हिंदू शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं होती है, बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है। इस मिलन की सबसे पहली और सबसे खूबसूरत शुरुआत होती है मिलनी की रस्म से। जब दूल्हा अपनी बारात लेकर दुल्हन के घर या विवाह स्थल पर पहुंचता है, तो दुल्हन के परिवार वाले फूलों, तिलक और मिठाई से उनका स्वागत करते हैं। यही स्वागत ही मिलनी कहलाता है। आइए पंडित अरुणेश कुमार शर्मा जी जानते हैं मिलनी की रस्म का इतिहास, कारण और इसे कैसे निभाया जाता है।
मिलनी की रस्म का महत्व क्या होता है?
क्या आपने कभी सोचा है कि बारात के पहुंचते ही सबसे पहले दूल्हे के परिवार वालों को तिलक क्यों लगाया जाता है और उन्हें शगुन क्यों दिया जाता है? इस रस्म को मिलनी कहते हैं। मिलनी का मतलब ही है मिलना। यह रस्म बताती है कि आज से दोनों परिवार एक हो गए हैं।
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मिलनी शब्द संस्कृत के शब्द मिलन से बना है, जिसका अर्थ है एक साथ आना और मिलना। यह हिंदू विवाह की सबसे पहली मुख्य रस्मों में से एक है, जो फेरों और जयमाला से पहले होती है। इसमें दुल्हन पक्ष यानी लड़की वाले दूल्हा पक्ष यानी लड़के वालों का स्वागत करते हैं। इस रस्म में दोनों परिवारों के बराबर के रिश्तेदार, जैसे पिता से पिता, दादा से दादा, मामा से मामा,भाई से भाई, एक-दूसरे को तिलक लगाकर, माला पहनाकर और शगुन देकर गले मिलते हैं। इसी वजह से इसे मिलनी कहा जाता है।
मिलनी की रस्म का इतिहास क्या है?
मिलनी की रस्म वैदिक काल से चली आ रही है। पुराने समय में इसे वर सत्कार या वर स्वागत कहा जाता था। मान्यता है कि जब भगवान राम बारात लेकर जनकपुरी पहुंचे थे, तो राजा जनक ने अपने पूरे परिवार के साथ उनका भव्य स्वागत किया था। वहीं से दोनों परिवारों के मिलन की यह परंपरा शुरू हुई।
इसके पीछे मुख्य कारण हैं
1. सम्मान का प्रतीक
दुल्हन पक्ष दूल्हे और उसके परिवार को भगवान का रूप मानकर उनका सम्मान करता है।
2. दोनों परिवारों की सहमति
मिलनी के जरिए दोनों परिवार खुले तौर पर इस विवाह के लिए अपनी सहमति और खुशी जाहिर करते हैं।
3. नए रिश्ते की शुरुआत
यह रस्म दोनों परिवारों के बीच की झिझक खत्म करती है और उन्हें एक-दूसरे से परिचित कराती है।
मिलनी की रस्म कौन करता है?
इसमें दोनों पक्षों की बराबर भूमिका होती है, लेकिन रस्म की मेजबानी लड़की वाले करते हैं। लड़की वाले दूल्हे के पिता, दादा, चाचा, मामा, भाई आदि से मिलते हैं। महिलाओं में भी इसी तरह सास-ससुर की आपस में, ननद-भाभी की आपस में मिलनी होती है।
मिलनी की रस्म कैसे निभाई जाती है?
- सबसे पहले दूल्हा अपनी बारात के साथ विवाह स्थल के मुख्य द्वार पर पहुंचता है। ढोल-नगाड़ों के साथ बारात का स्वागत होता है।
- कई जगहों पर पहले दूल्हे से तोरण मारने की रस्म करवाई जाती है, फिर दुल्हन की मां दूल्हे की आरती उतारती है और तिलक लगाती है।
- स्वागत के बाद सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है, ताकि सारी रस्में बिना विघ्न के पूरी हों।
- अब मुख्य मिलनी शुरू होती है। पंडित जी एक-एक करके दोनों तरफ के रिश्तेदारों के नाम पुकारते हैं। सबसे पहले दूल्हे और दुल्हन के पिता की मिलनी होती है, फिर दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी और इसी तरह सभी बड़ों की।
- लड़की पक्ष के व्यक्ति, लड़के पक्ष के रिश्तेदार को रोली-चंदन का तिलक लगाते हैं, फूलों की माला पहनाते हैं, मिठाई खिलाते हैं और शगुन के रूप में कपड़े, पैसे या नारियल-चुनरी भेंट करते हैं।
- इसके बाद दोनों एक-दूसरे को गले लगाते हैं। यही असली मिलनी है।
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अलग-अलग राज्यों में मिलनी के अलग नाम
- उत्तर भारत (UP, बिहार, दिल्ली): इसे मिलनी ही कहते हैं, यह सबसे भव्य रूप में होती है।
- राजस्थान: इसे मिलनी के साथ तोरण की रस्म से जोड़ा जाता है।
- पंजाब: यहां इसे मिलनी ही कहते हैं, लेकिन इसमें शगुन में कपड़े और पैसे ज्यादा दिए जाते हैं।
- महाराष्ट्र: यहां इसे सीमांत पूजन कहते हैं।
- बंगाल: यहां इसे बोर बोरोन कहते हैं, जहां दुल्हन की मां दूल्हे की आरती उतारती हैं।
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मिलनी की रस्म सिर्फ तिलक लगाने और शगुन देने की नहीं है। यह दो अनजान परिवारों के एक परिवार बनने की पहली सीढ़ी है। यह रस्म हमें सिखाती है कि शादी सिर्फ दो दिलों का नहीं, बल्कि दो परिवारों के सम्मान, प्रेम और एक-दूसरे को अपनाने का बंधन है। इसलिए जब भी बारात दरवाजे पर पहुंचे, तो समझ लें कि दो परिवारों के मिलन का सबसे सुंदर पल शुरू हो गया है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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