डर बना सकती हैं या किसी कापी में चार कालम बनाएं। यहां माध्यम नहीं बल्कि उद्देश्य महत्व रखता है। सैलरी आने पर धन के प्रथम आवंटन के बाद शेष राशि से अन्य मद के खर्च सुनिश्चित करें।
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