जब भी हम उड़ीसा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की बात करते हैं, तो हमारे मन में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की वह छवि उभर आती है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान की पेंटिंग जिस कला में बनाई जाती है, उसका नाम क्या है? बता दें कि भगवान जगन्नाथ की सुंदर मूर्तियां हो या फिर पेंटिंग उसे एक विशेष कला से उकेरा जाता है, जिसका नाम पट्टचित्र है। यह केवल एक पेंटिंग नहीं, बल्कि भगवान के प्रति भक्तों की अगाध आस्था और सदियों पुरानी संस्कृति का प्रतीक है। कपड़े और ताड़ के पत्तों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली यह कला मुख्य रूप से उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की है। फल-फूल रही है। राजा-महाराजाओं के दौर से चली आ रही यह लोक कला आज भी उतनी ही पवित्र और खास मानी जाती है। आज के इस लेख में हम आपको इस प्राचीन कला के इतिहास और अर्थ के बारे में बताने जा रहे हैं।

पट्टचित्र कला का इतिहास

पट्टचित्र भारत की सबसे प्राचीन लोक कलाओंमें से एक है, जिसका इतिहास लगभग 1,000 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। गंग राजवंश और सूर्य राजवंश के राजाओं के समय इस कला को बहुत बढ़ावा मिला। जगन्नाथ मंदिर के निर्माण के बाद से ही इस कला का सीधा संबंध महाप्रभु की सेवा से जुड़ गया। इस कला को बनाने वाले कलाकारों को चित्रकार कहा जाता है। ओडिशा का रघुराजपुर गांव पट्टचित्र कलाकारों का मुख्य केंद्र है, जहां आज भी हर घर में यह कला जीवित है और इसे भारत सरकार द्वारा GI Tag भी मिला हुआ है।

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पट्टाचित्र का अर्थ

ओडिशा की पट्टाचित्र चित्रकला की उत्पत्ति मंदिर की रस्मों और लोक कथाओं से हुई है। यह भक्ति से प्रेरित रचनाओं में से एक थी आध्यात्मिक बंधन का एक दृश्य माध्यम है। पट्टाचित्र दो शब्द से मिलकर बना है। इसका अर्थ विशेष रूप से तैयार किए गए सूती कपड़े या ताड़ के पत्तों पर प्राकृतिक रंगों की मदद से देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं को उकेरना ही पट्टचित्र कहलाता है।

  • पट्ट-सूती कपड़ा या कैनवास
  • चित्र-तस्वीर या कलाकृति

भगवान जगन्नाथ से जुड़ा अनासर परंपरा

पट्टचित्र का इतिहास भगवान जगन्नाथ की एक बेहद खास परंपरा से जुड़ा है, जिसे अनासर या एकांतवास कहा जाता है। हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के शाही स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा बीमार पड़ जाते हैं।

15 दिनों के लिए मुख्य मंदिर से एकांतवास में चले जाते हैं। इस दौरान आम भक्तों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। इन 15 दिनों में मंदिर के गर्भगृह में मूर्तियों की जगह पट्टचित्र कला से बने भगवान के तीनों रूपों के चित्रों को स्थापित किया जाता है, जिन्हें पट्टी दियन कहते हैं। भक्त इन्हीं चित्रों के दर्शन करते हैं।

कैसे बनती है पट्टचित्र पेंटिंग?

पट्टचित्र कला की सबसे बड़ी खासियत प्राकृतिक और इको-फ्रेंडली है। इमली के बीजों के गोंद और चाक पाउडर लेप तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे सूती कपड़े पर लगातार इसे कड़ा किया जाता है।

इसके बाद इसे पत्थर पर घिसकर चिकना बनाया जाता है। इसमें किसी भी तरह के केमिकल रंग का इस्तेमाल नहीं होता। सफेद रंग शंख से, काला रंग दीये के काजल से, पीला रंग हरिताल पत्थर से और लाल रंग हिगुला पत्थर से तैयार किया जाता है।कलाकार बिना किसी पेंसिल स्केच के, सीधे ब्रश से बेहद बारीक और सजीव आकृतियां बॉर्डर के साथ तैयार करते हैं।

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