हिंदू धर्म में राधाष्टमी का पर्व बहुत ही खास माना जाता है। यह दिन राधा रानी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण की पूजा राधा रानी के बिना पूरी नहीं होती, इसलिए जन्माष्टमी के बाद आने वाली राधाष्टमी का महत्व बहुत बड़ा है।
इस दिन जो लोग भी सच्चे मन से व्रत रखते हैं और राधा-कृष्ण की पूजा करते हैं, उनके घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है। साथ ही उनकी कामनाएं भी पूरी होती हैं, लेकिन कई लोगों को राधाष्टमी की तारीख को लेकर कन्फ्यूजन है। ऐसे में हम आपकी दुविधा दूर कर रहे हैं। इसके अलावा आपको व्रत की विधि और कथा के बारे में भी जानकारी देंगे। आइए जानते हैं-
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राधाष्टमी का व्रत कब है?
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस साल 2026 में अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर करीब 1 बजे शुरू होगी और 19 सितंबर को दोपहर 3:26 बजे खत्म होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से राधाष्टमी का व्रत 19 सितंबर 2026 को ही रखा जाएगा। इस दिन मंदिरों और घरों में राधा रानी के जन्मोत्सव पर बहुत धूमधाम से पूजा-पाठ की जाती है।
राधाष्टमी की पौराणिक व्रत कथा
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद ने भगवान सदाशिव (शिवजी) के चरणों में प्रणाम करके पूछा कि हे प्रभु, बताइए श्री राधा देवी कौन हैं? क्या वे लक्ष्मी हैं, सरस्वती हैं या कोई वेदकन्या हैं? नारद जी की बात सुनकर शिवजी ने कहा कि हे मुनिवर, मैं श्री राधा के रूप और गुणों का बखान करने में खुद को असमर्थ पाता हूं। तीनों लोकों में कोई ऐसा नहीं है जो उनकी सुंदरता का पूरा वर्णन कर सके। उनकी सुंदरता तो खुद भगवान कृष्ण को भी मोहने वाली है।
इसके बाद नारद जी ने उनके जन्म के बारे में पूछा, तो शिवजी ने बताया कि वृषभानुपुरी के राजा वृषभानु बहुत ही उदार, ज्ञानी और धनी थे। वे हमेशा संयम से रहते थे और कृष्ण की भक्ति करते थे। उनकी पत्नी का नाम कीर्तिदा था, जो बहुत ही सुंदर, गुणवान और पतिव्रता थीं। उन्हीं के घर भाद्रपद महीने की शुक्लाष्टमी को दोपहर के समय श्री राधा रानी प्रकट हुईं।
शिवजी ने आगे बताया कि राधाष्टमी के दिन व्रत रखकर राधा-कृष्ण के मंदिर को फूलों और सुंदर वस्त्रों से सजाना चाहिए। मंदिर के बीच में पांच रंगों के चूर्ण से मंडप बनाकर कमल का फूल बनाएं। उस कमल के बीच में राधा-कृष्ण की मूर्ति रखकर अपनी क्षमता के अनुसार और पूरी भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
राधाष्टमी की पूजा विधि
ये रही राधाष्टमी की सही पूजा विधि, जिसे हर किसी को अपनाना चाहिए-
- स्नान और साफ-सफाई: राधाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहा लें और साफ-सुथरे कपड़े पहन लें।
- चौकी सजाएं: इसके बाद पूजा की जगह को अच्छे से साफ करके एक चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं और वहां राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर रखें।
- जरूरी चीजें अर्पित करें: पूजा के दौरान राधा रानी और भगवान कृष्ण को चंदन, अक्षत, फूल और रोली लगाएं।
- भोग लगाएं: घी का दीया और धूप जलाकर नियम से पूजा करें। राधा रानी को फल, मिठाई और खीर का भोग बहुत पसंद है। ऐसे में आप उन्हें इन चीजों का भोग लगा सकती हैं।
- मंत्र जाप: पूजा करते समय राधा रानी के नाम का जाप करें और परिवार की शांति के लिए भगवान से प्रार्थना करें। आप 'ऊं ह्रीं श्री राधिकायै नमः' मंत्र का जाप भी कर सकती हैं।
राधाष्टमी व्रत के जरूरी नियम
अगर आप राधाष्टमी का व्रत रख रही हैं, तो कुछ नियम आपको जरूर मानने चाहिए। जैसे-
- इस दिन जो लोग भी व्रत रखते हैं, उन्हें अपने मन, बोलचाल और कामों में शुद्धता का खास ख्याल रखना चाहिए।
- आप अपनी सेहत के हिसाब से बिना कुछ खाए (निराहार) या फल खाकर (फलाहार) व्रत रख सकती हैं। अगर तबीयत ठीक न हो, तो कड़े उपवास की जगह सादा खाना खा सकती हैं।
- व्रत के दौरान झूठ बोलने, गुस्सा करने, किसी से लड़ाई करने और बुरे विचारों से दूर रहना चाहिए।
- इस दिन धैर्य रखना और सादा जीवन जीना बहुत शुभ माना जाता है।
- भगवान के नाम का स्मरण करते हुए पूरा दिन बिताना बहुत फल देता है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक संदर्भ और जानकारी प्रदान करना है। हमारा प्लेटफॉर्म इसमें निहित किसी भी तथ्य, तिथि या कथा के पूर्ण दावों की सत्यता का समर्थन नहीं करता है। अपनी स्थानीय परंपराओं, पंचांग गणनाओं और व्रत नियमों के सटीक पालन के लिए कृपया अपने पंडित या ज्योतिषाचार्य से परामर्श लें।
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