एकादशी का नाम आते ही भगवान विष्णु और व्रत की बात सामने आती है, लेकिन भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली परिवर्तिनी एकादशी की कहानी थोड़ी अलग और काफी दिलचस्प है। इस दिन का नाम ही भगवान विष्णु के करवट बदलने से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि योगनिद्रा में सो रहे भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट बदलते हैं। इसी वजह से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

ऐस्ट्रोलॉजर प्रद्युम्न सूरी ने अपने इंस्‍टाग्राम पोस्‍ट पर पोस्‍ट शेयर कर जानकारी शेयर की है क‍ि यह एकादशी जीवन में शुभ बदलाव लेकर भी आता है। जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें परेशानियों से राहत मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है, लेकिन भगवान विष्णु के करवट बदलने के पीछे आखिर क्या कहानी है? इसके बारे में हम आपको अपने इस लेख में बता रहे हैं। आइए जानते हैं-

image credit- magnific

Parivartini Ekadashi को क्यों कहते हैं जीवन बदलने वाला दिन?

आपको बता दें क‍ि परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के करवट बदलने वाला दिन माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन योगनिद्रा में रहने वाले भगवान विष्णु करवट लेते हैं। इसी वजह से इसका नाम परिवर्तिनी पड़ा। इस दिन को जीवन में अच्छे बदलाव से भी जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है।

पर‍िवर्तनी एकादशी को और किन नामों से जानते हैं?

परिवर्तिनी एकादशी को अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। इनके पीछे भी भगवान विष्णु और इस दिन से जुड़ी मान्यताएं हैं।

  • परिवर्तिनी एकादशी: भगवान विष्णु के करवट बदलने से यह नाम जुड़ा है।
  • पार्श्व एकादशी: पार्श्व का मतलब बगल या साइड वाला हिस्सा होता है।
  • वामन एकादशी: भगवान विष्णु के वामन रूप से इसका संबंध है।
  • जलझुलानी एकादशी या डोल ग्यारस: राजस्थान, मध्य प्रदेश और ब्रज में इस दिन देवता को डोले या पालकी में बाहर ले जाने और नदी या तालाब में स्नान कराने की परंपरा है।

राजा बलि से जुड़ी है इस एकादशी की कहानी

परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा का जिक्र ब्रह्मवैवर्त पुराण में है। इस कहानी में प्रह्लाद के पोते राजा बलि का नाम आता है। बताया जाता है क‍ि राजा बलि दैत्य थे, लेकिन उन्हें धर्म को मानने वाला और बहुत उदार माना जाता था। वह भगवान व‍िष्णु में भी काफी आस्‍था रखते थे। अपनी तपस्या और यज्ञ के बल पर राजा बलि बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था। इससे देवता परेशान हो गए। उन्होंने भगवान विष्णु से मदद मांगी।

भगवान विष्णु छोटे ब्रह्मचारी बनकर पहुंचे

देवताओं की प्रार्थना के बाद भगवान विष्णु वामन रूप में राजा बलि के पास पहुंचे। वह छोटे से ब्रह्मचारी बालक के रूप में आए।
उन्होंने राजा बलि से सिर्फ तीन कदम जमीन मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह कोई आम बालक नहीं है। उन्हें पता चल गया था कि वामन रूप में भगवान विष्णु खुद आए हैं। उन्होंने राजा बलि को अपना वचन देने से रोकने की कोशिश की, लेकिन राजा बलि ने मना कर दिया।

image credit- magnific

उनका कहना था कि वह एक बार वचन दे चुके हैं, इसलिए अब उयसे वापस नहीं लेंगे। इसके बाद उन्होंने संकल्प का जल देकर तीन कदम जमीन देने का वादा कर दिया।

दो कदम में पूरी धरती और आकाश नाप लिया

वचन मिलते ही भगवान विष्णु ने अपना विशाल त्रिविक्रम रूप ले लिया। इसके बाद उन्होंने एक कदम में पूरी धरती नाप ली। दूसरे कदम में आकाश भी नाप लिया। अब उनके तीसरे कदम के लिए कोई जगह बची ही नहीं थी। राजा बलि समझ गए कि अब उनके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा है। इसलिए उन्होंने अपना सिर भगवान के सामने झुका दिया और तीसरा कदम अपने सिर पर रखने के लिए कह दिया।

राजा बलि से खुश हुए भगवान विष्णु

राजा बलि के इस वचन और समर्पण से भगवान विष्णु बहुत खुश हुए। उन्होंने राजा बलि का नाश नहीं किया। इसके बजाय राजा बलि को सुतल लोक दे दिया गया। भगवान विष्णु ने यह भी भरोसा दिया कि वह खुद राजा बलि के दरवाजे पर रक्षक बनकर खड़े रहेंगे। मान्यता है कि भगवान विष्णु का एक रूप आज भी राजा बलि के साथ रहता है। वहीं उनका दूसरा रूप शेषनाग के साथ क्षीरसागर में रहता है।

डिसक्लेमर: इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित करके यह जानकारी आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।

अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Image Credit-AI