लड़कियों की अलमारी कपड़ों से खचाखच भरी होती है, लेकिन जब भी बाहर जाना होता है, तो उनकी एक ही शिकायत रहती है कि मेरे पास पहनने के लिए कपड़े ही नहीं हैं। ज्यादातर लड़के इसे एक मजाक की तरह लेते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए यह एक उलझन भरा सवाल होता है। आखिरकार ऐसा क्यों होता है कि ढेर सारे कपड़ों के बावजूद महिलाएं खुद को खाली हाथ महसूस करती हैं? इसके पीछे सिर्फ फैशन नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक सच छिपा है। ऐसे में इसके कारणों के बारे में इस लेख में आगे बताएंगे। इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं...
परफेक्ट दिखने का दबाव और बदलता मूड
कपड़े चुनना सिर्फ शरीर ढकने या तैयार होने की बात नहीं, बल्कि यह महिलाओं के मूड और आत्मविश्वास से जुड़ा होता है। अक्सर अलमारी में कपड़े तो बहुत भरे होते हैं, लेकिन वे कभ-कभी उस खास दिन के मूड या इवेंट के माहौल से मेल नहीं खाते।
जबकि महिलाएं चाहती हैं कि जो वे पहनें उसमें सबसे अलग नजर आएं। अगर कोई कपड़ा उनकी बॉडी-शेप या मूड पर फिट नहीं बैठता, तो भरा हुआ वॉर्डरोब भी उन्हें बिल्कुल बेकार और खाली नजर आने लगता है।
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मिक्स-एंड-मैच की कमी
आजकल हम ऐसे कपड़े ज्यादा खरीद लेते हैं जो उस वक्त ट्रेंड में होते हैं, लेकिन असल जिंदगी में वे हमारे काम नहीं आते। इसे इम्पल्स बाइंग यानी बिना सोचे-समझे खरीदारी कहते हैं। ऐसे में अलमारी में चमकीले और फैंसी कपड़े तो होते हैं, लेकिन रोजमर्रा में पहनने वाले बेसिक कपड़ों की कमी हो जाती है।
पुरानी यादों का मोह
वॉर्डरोब में कुछ कपड़े ऐसे होते हैं, जिनसे उनकी पुरानी यादें जुड़ी होती हैं, जिन्हें वे फेंकना नहीं चाहतीं। वहीं कुछ कपड़े इस उम्मीद में रखे होते हैं कि जब वजन कम होगा, तब इसे पहनूंगी। नतीजा यह होता है कि अलमारी में दिखने वाले 60% कपड़े मौजूदा समय में उनके फिटिंग साइज के होते ही नहीं हैं। पहनने के लिए कपड़े कम होते हैं और रिजेक्टेड कपड़े कम या ज्यादा हैं।
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Images: magnific
