आज से कई साल पहले लड़कियों को पढ़ाई और अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने की आजादी उतनी नहीं थी। ऐसे समय में एक महिला ने अपनी शादी को मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट में इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी और बाद में डॉक्टर बनने का फैसला किया। यह कहानी है रुक्माबाई राउत की। बताया जाता है कि महज 11 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई थी, लेकिन बड़ी होने पर उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार करने से साफ मना कर दिया।
इसके बाद शुरू हुई उनकी कानूनी लड़ाई। उस समय महिलाओं के अधिकारों को लेकर यह बड़ी चर्चा हो गई थी। इस लड़ाई के बाद भी रुक्माबाई रुकी नहीं थी। उन्होंने पढ़ाई का फैसला किया। इसके बाद चिकित्सा यानी मेडिकल फील्ड में अपनी पहचान बनाई। यह सब हम आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि हमने 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' नाम की एक सीरीज शुरू की है। इसी कड़ी में हम रोजाना ऐसी महिलाओं के बारे में बताते हैं। आज हम आपको रुक्माबाई राउत की कहानी बता रहे हैं। आइए जानते हैं-
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कौन थीं रुक्माबाई राउत?
आपको बता दें कि रुक्माबाई राउत का जन्म 22 नवंबर 1864 को मुंबई में हुआ था। उनका परिवार ब्राह्मण था। उनके पिता जनार्दन पांडुरंग पढ़े-लिखे थे और उन्होंने रुक्माबाई को आगे पढ़ने के लिए भी कहा था। उस समय लड़कियों के लिए पढ़ाई करना आसान नहीं था। समाज में लड़कियों के लिए कई तरह की पाबंदियां थीं और लड़के-लड़कियों में काफी भेदभाव किया जाता था। ऐसे माहौल में रुक्माबाई की पढ़ाई जारी रखना अपने आप में बड़ी बात थी।
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11 साल की उम्र में कर दी गई शादी
बताया जाता है कि साल 1884 में रुक्माबाई सिर्फ 11 साल की थीं, जब उनकी शादी दादाजी भीकाजी से कर दी गई थी। वह उम्र में भी रुक्माबाई से बहुत बड़े थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, रुक्माबाई बड़ी हुईं और उन्हें अपने हक के बारे में समझ आने लगी। इसके बाद उन्होंने इस शादी को स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्होंने शादी से अलग होने के लिए कोर्ट में अर्जी डाली। सही मामला आगे चलकर 'रुक्माबाई केस' के नाम से जाना गया।
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इस मामले ने उस समय महिलाओं के अधिकारों को लेकर काफी बहस छेड़ दी थी। कई सामाजिक और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने रुक्माबाई का साथ भी दिया। हालांकि, कानूनी लड़ाई में रुक्माबाई राउत को हार का सामना करना पड़ा था।
महारानी विक्टोरिया को लेकर क्या कहा जाता है?
रुक्माबाई के केस के बाद एक दावा यह भी सामने आया था कि उन्होंने महारानी विक्टोरिया से मदद भी मांगी थी। फिर क्वीन विक्टोरिया ने कोर्ट के फैसले को बदलकर दादाजी भीकाजी के साथ रुक्माबाई की शादी खत्म करवा दी थी। हालांकि, यह रिपोर्ट के अनुसार है। हरजिंदगी इसकी पुष्टि नहीं करती है। यहीं से रुक्माबाई ने अपनी जिंदगी को एक नई दिशा देने का फैसला किया।
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कोर्ट की लड़ाई के बाद चुना डॉक्टर बनने का रास्ता
जब शादी और कोर्ट केस का विवाद चल रहा था तब भी रुक्माबाई ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने डॉक्टर बनने का फैसला किया और चिकित्सा की पढ़ाई के लिए आगे बढ़ीं। वह पढ़ने के लिए लंदन गईं। वहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर विमेन से मेडिकल की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास में अपनी जगह बनाई। उस समय यह एक महिला के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
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सिर्फ डॉक्टर बनकर नहीं रुकीं रुक्माबाई राउत
रुक्माबाई की जिंदगी में सिर्फ डॉक्टर बनना ही उनकी आखिरी मंजिल नहीं थी। उन्होंने महिलाओं से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर भी काम किया है। जब वह 1929 में रिटायर हुईं तब उन्होंने 'पर्दा प्रथा- उन्मूलन की आवश्यकता' नाम की एक पुस्तिका प्रकाशित की। इसमें उन्होंने बताया कि युवा विधवाओं को समाज में आगे बढ़ने और अपना योगदान देने के मौके नहीं मिल पाते। इससे साफ है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दौर तक महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाना जारी रखा था।
रुक्माबाई राउत के जीवन की खास बातें
आप इन प्वॉइंटर्स के जरिये रुक्माबाई राउत की कहानी आसान शब्दों में समझ सकती हैं-
- 22 नवंबर 1864 को मुंबई में रुक्माबाई राउत का जन्म हुआ।
- 11 साल की उम्र में उनकी शादी दादाजी भीकाजी से कर दी गई।
- बड़ी होने पर उन्होंने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया।
- उन्होंने शादी से अलग होने के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ी।
- उनका मामला 'रुक्माबाई केस' के नाम से चर्चा में आया।
- कानूनी लड़ाई के दौरान उन्हें सामाजिक और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का समर्थन मिला।
- बाद में उन्होंने डॉक्टर बनने का फैसला किया।
- उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर विमेन से चिकित्सा की पढ़ाई की।
- 1929 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पर्दा प्रथा पर एक पुस्तिका लिखी।
- 1955 में फेफड़ों के कैंसर से उनका निधन हो गया।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों, उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों और शैक्षणिक स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक जानकारी पहुंचाना है। इसमें उल्लिखित घटनाओं या व्यक्तियों के प्रति कोई पूर्वाग्रह या पूर्वाग्रही दृष्टिकोण नहीं रखा गया है।
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